अटल का अस्थि विसर्जन सर्वदलीय होना चाहिए था : शिवसेना

शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी द्वारा निकाली जा रही पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की अस्थिविसर्जन यात्राओं पर तीखा कटाक्ष किया है। शिवसेना का कहना है कि भाजपा ऐसा करके अटल के अस्थिकलशों का मजाक बना रही है। उसने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में लिखा है कि अटल जैसी शख्सियत का अस्थिविसर्जन एकदलीय नहीं, बल्कि सर्वदलीय होना चाहिए था। शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी द्वारा निकाली जा रही पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की अस्थिविसर्जन यात्राओं पर तीखा कटाक्ष किया है। शिवसेना का कहना है कि भाजपा ऐसा करके अटल के अस्थिकलशों का मजाक बना रही है। उसने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में लिखा है कि अटल जैसी शख्सियत का अस्थिविसर्जन एकदलीय नहीं, बल्कि सर्वदलीय होना चाहिए था।    सामना के संपादकीय में आज लिखा गया है कि अटलबिहारी वाजपेयी से देश ने पंडित नेहरू जैसा ही प्रेम किया है। इसलिए उनके अस्थिकलश का दर्शन और विसर्जन एकदलीय न रखते हुए सर्वदलीय, अर्थात राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में होना चाहिए था। तब सभी राजनीतिक दलों ने अटल जी के अस्थिकलश को स्वीकार कर सम्मान और श्रद्धा के साथ विसर्जित किया होता। सामना के अनुसार पश्चिम बंगाल में ममता, उड़ीसा में नवीन पटनायक, महाराष्ट्र में शिवसेना और पंजाब में अकाली दल को साथ लिया जा सकता था। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हुए होते, और देश के अटल जी के जनमान्य महानेता होने का दर्शन पूरा देश करता। मगर ऐसे महान अटल जी की मृत्यु के बाद उन्हें छोटा बनाने का प्रयोग किया जा रहा है।      शिवसेना ने किया अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग का बहिष्कार, सदन से रहेगी गैरहाजिर यह भी पढ़ें शिवसेना के अधीकृत विचार समझे जानेवाले संपादकीय में भाजपा पर कटाक्ष करते हुए लिखा गया है कि अटलबिहारी वाजपेयी अजातशत्रु थे। मगर वाजपेयी की मृत्यु के बाद जो शून्य निर्माण हुआ है, उसे भरने का काम हास्यास्पद तरीके से जारी है। संपादकीय में अस्थिकलश लिए हुए कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं का चित्र भी लगाया गया है, जिसमें ये कार्यकर्ता हंसते हुए दिखाई दे रहे हैं। सामना लिखता है कि अस्थिकलशों की जो हास्यास्पद राजनीति चल रही है, वह किसी के लिए भी शोभादायक नहीं है। भाजपा में ह्यबुजुर्गह्ण नेताओं का महत्त्व नहीं रहा, लेकिन उनके अस्थिकलशों को महत्त्व मिल रहा है। सामना का मानना है कि अटल जी के अस्थिकलश का दर्शन और विसर्जन जिस गंभीरता एवं श्रद्धा से होना चाहिए था, ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। एकाध अवसरों को छोड़ दिया जाए, तो अस्थिकलश दर्शन और प्रदर्शन एक राजनीतिक रंगारंग कार्यक्रम की तरह मनाया जा रहा है। कुछ जगह तो अस्थिकलश हाथ में उठाकर जीत की ट्राफी उठाने जैसा फोटोसेशन हो रहा है। मंत्रियों और अधिकारियों के चेहरे पर ऐसा करते हुए विश्वकप जीतने जैसी चमक दिखाई दे रही है।   संपादकीय ने सवाल उठाया है कि अटल जी का अस्थिकलश हाथ में लेकर लोग ठहाका कैसे लगा सकते हैं ? सामना के अनुसार ये ठहाके कैमरे में कैद हुए हैं। कुछ लोगों ने तो अटल जी के अस्थिकलश के साथ सेल्फी निकालने का 'पराक्रम' भी किया है। अटल जी की तारीफ करते हुए सामना लिखता है कि अटल जी का नेतृत्व ईमानदारी का शिखर था। उसमें मिलावट नहीं थी। उनके पेट में कुछ, और होठों पर कुछ और नहीं था। उनकी राजनीतिक नकली नहीं थी। पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद उनकी आंखों से आंसू बहने लगे थे। वे उसे छुपा नहीं सके थे। बंगलादेश युद्ध के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी की प्रशंसा की थी। गुजरात दंगों के बाद उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सीख दी थी।

सामना के संपादकीय में आज लिखा गया है कि अटलबिहारी वाजपेयी से देश ने पंडित नेहरू जैसा ही प्रेम किया है। इसलिए उनके अस्थिकलश का दर्शन और विसर्जन एकदलीय न रखते हुए सर्वदलीय, अर्थात राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में होना चाहिए था। तब सभी राजनीतिक दलों ने अटल जी के अस्थिकलश को स्वीकार कर सम्मान और श्रद्धा के साथ विसर्जित किया होता। सामना के अनुसार पश्चिम बंगाल में ममता, उड़ीसा में नवीन पटनायक, महाराष्ट्र में शिवसेना और पंजाब में अकाली दल को साथ लिया जा सकता था। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी शामिल हुए होते, और देश के अटल जी के जनमान्य महानेता होने का दर्शन पूरा देश करता। मगर ऐसे महान अटल जी की मृत्यु के बाद उन्हें छोटा बनाने का प्रयोग किया जा रहा है।   

शिवसेना के अधीकृत विचार समझे जानेवाले संपादकीय में भाजपा पर कटाक्ष करते हुए लिखा गया है कि अटलबिहारी वाजपेयी अजातशत्रु थे। मगर वाजपेयी की मृत्यु के बाद जो शून्य निर्माण हुआ है, उसे भरने का काम हास्यास्पद तरीके से जारी है। संपादकीय में अस्थिकलश लिए हुए कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं का चित्र भी लगाया गया है, जिसमें ये कार्यकर्ता हंसते हुए दिखाई दे रहे हैं। सामना लिखता है कि अस्थिकलशों की जो हास्यास्पद राजनीति चल रही है, वह किसी के लिए भी शोभादायक नहीं है। भाजपा में ह्यबुजुर्गह्ण नेताओं का महत्त्व नहीं रहा, लेकिन उनके अस्थिकलशों को महत्त्व मिल रहा है। सामना का मानना है कि अटल जी के अस्थिकलश का दर्शन और विसर्जन जिस गंभीरता एवं श्रद्धा से होना चाहिए था, ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। एकाध अवसरों को छोड़ दिया जाए, तो अस्थिकलश दर्शन और प्रदर्शन एक राजनीतिक रंगारंग कार्यक्रम की तरह मनाया जा रहा है। कुछ जगह तो अस्थिकलश हाथ में उठाकर जीत की ट्राफी उठाने जैसा फोटोसेशन हो रहा है। मंत्रियों और अधिकारियों के चेहरे पर ऐसा करते हुए विश्वकप जीतने जैसी चमक दिखाई दे रही है। 

संपादकीय ने सवाल उठाया है कि अटल जी का अस्थिकलश हाथ में लेकर लोग ठहाका कैसे लगा सकते हैं ? सामना के अनुसार ये ठहाके कैमरे में कैद हुए हैं। कुछ लोगों ने तो अटल जी के अस्थिकलश के साथ सेल्फी निकालने का ‘पराक्रम’ भी किया है। अटल जी की तारीफ करते हुए सामना लिखता है कि अटल जी का नेतृत्व ईमानदारी का शिखर था। उसमें मिलावट नहीं थी। उनके पेट में कुछ, और होठों पर कुछ और नहीं था। उनकी राजनीतिक नकली नहीं थी। पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद उनकी आंखों से आंसू बहने लगे थे। वे उसे छुपा नहीं सके थे। बंगलादेश युद्ध के बाद उन्होंने इंदिरा गांधी की प्रशंसा की थी। गुजरात दंगों के बाद उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने की सीख दी थी।

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