आईये, जानें, क्या सच में होते हैं भूत या है सिर्फ अफवाह…विडियो

1969 में उड़ीसा के एक कस्बे खरियार रोड में दो मित्रों ने मिलकर अजीब शर्त लगाई, शर्त यह थी कि अमावस्या की रात को दोनों में से जो भी कब्रिस्तान में एक खास कब्र के नीचे कील ठोक कर आएगा, उसे 500 रु. ईनाम में मिलेंगे। एक मित्र कब्रिस्तान जाने पर राजी हो गया, शर्त के मुताबिक बारिश के मौसम की घनघोर अंधेरी रात में कील ठोक कर ज्यों ही वह लौटने लगा कि अचानक उसे लगा जैसे उस कब्र में कोई उसकी धोती पकड़ कर खींच रहा है, ऐसा डरावना ख्याल आते ही उसने जोरों से चीख मारी और तुरन्त वहीं गिरकर बेहोश हो गया।  सुबह लोगों को उसकी लाश मिली, लोगों ने यही समझा कि उसे किसी प्रेत ने मार दिया था क्योंकि उसने कब्रिस्तान में कील ठोकने का दुस्साहस किया था, पर वह व्यक्ति कैसे मरा था? बहुत दिनों तक वह भेद ही रहा। उसमें न तो कोई साजिश थी और न ही प्रेतात्माओं की कारगुजारी, यह रहस्य घटना के बहुत दिनों बाद खुला।

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भूतप्रेत के बारे में न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में तरह-तरह की भयभीत कर देने वाली धारणाएं फैली हैं। भूतप्रेतों की बातें न केवल पिछड़े हुए गांव, कस्बों में बल्कि बड़े-बड़े शहरों में भी सुनने को मिलती हैं जहां बैगा, गुनिया, ओझा, तांत्रिक इसी अंधविश्वास के कारण लोगों को लूट रहे हैं और मौज उड़ा रहे हैं। ऐसे में प्रश्र उठता है कि क्या सचमुच भूत-प्रेत होते हैं? इस प्रश्र का एक ही जवाब है नहीं परन्तु यदि भूतप्रेत नहीं होते तो उनकी बातें आज भी अखबारों में, किंवदंतियों में या किताबों और फिल्मों में पढऩे-सुनने को क्यों मिलती हैं? इस प्रश्र के उत्तर में हम विज्ञान की एक शाखा मनोविज्ञान के उस तर्क का उल्लेख करेंगे जिसमें फ्रायड ने इसे आंखों या दिमाग का भ्रम मात्र माना है, यह भ्रम निर्मूल हो सकता है। जिस के मायने ये हैं कि हमारी आशंका बिल्कुल निर्मूल है तथा मिथ्या विश्वास भी हो सकता है। भूतप्रेत का डर ज्यादातर बच्चों को ही होता है, उनके मन में भूतप्रेतों, राक्षसों के डरावने किस्से, कहानियां पढ़कर एक गांठ बन चुकी होती है जो बड़े होने पर ही खत्म होती है।

पर यदि भूतप्रेत वास्तव में होते हैं या असमय होने वाली मौत के बाद व्यक्ति भूतप्रेत बन जाता है और वह अपने हत्यारे से बदला लेता है, ऐसा मानने वालों से पूछा जाना चाहिए कि यदि भूत अपने हत्यारे से बदला लेता है तो आज दुनिया में रोज सैंकड़ों हत्याएं होती हैं और उनके हत्यारे खुलेआम घूमते हैं उनको तो कुछ हानि नहीं होती, यदि यह सच हो तो विश्व की सरकारें कानून और व्यवस्था के लिए पुलिस विभाग बनाने के बजाय भूतप्रेत संरक्षण विभाग खोल देंगी जिनमें सारे भूत-प्रेत एक-एक करके अपने हत्यारों से और सताने वालों से बदला लेंगे तथा उनका आह्वान करने के लिए ओझाओं को नियुक्त किया जाएगा। यदि यह सच होता तो द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के हाथों मारे गए करोड़ों यहूदियों की आत्माएं आज जर्मनों का जीना मुहाल कर देतीं।

वास्तव में भूतप्रेतों की बातें मनगढ़ंत हैं। भूतप्रेतों पर शोध करने वाले भी पर्याप्त प्रमाण नहीं जुटा सके हैं। हैरी प्राइस नामक व्यक्ति जिसने सन् 1940 में पुस्तक ‘द मोस्ट हांटेड हाऊस इन इंगलैंड’ (इंगलैंड का सर्वाधिक भूतग्रस्त मकान) लिखी थी, लगातार 40 वर्ष तक भूतप्रेतों का अस्तित्व ढूंढने का प्रयास करता रहा। उसने कई प्रमाण देने की कोशिश की जो बाद में जालसाजी के नमूने साबित हुए।

सुनसान खंडहरों, मकानों में तरह-तरह की आवाजें आने, विभिन्न तरह की रोशनी दिखाई देने की खबरें मिलती हैं पर वास्तव में होता यह है कि इन मकानों में अपराधी किस्म के लोग, तस्कर, नशीले पदार्थ बनाने बेचने वाले अपना अड्डा बना लेते हैं और अफवाह फैला देते हैं कि यहां भूत रहते हैं ताकि इन मकानों और खंडहरों के पास कोई जाए नहीं और यह लोग निश्चित होकर अपना काम करते रहें।

कई बार भूत सचमुच आदमी के प्राण ले लेता है, मगर वह भूत नहीं होता, वह होता है भ्रम का भूत। शुरूआत में बताई गई घटना में भी भय के भूत ने उस दोस्त के प्राण लिए थे जो कब्रिस्तान में कील ठोकने गया था, हुआ यह था कि उसने रात के अंधेरे में जल्दी-जल्दी में अपनी धोती पर कील ठोंक दी थी जब वह उठा तो उसे लगा कि कब्र में से कोई उसकी धोती खींच रहा है। इस बात का पता विशेषज्ञों को तब चला जब उन्होंने कील में फंसी मृतक की धोती के टुकड़े को बरामद किया।   

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