एक ऐसा मंदिर जहाँ पृथ्वी के गर्भ से निकल रही ज्वाला

भारत को हम मंदिरों का देश भी कह सकते है, यहाँ स्थित मंदिर लोगों की आस्था का मुख्य केंद्र है. भारतीय मंदिरों में शक्तिपीठों का बहुत महत्व है, जिनका निर्माण माता सती के अंगों के पृथ्वी पर गिरने से हुआ था. इन्ही शक्ति पीठों में से एक प्रसिद्ध शक्ति पीठ माँ ज्वाला देवी है, जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित है. इस शक्ति पीठ को जोतावाली माता के नाम से भी जाना जाता है. माना जाता है कि इस शक्ति पीठ का निर्माण यहाँ माता की जीभ के गिरने से हुआ था.

इस मंदिर के विषय में ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल में पांडवों में इस मंदिर की खोज अपने अज्ञातवास के समय की थी. ज्वाला देवी मंदिर का निर्माण राजा भूमिचंद ने करवाया था तथा महाराजा रणजीत सिंह व राजा संसारचंद ने इस मंदिर को सन 1835 में आधुनिता प्रदान की थी. ज्वाला देवी मंदिर में माता नौ ज्योतियों के रूप में अपने भक्तों को दर्शन देती है, जिन्हें महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी माना जाता है.

इस मंदिर की ख्याति को सुनकर अकबर ने इस मंदिर में जलती हुई ज्वालाओं को बुझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सका व माता के चमत्कार को देखकर नतमस्तक हो गया. अकबर के द्वारा इस मंदिर में माता को सोने का छत्र चढ़ाया गया था. जिसे माता ने स्वीकार नहीं किया व छत्र अनजानी धातु में परिवर्तित होकर दूर जा गिरा जिसे बाद में कोई भी उठा नहीं सका. सदियों से इस मंदिर की ज्वाला बिना किसी कृत्रिम संसाधन के स्वतः ही जलती चली आ रही है, जो वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बनी हुई है.

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