अखिलेश के लिए बढ़ी एक और चुनौती, सपा से छिटके मुसलमान, बसपा पहली पसंद

पिछले विधानसभा चुनाव में सपा के पक्ष में मजबूती से खड़े होने वाले मुस्लिमों का रुझान आठ माह बाद हुए निकाय चुनावों में बदला-बदला रहा। उन्होंने अपने ऊपर किसी एक दल का ठप्पा नहीं लगने दिया। हालांकि, उनकी पहली पसंद बसपा रही, लेकिन कांग्रेस और सपा से भी परहेज नहीं किया। उनके लिए हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी अछूत नहीं है।
अखिलेश के लिए बढ़ी एक और चुनौती, सपा से छिटके मुसलमान, बसपा पहली पसंददो नगर निगमों, मेरठ व अलीगढ़ में मेयर पद पर बसपा की जीत हुई है। इसकी प्रमुख वजह दलित-मुस्लिम गठजोड़ रही है। दरअसल, पश्चिमी यूपी में दलित व मुस्लिम, दोनों की आबादी ठीक-ठाक है। दलितों का रुझान आमतौर पर बसपा के प्रति दिखाई देता है।

पिछले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम इलाकों में सपा को भरपूर समर्थन मिला था। यह अलग बात है कि प्लस वोट नहीं होने के कारण सपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई। इस बार मुस्लिमों का रुझान किसी दल के प्रति एकपक्षीय नहीं रहा। अधिकतर स्थानों पर उनकी पहली पसंद भाजपा को टक्कर देने वाले उम्मीदवार रहे।

सपा में इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि मुस्लिमों के रुझान में यह बदलाव क्यों आया? अभी तक सपा ही भाजपा से मुकाबले के चलते मुस्लिम वोटों पर सबसे मजबूती से दावा करती थी। निकाय चुनाव के दौरान अपने जन्मदिन पर आयोजित समारोह में मुलायम सिंह यादव ने दावा किया था कि आजादी के बाद मुसलमानों ने जितना समर्थन सपा का किया है, उतना किसी अन्य दल का नहीं किया।

मतदान करने के बाद खुशी जाहिर करती मतदाता

मुस्लिम वोटरों का मिजाज हर जिले और हर सीट पर बदला हुआ रहा। कहीं-कहीं उनके वोटों का बुरी तरह विभाजन भी हुआ। मेरठ शहर सीट पर विधानसभा चुनाव में सपा के रफीक अंसारी ने 1.03 लाख से अधिक वोट लेकर भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी को करारी शिकस्त दी थी। यहां मेयर के चुनाव में माहौल एकदम उलट रहा।

मेरठ शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों में हाथी मस्त चाल से चला। अलीगढ़ में सपा के पूर्व विधायक जफर आलम 98 हजार से ज्यादा वोट लेकर विधानसभा चुनाव हार गए थे लेकिन मेयर के चुनाव में मुस्लिम इलाकों में लोग साइकिल के बजाय हाथी की सवारी करते नजर आए। कमोबेश यही आलम सहारनपुर का रहा। आठ महीने पहले 1.27 लाख वोट लेकर सहारनपुर नगर से सपा के संजय गर्ग विधायक चुने गए लेकिन उन्हें समर्थन देने वाले मुसलमान निकाय चुनाव में बसपा के साथ खड़े हो गए। यहां मेयर पद पर भाजपा और बसपा में आखिर तक कांटे की टक्कर रही। 

दूसरे जिले भी दे रहे सियासी संकेत

मेरठ से सटे मुजफ्फरनगर में नगर पालिका परिषद में कांग्रेस की जीत में मुस्लिम मतों की अहम भूमिका रही। बिजनौर में मुसलमानों का समर्थन सपा के प्रति दिखा, इसलिए अधिकतर निकायों में सपा उम्मीदवार जीत गए। मुरादाबाद में मुस्लिम मतों का कांग्रेस, सपा और बसपा के बीच बंटवारा हुआ तो भाजपा की राह बेहद आसान हो गई। मुरादाबाद नगर विधानसभा सीट पर 1.20 लाख वोट लेकर विधानसभा चुनाव हारने वाले यूसुफ अंसारी को सपा ने मेयर का टिकट दिया था।

उन्हें विधानसभा चुनाव में हार की हमदर्दी का लाभ भी नहीं मिला। इस सीट पर कांग्रेस के मुस्लिम प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। बरेली में मुस्लिमों का रुझान सपा के प्रति दिखाई दिया। सपा का गढ़ समझे जाने वाले फिरोजाबाद में मुसलमान साइकिल छोड़ ओवैसी की एआईएमआईएम के साथ चले गए। यहां भाजपा के साथ मुख्य मुकाबले में एआईएमआईएम उम्मीदवार रहा। मथुरा व झांसी नगर निगम में मुसलमानों का झुकाव कांग्रेस की तरफ दिखा।   

चुनाव प्रचार से अलग रहने का हुआ नुकसान

मुस्लिम मतों के छिटक जाने पर सपा नेता कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। सपा के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल से निकाय चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक दरकने की वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इसका जवाब मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी देंगे। चौधरी भी इस सवाल को टाल गए। सपा के एक नेता के मुताबिक अखिलेश यादव और सपा के अन्य प्रमुख नेताओं के चुनाव प्रचार से अलग रहने के कारण मुसलमानों को भाजपा के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार चुनने में ज्यादा भ्रम नहीं हुआ। वे अलग-अलग दलों के पक्ष में खड़े हुए। उनका कहना है कि मुसलमानों ने वोट कहीं भी दिया हो, उनका भरोसा सपा में है और रहेगा। चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक खिसकने के कारणों पर मीडिया में नहीं, पार्टी फोरम पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।  

 

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