अयोध्या में संपत्ति विवाद में महंत की हत्या, चार दशक ऐसी अनेक हत्याएं

विद्यामाता मंदिर विद्याकुंड की महंती के दावेदार रामचरनदास की बीती रात हत्या कर दी गई। पुलिस ने शव उनके कक्ष में स्थित चौकी के नीचे से बरामद किया। उनका हाथ और मुंह बंधा हुआ था। समझा जाता है कि उनकी हत्या गला घोंटकर की गई। पुलिस मंदिर में रहने वाले साधुवेशधारी परमात्मादास को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। रामचरनदास पर गत वर्ष भी जानलेवा हमला हुआ था और इस मामले में परमात्मादास के विरुद्ध अभियोग पंजीकृत किया गया था। उल्लेखनीय है कि संपत्ति विवाद में संतों-महंतों की हत्या का सिलसिला दशकों पुराना है। अब तक बड़ी संख्या में हत्याएं हो चुकी है।विद्यामाता मंदिर विद्याकुंड की महंती के दावेदार रामचरनदास की बीती रात हत्या कर दी गई। पुलिस ने शव उनके कक्ष में स्थित चौकी के नीचे से बरामद किया। उनका हाथ और मुंह बंधा हुआ था। समझा जाता है कि उनकी हत्या गला घोंटकर की गई। पुलिस मंदिर में रहने वाले साधुवेशधारी परमात्मादास को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। रामचरनदास पर गत वर्ष भी जानलेवा हमला हुआ था और इस मामले में परमात्मादास के विरुद्ध अभियोग पंजीकृत किया गया था। उल्लेखनीय है कि संपत्ति विवाद में संतों-महंतों की हत्या का सिलसिला दशकों पुराना है। अब तक बड़ी संख्या में हत्याएं हो चुकी है।      महंतों की हत्या का लंबा इतिहास  चार दशक पूर्व रामनगरी की सर्वाधिक प्रतिष्ठापूर्ण पीठ रघुनाथदासजी की छावनी के महंत रामप्रतापदास की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई थी। इस घटना के करीब एक दशक के अंतराल में रघुनाथदासजी की छावनी के एक अन्य महंत प्रेमनारायणदास की हत्या का मामला सामने आया था।  अयोध्या में मंठ-मंदिरों के स्वामित्व विवाद में ही नौवें दशक के उत्तरार्द्ध में सनातन मंदिर के महंत मोहनानंद झा को गोलियों से भून दिया गया था।  इसी तरह मोहनानंद झा के भाई रामकृष्णदास की करंट लगने से संदिग्ध हालत मौत को भी मंदिर के स्वामित्व विवाद से जोड़कर देखा जाता रहा। मंदिर हथियाने की कोशिश में इसी दशक की शुरुआत में कुछ साधुवेशधारियों हनुमतभवन के महंत रामदेवशरण की बम से प्रहार कर हत्या कर दी थी। 1991 में नगरी की प्रमुख पीठों में शुमार जानकीघाट बड़ास्थान के महंत मैथिलीशरण की उनके ही कक्ष में गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी।  1995 को संपत्ति विवाद के ही चलते हनुमानगढ़ी से जुड़े महंत रामाज्ञादास पर गोलियों की बौछार कर साधुवेशधारी अपराधियों ने मौत के घाट उतार दिया।  एक महंत रामकृपालदास की तो रामनगरी में एक दशक तक तूती बोलती रही लेकिन नवंबर 1996 में उन्हें भी गोलियां बरसाकर मौत की नींद सुला दिया गया।  संत समाज के बीच घुले मिले अराजकतत्वों ने ही 1999 में अयोध्या में विद्याकुंड बड़ास्थान के महंत रामकृपालदास की संपत्ति विवाद में हत्या कर दी गई।  लंबे समय से व्याप्त विवाद    संपत्ति व महंती के विवाद को लेकर अयोध्या में महंत दयानंद दास का अपहरण यह भी पढ़ें विद्यादेवी मंदिर की महंती का विवाद लंबे समय से व्याप्त है और गत वर्ष रामचरनदास पर हमला इसी विवाद के चलते हुआ था। विवाद को ध्यान में रखकर पुलिस ने दोनों पक्षों को धारा 107/16 में पाबंद भी कर रखा था और मंदिर में रात्रि के दौरान एक होमगार्ड की ड्यूटी भी लगाई गई थी। गुरुवार रात 10 बजे के करीब होमगार्ड जब ड्यूटी पर पहुंचा, तब उसने मंदिर में सन्नाटा पसरा देखा। वह अंदर गया तो देखा कि रामचरनदास के कक्ष की वस्तुएं बिखरी पड़ी हैं। हालांकि पहली नजर में होमगार्ड को चौकी के नीचे छिपाई गई महंत की लाश नहीं नजर आई। उसने उच्चाधिकारियों को फोन कर अवगत कराया और इसके बाद मौके पर पहुंचे रायगंज चौकी प्रभारी यशंवत द्विवेदी ने लाश बरामद की। इसके बाद मंदिर पर पुलिस के आलाधिकारियों का तांता लग गया।      फैजाबाद के जमथराघाट में आग से हाहाकार, पहले चिंगारी भड़की फिर धड़ाधड़ सिलेंडर फटे यह भी पढ़ें साधना में पगे थे महंत रामचरनदास   65 वर्षीय मृत महंत रामचरनदास साधना में पगे साधु थे। यूं तो विद्याकुंड मंदिर के साकेतवासी महंत रघुवरदास के शिष्य थे पर वह 26 वर्ष तक खड़े रहकर साधना का रिकार्ड बनाने वाले दिग्गज संत भगवानदास खड़ेश्वरी के साधक शिष्य थे और उन्हीं की प्रेरणा से रामचरनदास ने भी 10 वर्ष तक निरंतर खड़े रहकर आराध्य की साधना की। उनकी साधना से आइएएस अधिकारी किंजल सिंह भी प्रभावित थीं और दो वर्ष फैजाबाद की जिलाधिकारी रहते किंजल सिंह के इशारे पर रामचरनदास को पुलिस ने मंदिर पर कब्जा दिलाया था।

 महंतों की हत्या का लंबा इतिहास

  • चार दशक पूर्व रामनगरी की सर्वाधिक प्रतिष्ठापूर्ण पीठ रघुनाथदासजी की छावनी के महंत रामप्रतापदास की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई थी।
  • इस घटना के करीब एक दशक के अंतराल में रघुनाथदासजी की छावनी के एक अन्य महंत प्रेमनारायणदास की हत्या का मामला सामने आया था। 
  • अयोध्या में मंठ-मंदिरों के स्वामित्व विवाद में ही नौवें दशक के उत्तरार्द्ध में सनातन मंदिर के महंत मोहनानंद झा को गोलियों से भून दिया गया था। 
  • इसी तरह मोहनानंद झा के भाई रामकृष्णदास की करंट लगने से संदिग्ध हालत मौत को भी मंदिर के स्वामित्व विवाद से जोड़कर देखा जाता रहा।
  • मंदिर हथियाने की कोशिश में इसी दशक की शुरुआत में कुछ साधुवेशधारियों हनुमतभवन के महंत रामदेवशरण की बम से प्रहार कर हत्या कर दी थी।
  • 1991 में नगरी की प्रमुख पीठों में शुमार जानकीघाट बड़ास्थान के महंत मैथिलीशरण की उनके ही कक्ष में गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। 
  • 1995 को संपत्ति विवाद के ही चलते हनुमानगढ़ी से जुड़े महंत रामाज्ञादास पर गोलियों की बौछार कर साधुवेशधारी अपराधियों ने मौत के घाट उतार दिया। 
  • एक महंत रामकृपालदास की तो रामनगरी में एक दशक तक तूती बोलती रही लेकिन नवंबर 1996 में उन्हें भी गोलियां बरसाकर मौत की नींद सुला दिया गया। 
  • संत समाज के बीच घुले मिले अराजकतत्वों ने ही 1999 में अयोध्या में विद्याकुंड बड़ास्थान के महंत रामकृपालदास की संपत्ति विवाद में हत्या कर दी गई। 

लंबे समय से व्याप्त विवाद 

विद्यादेवी मंदिर की महंती का विवाद लंबे समय से व्याप्त है और गत वर्ष रामचरनदास पर हमला इसी विवाद के चलते हुआ था। विवाद को ध्यान में रखकर पुलिस ने दोनों पक्षों को धारा 107/16 में पाबंद भी कर रखा था और मंदिर में रात्रि के दौरान एक होमगार्ड की ड्यूटी भी लगाई गई थी। गुरुवार रात 10 बजे के करीब होमगार्ड जब ड्यूटी पर पहुंचा, तब उसने मंदिर में सन्नाटा पसरा देखा। वह अंदर गया तो देखा कि रामचरनदास के कक्ष की वस्तुएं बिखरी पड़ी हैं। हालांकि पहली नजर में होमगार्ड को चौकी के नीचे छिपाई गई महंत की लाश नहीं नजर आई। उसने उच्चाधिकारियों को फोन कर अवगत कराया और इसके बाद मौके पर पहुंचे रायगंज चौकी प्रभारी यशंवत द्विवेदी ने लाश बरामद की। इसके बाद मंदिर पर पुलिस के आलाधिकारियों का तांता लग गया। 

साधना में पगे थे महंत रामचरनदास 

65 वर्षीय मृत महंत रामचरनदास साधना में पगे साधु थे। यूं तो विद्याकुंड मंदिर के साकेतवासी महंत रघुवरदास के शिष्य थे पर वह 26 वर्ष तक खड़े रहकर साधना का रिकार्ड बनाने वाले दिग्गज संत भगवानदास खड़ेश्वरी के साधक शिष्य थे और उन्हीं की प्रेरणा से रामचरनदास ने भी 10 वर्ष तक निरंतर खड़े रहकर आराध्य की साधना की। उनकी साधना से आइएएस अधिकारी किंजल सिंह भी प्रभावित थीं और दो वर्ष फैजाबाद की जिलाधिकारी रहते किंजल सिंह के इशारे पर रामचरनदास को पुलिस ने मंदिर पर कब्जा दिलाया था।

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