तो क्या? इसीलिए अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की जिम्मेदारी लेने से डर रहा है लश्कर

जहां एक तरफ केंद्रीय जांच एजेंसिया अमरनाथ यात्रियों पर हुए आतंकी हमले में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का हाथ मान रहे हैं, वहीं यह आतंकी संगठन लगातार हमले की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर रहा है।तो क्या? इसीलिए अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की जिम्मेदारी लेने से डर रहा है लश्कर

विशेषज्ञों की मानें तो लश्कर को डर है कि अगर वह हमले की जिम्मेदारी लेता है तो पाकिस्तान पर आतंकियों पर कार्रवाई करने के लिए वैश्विक दबाव और ज्यादा बन सकता है। विशेषकर लश्कर सरगना हाफिज सईद पर कार्रवाई के लिए अमेरिका समेत वैश्विक समुदाय ने पाकिस्तान पर खासा दबाव बना रखा है। 

लश्कर जैसे आतंकी संगठनों के लिए अमरनाथ यात्रा की पवित्रता मायने नहीं रखती है। इसके अलावा घाटी के कट्टरवादी और अलगाववादी इस यात्रा को कश्मीर घाटी की संस्कृति के खिलाफ मानते रहे हैं। तीर्थयात्रियों पर हमला करने वालों में चार आतंकवादी शामिल थे, जिनकी अगुवाई इस्माइल नाम का आतंकवादी कर रहा था।इस्माइल वहीं आतंकी है जो 2016 में पाकिस्तान से आया था और पंपोर में लगातार अपने ठिकाने बदलता रहता है।

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए एक खुफिया अधिकारी ने बताया, ‘अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की जिम्मेदारी लेने से  लश्कर-ए-तैयबा इसलिए इंकार कर रहा है क्योंकि यह हमला सुरक्षा बलों के बजाय निहत्थे आम लोगों पर हुआ है। निर्दोष लोगों को निशाना बनाए जाने के कारण उसकी और पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना हो सकती है, जिससे पाकिस्तान पर दबाव बढ़ सकता है।’  सुरक्षा एजेंसियों का माना है कि शायद कोई भी आतंकी संगठन इस हमले की जिम्मेदारी नहीं लेगा क्योंकि इससे स्थानीय लोगों में आतंकवादियों के खिलाफ गुस्सा भड़क सकता है। अमरनाथ यात्री स्थानीय लोगों के रोजगार के मुख्य साधन रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, हमलावरों ने बस पर दो बार हमला किया था। पहला हमला हब्बा खातून पेट्रोल पंप के पास तथा दूसरा उससे 75 कदम की दूरी पर किया था। आतंकियों ने पुलिस नाके पर भी फायर किया था और बाद अरवनी स्थित जी/90 बटालियन कैंप पर भी गोलियां चलाई थीं। एक अधिकारी ने बताया, ‘कई बार फायरिंग करने के बाद आतंकी भागने में कामयाब हो गए।’

दूसरी तरफ पाकिस्तान पर आतंकियों पर कार्रवाई करने को लेकर वैश्विक दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसी का नतीजा था कि पाकिस्तान को हाफिज सईद और जमात-उद-दावा के अन्य शीर्ष नेताओं को 30 जनवरी को नजरबंद करना पड़ा था। इसके बाद अप्रैल में सरकार ने सईद की नजरबंदी को 90 दिन यानी 30 जुलाई तक और बढ़ा दिया था। 

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