उत्तराखंड में 17 साल में हुए 843 सड़क हादसे, ढाई हजार लोगों की हुई मौत

उत्तराखंड में हर महीने चार बस सड़क हादसे का शिकार हो रही हैं। यानी कि बीते 17 साल में 843 बस हादसे हो चुके हैं। वहीं, अन्य वाहनों से हुए हादसों को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो इनमें करीब ढाई हजार लोगों की मौत हो चुकी है और पांच हजार लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। पुलिस की मानें तो अधिकांश बसें ओवरलोडिंग या फिटनेस न होने की वजह से दुर्घटना का शिकार हुई हैं। पौड़ी के धूमाकोट में हुए बस हादसे में 48 लोगों की मौत से राज्य की सरकारी मशीनरी और परिवहन सुविधाओं पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। अप्रैल 2016 में देहरादून के त्यूणी में हुए बस हादसे में 44 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। मगर न तो सरकार ने इससे सबक लिया और न ही हादसों के मूल कारणों की पड़ताल कर इसे रोकने के लिए कोई ठोस पहल की गई। नतीजा धूमाकोट हादसे के रूप में सामने हैं। यह स्थिति तब है जब राज्य में एक माह में औसतन चार बस किसी न किसी रूप में हादसे का शिकार होती हैं और लोग अपनी जान गंवा बैठते हैं। हादसों के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। त्यूणी बस हादसे के बाद उत्तराखंड पुलिस ने विगत 17 वर्षो में अलग-अलग वाहनों से हुए हादसों की फाइलें पलटीं तो सामने आया कि इस दौरान बसों से 843, ट्रकों से 1139, जीप से 849, मोटरसाइकिलों से 1548, टैक्सी से 969 और कार से 2129 सड़क हादसे हो चुके हैं। इनमें 2497 की मौत हो चुकी है और 4978 लोग घायल हुए। पर्यटन और चारधाम यात्रा को लेकर उत्तराखंड में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में अन्य राज्यों से लोग यहां आते हैं। इनमें से अधिकांश को न तो पर्वतीय मार्गो के तीव्र मोड़ की जानकारी होती है और न ही दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्रों के बारे में अंदाजा होता है। पुलिस सूत्रों की मानें तो हादसे का शिकार होने वालों में चालीस फीसद वाहन बाहरी राज्यों के होते हैं।पर्यटन और चारधाम यात्रा को लेकर उत्तराखंड में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में अन्य राज्यों से लोग यहां आते हैं। इनमें से अधिकांश को न तो पर्वतीय मार्गो के तीव्र मोड़ की जानकारी होती है और न ही दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्रों के बारे में अंदाजा होता है। पुलिस सूत्रों की मानें तो हादसे का शिकार होने वालों में चालीस फीसद वाहन बाहरी राज्यों के होते हैं।

पर्यटन और चारधाम यात्रा को लेकर उत्तराखंड में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में अन्य राज्यों से लोग यहां आते हैं। इनमें से अधिकांश को न तो पर्वतीय मार्गो के तीव्र मोड़ की जानकारी होती है और न ही दुर्घटना बाहुल्य क्षेत्रों के बारे में अंदाजा होता है। पुलिस सूत्रों की मानें तो हादसे का शिकार होने वालों में चालीस फीसद वाहन बाहरी राज्यों के होते हैं।

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