एक देश एक चुनाव: क्या संविधान में है इज़ाज़त ?

 ‘एक देश एक चुनाव’ के मुद्दे पर केंद्र सरकार की पहल के बाद अब लॉ कमीशन ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस मिशन पर काम करना शुरू कर दिया है. विधि आयोग द्वारा इस मुद्दे पर सारी कानूनी और संवैधानिक संभावनाओं की तलाश की जा रही है. सूत्रों के अनुसार विधि आयोग इस मुद्दे पर एक लिस्ट तैयार करके विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श कर रही है.नई दिल्ली: 'एक देश एक चुनाव' के मुद्दे पर केंद्र सरकार की पहल के बाद अब लॉ कमीशन ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस मिशन पर काम करना शुरू कर दिया है. विधि आयोग द्वारा इस मुद्दे पर सारी कानूनी और संवैधानिक संभावनाओं की तलाश की जा रही है. सूत्रों के अनुसार विधि आयोग इस मुद्दे पर एक लिस्ट तैयार करके विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श कर रही है.  दरअसल, इस मिशन को साकार करना इतना आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए संविधान के कुछ प्रावधानों में भी बदलाव करना होगा. इसमें आर्टिकल 83, आर्टिकल 85, आर्टिकल 172, आर्टिकल 174, आर्टिकल 356 और दसवां शेड्यूल में बदलाव करना होगा. इसके अलावा 1951 के रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट में भी बदलाव करना होगा. और इन प्रावधानों में बदलाव करना आसान इसलिए नहीं है क्योंकि 1973 में केशवानंद बनाम भारती केस में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान में बदलाव नहीं किया जा सकता.  अब लॉ कमीशन को इन दोनों मुद्दों के बीच सामंजस्य बिठाकर रास्ता निकलना है, क्योंकि एक साथ चुनाव कराने के फायदे तो हैं ही, जैसे समय की बर्बादी रुकेगी, बार-बार चुनाव होने पर लगने वाले खर्च पर अंकुश लगेगा.सूत्रों ने बताया है कि एक साथ चुनाव कराने पर लगभग 10000 करोड़ का खर्च आएगा, जो अलग-अलग चुनाव कराने के खर्च से काफी कम है. लेकिन इस नियम को लागू करने के लिए विधि आयोग को संविधान के प्रावधानों में बदलाव करना होगा, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट आड़े आएगा.

दरअसल, इस मिशन को साकार करना इतना आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए संविधान के कुछ प्रावधानों में भी बदलाव करना होगा. इसमें आर्टिकल 83, आर्टिकल 85, आर्टिकल 172, आर्टिकल 174, आर्टिकल 356 और दसवां शेड्यूल में बदलाव करना होगा. इसके अलावा 1951 के रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट में भी बदलाव करना होगा. और इन प्रावधानों में बदलाव करना आसान इसलिए नहीं है क्योंकि 1973 में केशवानंद बनाम भारती केस में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान में बदलाव नहीं किया जा सकता.

अब लॉ कमीशन को इन दोनों मुद्दों के बीच सामंजस्य बिठाकर रास्ता निकलना है, क्योंकि एक साथ चुनाव कराने के फायदे तो हैं ही, जैसे समय की बर्बादी रुकेगी, बार-बार चुनाव होने पर लगने वाले खर्च पर अंकुश लगेगा.सूत्रों ने बताया है कि एक साथ चुनाव कराने पर लगभग 10000 करोड़ का खर्च आएगा, जो अलग-अलग चुनाव कराने के खर्च से काफी कम है. लेकिन इस नियम को लागू करने के लिए विधि आयोग को संविधान के प्रावधानों में बदलाव करना होगा, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट आड़े आएगा. 

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