अमृतसर का मीठा पानी बनाता है यहां के हर एक स्वाद को निराला

आध्यात्मिक नगरी अमृतसर का कण-कण वीरता, पराक्रम, त्याग एवं बलिदान का प्रतीक है। समृद्ध विरासत, ऐतिहासिक धरोहरों और विश्र्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल श्री हरिमंदिर साहिब के इस पावन शहर को गुरु साहिबान की मेहर प्राप्त है। संभवत: ऐसा विरला ही होगा जो इस ऐतिहासिक शहर की महत्ता से परिचित न हो। पर्यटन की दृष्टि से पूरी तरह डेवलप अमृतसर शहर में श्री हरिमंदिर साहिब, श्री दुग्र्याणा तीर्थ, शहीद स्थली जलियांवाला बाग, अटारी सीमा, किला गोबिंदगढ़ जैसे ऐतिहासिक जगहों को देखने देश-विदेश से रोजाना लगभग एक लाख टूरिस्ट आते हैं। टूरिस्ट को इन जगहों के अलावा जो चीज सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वह है अमृतसर का खानपान। आध्यात्मिक नगरी अमृतसर का कण-कण वीरता, पराक्रम, त्याग एवं बलिदान का प्रतीक है। समृद्ध विरासत, ऐतिहासिक धरोहरों और विश्र्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल श्री हरिमंदिर साहिब के इस पावन शहर को गुरु साहिबान की मेहर प्राप्त है। संभवत: ऐसा विरला ही होगा जो इस ऐतिहासिक शहर की महत्ता से परिचित न हो। पर्यटन की दृष्टि से पूरी तरह डेवलप अमृतसर शहर में श्री हरिमंदिर साहिब, श्री दुग्र्याणा तीर्थ, शहीद स्थली जलियांवाला बाग, अटारी सीमा, किला गोबिंदगढ़ जैसे ऐतिहासिक जगहों को देखने देश-विदेश से रोजाना लगभग एक लाख टूरिस्ट आते हैं। टूरिस्ट को इन जगहों के अलावा जो चीज सबसे ज्यादा आकर्षित करती है, वह है अमृतसर का खानपान।    अंबरसरी कुलचा   वैसे तो आलू का कुलचा देश में ज्यादातर जगहों पर मिलता है, लेकिन जो स्वाद अमृतसर में बने कुचले का है, वैसा कहीं नहीं। आपने अपने शहर में फूड कॉर्नर पर अक्सर 'अंबरसरी'  कुलचा लिखा देखा होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि अंबरसरी कुल्चे का अपना अलग ही स्वाद है। अमृतसर में कुलचे की सैकड़ों दुकानें हैं। यहां तक कि कई दुकानदार रेहडि़यों पर तंदूर लगाकर भी कुलचे तैयार करते हैं। अंबरसरी कुलचा बनाने वाले 'कुलचा लैंड' के संचालक सिमरजीत सिंह बताते हैं कि उनकी चौथी पीढ़ी इस काम में जुटी है। उनके दादाजी हुक्म सिंह ने कुलचे का कारोबार शुरू किया था। वह कहते हैं, 'उनके बाद मेरे पिता दीवान सिंह और अब मैं व मेरे बच्चे कुलचे बनाते हैं। आलू, पनीर, गोभी व प्याज से बनने वाले कुलचों की खुशबू ही लोगों को आकर्षित करती है। उसके साथ सफेद चने, मूली व प्याज की चटनी इसे और जायकेदार करती है। अमृतसर में बनने वाला कुलचा इसलिए टेस्टी होता है, क्योंकि यहां का पानी मीठा है। असल में कुलचे का असली जायका अमृतसर में ही मिलता है।   वीकेंड पर अमृतसर ट्रिप पर जाएं तो मिस न करें स्ट्रीट फूड, खास है यहां के जायके यह भी पढ़ें   केसर दा ढाबा   हर जगह के जायके का स्वाद मिलता है इंदौर की इन गलियों में यह भी पढ़ें लाहौर (अब पाकिस्तान) के शेखुपुरा इलाके में 102 साल पहले स्थापित किया गया केसर दा ढाबा आज भी अमृतसर में अपने जायके की खुशबू बिखेर रहा है। चौक पासियां क्षेत्र में स्थित केसर दा ढाबा में माह की दाल और लच्छेदार परांठा व‌र्ल्ड फेमस है। 10 से 12 घंटे तक तांबे की तेग में पकने वाली दाल और तंदूर में सिंकने वाले लच्छेदार परांठे की खुशबू से चौक पासिया क्षेत्र महकता रहता है। सन् 1916 ईस्वी में लाला केसर मल ने लाहौर के शेखुपुरा में केसर दा ढाबा खोला था। लाला केसर मल और उनकी पत्नी पार्वती के हाथ में इतनी शफा थी कि ढाबे में पकने वाली माह की दाल पाकिस्तान के बाशिंदे अंगुलियां चाट- चाट कर खाते थे। सिर्फ एक लच्छेदार परांठा ही लोगों की भूख शांत करने के लिए काफी था। बंटवारे के बाद केसर मल परिवार सहित अमृतसर आ बसे। 'केसर दा ढाबा' पाकिस्तान में छूट गया, लेकिन केसर मल ने चौक पासियां में केसर दा ढाबा खोल दिया। अमृतसर के मीठे पानी में माह की दाल का स्वाद और लाजवाब हो गया। लच्छेदार परांठा भी और खिल उठा। केसरमल के देहावसान के बाद पुत्र शोरी मल ने कामकाज संभाला।  एक वक्त ऐसा भी आया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के लिए यहां से खाना पैक करवाकर भेजा गया। शोरी मल के देहांत के बाद उनके पुत्र विजय कुमार केसर दा ढाबा चला रहे हैं। असल में इस ढाबे को चौथी पीढ़ा संभाल रही है। विश्र्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल श्री हरिमंदिर साहिब के निकट स्थित केसर दा ढाबा में देशी-विदेशी पर्यटकों का आगमन ज्यादा है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड जैसे बड़े देशों से आने वाले पर्यटक इस ढाबे की दाल और परांठे का स्वाद जरूर चखते हैं। यहां हर रोज ढाई क्विंटल आटे से लच्छेदार परांठे बनाए जाते हैं। माह की दाल 1.20 क्विंटल लगती है। तांबे की बड़ी देग में चालीस किलो दाल 12 घंटे तक धीमी आंच में पकती है।   खाने-पीने के हैं शौकीन हैं तो बार्सिलोना शहर में चखने को मिलेगा बहुत कुछ यह भी पढ़ें   मक्खन फिश कॉर्नर   भारत की इन 5 जगहों की खास बिरयानी जानते हैं आप? एक बार जरूर चखें यह भी पढ़ें वेज के साथ ही नॉनवेज डिशेज भी पर्यटकों को लुभाते हैं। अंबरसरी फिश, फ्राई फिश, तंदुरी फिश, अंबरसरी तंदूरी चिकेन, मटन टिक्का, चिल्ली चिकेन, बटन चिकेन, मलाई चिकेन आदि देशी-विदेशी पर्यटकों को बहुत पंसद आते हैं। मजीठा रोड स्थित मक्खन फिश कॉर्नर में अंबरसरी फिश के दूर-दूर तक चर्चे हैं। असल में अंबरसरी फिश की रेसिपी ईजाद करने वाले मक्खन फिश कॉर्नर के मालिक सुच्चा सिंह थे। 1962 में सुच्चा सिंह ने अंबरसरी फिश तैयार की थी। निसंदेह, यह डिश कम समय में लोगों को भा गई। मस्टर्ड ऑयल में पकने वाली अंबरसरी फिश आज देश के कोने-कोने में पहुंच चुकी है।  सुच्चा सिंह के बाद उनके पुत्र मलकीत सिंह और मलकीत के पुत्र हरजीत सिंह तथा सिमरनदीप सिंह स्वाद के इस कारोबार को चला रहे हैं। मलकीत सिंह बताते हैं कि वह तंदूरी फिश भी बनाते हैं। यह देश में कहीं और बनती भी होगी तो ऐसा स्वाद नहीं मिलेगा, क्योंकि इसे धीमी आंच में पकाया जाता है और अपने हाथों से तैयार किए गए मसाले डाले जाते हैं। सभी नॉनवेज वेरायटीज में मक्खन और देसी घी का प्रयोग किया जाता है। अमृतसरी कबाब और चिकन टिक्का के बिना लोगों का खाना अधूरा रह जाता है। स्वाद और गुणवत्ता की वजह से सिने सितारे, राजनीतिज्ञ और देश के बड़े पदों पर बैठे अधिकारी भी यहां आते हैं।    रेल कोच में रेस्त्रां  रेल के डिब्बे की तरह दिखने वाला यह केबिन असल में रेस्टोरेंट है। अमृतसर के लॉरेंस रोड पर स्थित छोटी सी जगह में बनाए गए इस रेस्टोरेंट को 'ईट एंड टेस्ट' नाम दिया गया है। अमृतसर में फूड कॉर्नर की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन कोच में रेस्टोरेंट का कॉन्सेप्ट बिल्कुल अलग है। 40 सीटर यह कोच नुमा रेस्टोरेंट पूरी तरह से एयरकंडीशन्ड है। यहां लोगों को इंडियन, कांटीनेंटल, चाइनीज व इटेलियन फूड परोसे जाते हैं। इसे दिल्ली के एक आर्किटेक्ट ने बनाया था। लोग यहां आकर खाना भी खाते हैं और रेल कोच में बैठने का आनंद भी उठाते हैं।  खाने के बाद लस्सी भी जरूरी है  कहानियों में आपने सुना होगा कि पंजाब में दूध की नदियां बहती हैं। खाने-पीने की लाजवाब और बेशुमार वेराइटी के साथ 'अंबरसरी लस्सी' भी अपना अलग रुतबा रखती है। इसका मीठा जादू हर किसी पर चलता है। शहर में आने वाला कोई भी शख्स मक्खन और मलाई वाली लस्सी जरूर पीता है। जिस किसी ने भी अमृतसर की लस्सी पी, वह इसका कायल बन गया। ढाब खटिकां बाजार में स्थित आहूजा लस्सी भंडार में पर्यटकों की खासी भीड़ रोजाना लगती है। सन् 1957 में तरुण आहूजा के दादा किशन लाल ने ढाब खटीकां में लस्सी की दुकान शुरू की। 61 साल बाद भी लस्सी का वही स्वाद बरकरार है। दादा के बाद पिता, चाचा और अब वो लस्सी बनाते हैं। शुद्ध दूध व दही से बनी लस्सी में मलाई व मक्खन इसका टेस्ट बढ़ाते हैं। क्रिकेटर कपिल देव, बॉलीवुड स्टार गोविंदा और पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के अलावा देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियां लस्सी का स्वाद चख चुकी हैं।    सच तो यह है कि अमृतसर खाने की बात निराली है। शहर के सभी रेस्त्रां, ढाबे या होटल में पंजाब के परंपरागत पकवान आसानी से मिल जाते हैं। देश विदेश से आने वाले पर्यटक छोले-कुलचे, जलेबी, कड़ाही दूध, आलू टिक्की, छोले-भठूरे, चाट-पापड़ी, मटका कुल्फी, मट्ठी-छोले जैसी डिशेज गली-गली में दुकानों पर वाजिब दाम पर मिल जाती है। 12 दरवाजों पर आधारित इस अंदरूनी शहर में अगर दस रुपये भी जेब में हों तो इंसान पेट-पूजा कर सकता है।

अंबरसरी कुलचा 

वैसे तो आलू का कुलचा देश में ज्यादातर जगहों पर मिलता है, लेकिन जो स्वाद अमृतसर में बने कुचले का है, वैसा कहीं नहीं। आपने अपने शहर में फूड कॉर्नर पर अक्सर ‘अंबरसरी’  कुलचा लिखा देखा होगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि अंबरसरी कुल्चे का अपना अलग ही स्वाद है। अमृतसर में कुलचे की सैकड़ों दुकानें हैं। यहां तक कि कई दुकानदार रेहडि़यों पर तंदूर लगाकर भी कुलचे तैयार करते हैं। अंबरसरी कुलचा बनाने वाले ‘कुलचा लैंड’ के संचालक सिमरजीत सिंह बताते हैं कि उनकी चौथी पीढ़ी इस काम में जुटी है। उनके दादाजी हुक्म सिंह ने कुलचे का कारोबार शुरू किया था। वह कहते हैं, ‘उनके बाद मेरे पिता दीवान सिंह और अब मैं व मेरे बच्चे कुलचे बनाते हैं। आलू, पनीर, गोभी व प्याज से बनने वाले कुलचों की खुशबू ही लोगों को आकर्षित करती है। उसके साथ सफेद चने, मूली व प्याज की चटनी इसे और जायकेदार करती है। अमृतसर में बनने वाला कुलचा इसलिए टेस्टी होता है, क्योंकि यहां का पानी मीठा है। असल में कुलचे का असली जायका अमृतसर में ही मिलता है।

केसर दा ढाबा

लाहौर (अब पाकिस्तान) के शेखुपुरा इलाके में 102 साल पहले स्थापित किया गया केसर दा ढाबा आज भी अमृतसर में अपने जायके की खुशबू बिखेर रहा है। चौक पासियां क्षेत्र में स्थित केसर दा ढाबा में माह की दाल और लच्छेदार परांठा व‌र्ल्ड फेमस है। 10 से 12 घंटे तक तांबे की तेग में पकने वाली दाल और तंदूर में सिंकने वाले लच्छेदार परांठे की खुशबू से चौक पासिया क्षेत्र महकता रहता है। सन् 1916 ईस्वी में लाला केसर मल ने लाहौर के शेखुपुरा में केसर दा ढाबा खोला था। लाला केसर मल और उनकी पत्नी पार्वती के हाथ में इतनी शफा थी कि ढाबे में पकने वाली माह की दाल पाकिस्तान के बाशिंदे अंगुलियां चाट- चाट कर खाते थे। सिर्फ एक लच्छेदार परांठा ही लोगों की भूख शांत करने के लिए काफी था। बंटवारे के बाद केसर मल परिवार सहित अमृतसर आ बसे। ‘केसर दा ढाबा’ पाकिस्तान में छूट गया, लेकिन केसर मल ने चौक पासियां में केसर दा ढाबा खोल दिया। अमृतसर के मीठे पानी में माह की दाल का स्वाद और लाजवाब हो गया। लच्छेदार परांठा भी और खिल उठा। केसरमल के देहावसान के बाद पुत्र शोरी मल ने कामकाज संभाला।

एक वक्त ऐसा भी आया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के लिए यहां से खाना पैक करवाकर भेजा गया। शोरी मल के देहांत के बाद उनके पुत्र विजय कुमार केसर दा ढाबा चला रहे हैं। असल में इस ढाबे को चौथी पीढ़ा संभाल रही है। विश्र्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थल श्री हरिमंदिर साहिब के निकट स्थित केसर दा ढाबा में देशी-विदेशी पर्यटकों का आगमन ज्यादा है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड जैसे बड़े देशों से आने वाले पर्यटक इस ढाबे की दाल और परांठे का स्वाद जरूर चखते हैं। यहां हर रोज ढाई क्विंटल आटे से लच्छेदार परांठे बनाए जाते हैं। माह की दाल 1.20 क्विंटल लगती है। तांबे की बड़ी देग में चालीस किलो दाल 12 घंटे तक धीमी आंच में पकती है।

मक्खन फिश कॉर्नर

वेज के साथ ही नॉनवेज डिशेज भी पर्यटकों को लुभाते हैं। अंबरसरी फिश, फ्राई फिश, तंदुरी फिश, अंबरसरी तंदूरी चिकेन, मटन टिक्का, चिल्ली चिकेन, बटन चिकेन, मलाई चिकेन आदि देशी-विदेशी पर्यटकों को बहुत पंसद आते हैं। मजीठा रोड स्थित मक्खन फिश कॉर्नर में अंबरसरी फिश के दूर-दूर तक चर्चे हैं। असल में अंबरसरी फिश की रेसिपी ईजाद करने वाले मक्खन फिश कॉर्नर के मालिक सुच्चा सिंह थे। 1962 में सुच्चा सिंह ने अंबरसरी फिश तैयार की थी। निसंदेह, यह डिश कम समय में लोगों को भा गई। मस्टर्ड ऑयल में पकने वाली अंबरसरी फिश आज देश के कोने-कोने में पहुंच चुकी है।

सुच्चा सिंह के बाद उनके पुत्र मलकीत सिंह और मलकीत के पुत्र हरजीत सिंह तथा सिमरनदीप सिंह स्वाद के इस कारोबार को चला रहे हैं। मलकीत सिंह बताते हैं कि वह तंदूरी फिश भी बनाते हैं। यह देश में कहीं और बनती भी होगी तो ऐसा स्वाद नहीं मिलेगा, क्योंकि इसे धीमी आंच में पकाया जाता है और अपने हाथों से तैयार किए गए मसाले डाले जाते हैं। सभी नॉनवेज वेरायटीज में मक्खन और देसी घी का प्रयोग किया जाता है। अमृतसरी कबाब और चिकन टिक्का के बिना लोगों का खाना अधूरा रह जाता है। स्वाद और गुणवत्ता की वजह से सिने सितारे, राजनीतिज्ञ और देश के बड़े पदों पर बैठे अधिकारी भी यहां आते हैं।

रेल कोच में रेस्त्रां

रेल के डिब्बे की तरह दिखने वाला यह केबिन असल में रेस्टोरेंट है। अमृतसर के लॉरेंस रोड पर स्थित छोटी सी जगह में बनाए गए इस रेस्टोरेंट को ‘ईट एंड टेस्ट’ नाम दिया गया है। अमृतसर में फूड कॉर्नर की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन कोच में रेस्टोरेंट का कॉन्सेप्ट बिल्कुल अलग है। 40 सीटर यह कोच नुमा रेस्टोरेंट पूरी तरह से एयरकंडीशन्ड है। यहां लोगों को इंडियन, कांटीनेंटल, चाइनीज व इटेलियन फूड परोसे जाते हैं। इसे दिल्ली के एक आर्किटेक्ट ने बनाया था। लोग यहां आकर खाना भी खाते हैं और रेल कोच में बैठने का आनंद भी उठाते हैं।

खाने के बाद लस्सी भी जरूरी है

कहानियों में आपने सुना होगा कि पंजाब में दूध की नदियां बहती हैं। खाने-पीने की लाजवाब और बेशुमार वेराइटी के साथ ‘अंबरसरी लस्सी’ भी अपना अलग रुतबा रखती है। इसका मीठा जादू हर किसी पर चलता है। शहर में आने वाला कोई भी शख्स मक्खन और मलाई वाली लस्सी जरूर पीता है। जिस किसी ने भी अमृतसर की लस्सी पी, वह इसका कायल बन गया। ढाब खटिकां बाजार में स्थित आहूजा लस्सी भंडार में पर्यटकों की खासी भीड़ रोजाना लगती है। सन् 1957 में तरुण आहूजा के दादा किशन लाल ने ढाब खटीकां में लस्सी की दुकान शुरू की। 61 साल बाद भी लस्सी का वही स्वाद बरकरार है। दादा के बाद पिता, चाचा और अब वो लस्सी बनाते हैं। शुद्ध दूध व दही से बनी लस्सी में मलाई व मक्खन इसका टेस्ट बढ़ाते हैं। क्रिकेटर कपिल देव, बॉलीवुड स्टार गोविंदा और पंजाब के मौजूदा मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के अलावा देश-विदेश की जानी-मानी हस्तियां लस्सी का स्वाद चख चुकी हैं।

सच तो यह है कि अमृतसर खाने की बात निराली है। शहर के सभी रेस्त्रां, ढाबे या होटल में पंजाब के परंपरागत पकवान आसानी से मिल जाते हैं। देश विदेश से आने वाले पर्यटक छोले-कुलचे, जलेबी, कड़ाही दूध, आलू टिक्की, छोले-भठूरे, चाट-पापड़ी, मटका कुल्फी, मट्ठी-छोले जैसी डिशेज गली-गली में दुकानों पर वाजिब दाम पर मिल जाती है। 12 दरवाजों पर आधारित इस अंदरूनी शहर में अगर दस रुपये भी जेब में हों तो इंसान पेट-पूजा कर सकता है।

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