कावेरी विवाद: 10 बिंदुओं में जानिए, आखि‍र क्यों 137 साल से पानी के लिए लड़ रहे हैं लोग

कोवरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट आज अपना निर्णय सुना सकता है. इसे देखते हुए कर्नाटक और तमिलनाडु में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. कावेरी जल विवाद ट्राइब्यूनल ने इस मसले पर 5 फरवरी को अपना अंतिम आदेश दिया था, जिसे कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.कावेरी विवाद: 10 बिंदुओं में जानिए, आखि‍र क्यों 137 साल से पानी के लिए लड़ रहे हैं लोग

कावेरी को दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है. यह पश्चिमी घाट के पर्वत ब्रह्मगिरी से निकली है. इसकी लम्बाई करीब 800 किलोमीटर है. कावेरी नदी के डेल्टा पर अच्छी खेती होती है. इसके पानी को लेकर दोनों राज्यों में विवाद है. सुप्रीम कोर्ट ने काफी लंबी सुनवाई के बाद पिछले साल 20 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. यह कर्नाटक और तमिलनाडु में इस नदी के जल पर निर्भर लाखों परिवारों के लिए काफी भावनात्मक मसला है. आइए 10 बिंदुओं में जानते हैं कि आखि‍र क्या है यह विवाद…

1. कावेरी नदी जल के वितरण और इस्तेमाल पर कर्नाटक और तमिलनाडु के इलाके के लोगों के बीच करीब 137 साल से विवाद चल रहा है. सबसे पहले 1881 में इस बार में तकरार सामने आई, जब तत्कालीन मैसूर राज्य ने कावेरी पर एक बांध बनाने का निर्णय लिया. तत्कालीन मद्रास राज्य ने इस पर आपत्ति की. ब्रिटिश लोगों की मध्यस्थता के बाद काफी साल बाद 1924 में जाकर इस पर एक समझौता हो पाया. लेकिन विवाद आजादी के पहले और आजादी के बाद भी जारी रहा.

2. साल 1990 में कावेरी जल विवाद ट्राइब्यूनल (CWDT) की स्थापना हुई.

साल 2007 में ट्राइब्यूनल ने इस पर अपना आदेश दिया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही साल 2013 में केंद्र सरकार ने इस आदेश से संबंधित अधिसूचना जारी की.

3. कावेरी नदी के जल पर चार राज्यों के करोड़ों लोग निर्भर हैं. ट्राइब्यूनल ने अपने आदेश में तमिलनाडु को 419 टीमएसी फुट, कर्नाटक को 270 टीमएसी फुट, केरल को 30 टीएमसी फुट (कावेरी की एक सहायक नदी राज्य से गुजरती है) और पुद्दुचेरी को 7 टीएमसी फुट जल का आवंटन किया था.

4. कावेरी ट्राइब्यूनल ने नदी में 100 साल की औसत जल उपलब्धता के आधार पर यह अंदाजा लगाया कि इसका आधा जल ही इस्तेमाल के लिए उपलब्ध हो तो भी 740 फुट टीएमसी जल मिल सकता है. ट्राइब्न्यूनल ने कर्नाटक को आदेश दिया कि उसे जून से लेकर मई तक हर साल 192 टीएमसी फुट पानी छोड़ना होगा.

5. ट्राइब्यूनल ने कहा कि खराब मानसून वाले साल में सभी राज्यों को इसी अनुपात में जल में कमी को साझा करना होगा. लेकिन इस प्रावधान ने कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद और बढ़ा दिया. 

6. पिछले कुछ वर्षों में अनियमित मानसून और बेंगलुरु में भारी जल संकट की वजह से कर्नाटक बार-बार यह कहता रहा है कि उसके पास कावेरी नदी बेसिन में इतना पानी नहीं है कि वह तमिलनाडु को उसका हिस्सा दे सके.  

7. दूसरी तरफ, तमिलनाडु भी कावेरी ट्राइब्यूनल के आदेश से खुश नहीं था. अगस्त 2016 में तमिलनाडु सुप्रीम कोर्ट की शरण में चला गया, यह दावा करते हुए कि ट्राइब्यूनल का आदेश गलत है, क्योंकि उसने सिर्फ फसल के मौसम का ध्यान रखा है.

8. तमिलनाडु का तर्क है कि राज्य के किसान साल में दो फसल बोते हैं, इसलिए उन्हें कर्नाटक के मुकाबले ज्यादा पानी मिलना चाहिए. तमिलनाडु का यह भी तर्क है कि उन्हें ट्राइब्न्यूल के आवंटन से ज्यादा पानी की जरूरत है, क्योंकि राज्य में साम्बा धान की खेती होती है, जिसमें ज्यादा पानी की जरूरत होती है.  9. तमिलनाडु सरकार के इस कदम के बाद कर्नाटक भी तत्काल सुप्रीम कोर्ट में चला गया और उसने राज्य के लिए अतिरिक्त पानी

की मांग की. कर्नाटक ने कहा कि मानसून में उतार-चढ़ाव और कम बारिश की वजह से उसके लिए यह संभव नहीं है कि ट्राइब्न्यूल द्वारा तमिलनाडु के लिए तय आवंटन से ज्यादा पानी छोड़ सके.

10. सितंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक को आदेश दिया कि वह अगले 10 दिनों के लिए हर दिन तमिलनाडु को कावेरी नदी का 15,000 क्यूसेक पानी दे. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद पूरे कर्नाटक में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए.

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