इंसाफ के लिए जान तक कुर्बान करने वाले पत्रकार की ये कहानी

New Delhi: दुनिया आज यानी 3 मई को प्रेस की आजादी के दिन के तौर पर मनाती है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खंभा माना जाता है। लोकतंत्र में एक बड़ी जिम्मेदारी मीडिया की होती है। कई बार ये जिम्मेदारी निभाते-निभाते मीडिया के रहनुमाओं को कुर्बानी देनी पड़ती है। जान कुर्बान

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शाम का वक्त था, बाजार में भीड़ लगी हुई थी। हर कोई अपने-अपने काम में व्यस्त था। ये नजारा सिवान शहर का था। कर्मचारी काम करके अपने-अपने घरों को लौट रहे थे। कोई रिक्शा से, कोई कार से और कोई बाइक से। इस तरह के हालात सिवान में रोजाना रहते हैं। लेकिन वो शाम कुछ अलग थी।

डरावनी थी, भयावह थी। एक शख्स बाइक पर सवार होकर ऑफिस से घर के निकला था। जैसे ही वो शख्स अपनी बाइक के साथ स्टेशन के पास पहुंचा तो फ्लाईओवर के पास कुछ लोगों ने उसे रोक लिया। उन लोगों ने इस शख्स से कुछ नहीं बोला। अपनी जेब से पिस्तौल निकाली और उसके सीने में गोलियां दाग दी। उस शख्स को दो गोली मारी गई। वो लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़ा। आरोपी बदमाश फरार हो गए। 

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ये थी जर्नलिस्ट राजदेव रंजन की जिंदगी के आखिरी कुछ पलों की दास्तां। राजदेव रंजन एक दैनिक हिंदी अखबार में रिपोर्टर थे और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या पर हंगाम खड़ा हो गया। सियासी दलों से लेकर सामाजिक संगठनों ने कई मामलों में आरोपी जेल में बंद एक बडे लीडर पर पर सवाल उठाया।

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पहले तो पुलिस ने मामले की जांच की। कई संदिग्धों को पकड़ा। उनसे पूछताछ की और कई राज खुले। लेकिन धीरे-धीरे इस हत्याकांड की सुई एक बड़े साजिश की तरफ इशारा करने लगी। लेकिन जब हत्याकांड की जांच की आंच हाईप्रोफाइल लोगों तक पहुंचने लगी। तो इसकी जांच सीबीआई के सौंप दिया गया।

जब सीबीआई ने जांच शुरू की तो एक के बाद एक खुलासे होने लगे। सीबीआई ने मामले की मुख्य आरोपी अजहरूद्दीन उर्फ लड्डन मियां और सोनू गुप्ता को शिकंजे में लिया। जब इन आरोपियों से पूछताछ हुई तो सबूत सामने आने लगे। हत्याकांड के तार कुख्यात शहाबुद्दीन से जुड़ने लगे। राजदेव ने शहाबुद्दीन के खिलाफ कई खबरें लिखी थी। जिसके बाद उनको कई बार धमकी भी मिली थी। हत्याकांड का एक आरोपी मोहम्मद कैफ पूर्व सीएम लालू यादव के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री तेजप्रताप यादव के साथ फोटो खिंचवाता नजर आया था।

मीडिया को लेकर हमेशा कई तरह के सवाल उठते रहते हैं। कभी इसको सत्ता का गुलाम कहा जाता है तो कभी सरकार की मुखालिफत करने वाली संस्था कहा जाता है। लेकिन सच्चाई इससे अलग है। मीडिया को चाहे सत्ता हो या विपक्ष, हर तरफ से चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस संघर्ष में कई बार जान भी चली जाती है। पत्रकारों पर जुल्म भी होते हैं, उनकी हत्याएं तक होती रही हैं।

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