किसी थ्रिलर ड्रामे से कम नहीं यादव परिवार की सियासी कुश्ती..

मुलायम सिंह यादव के कुनबे में मची कलह किसी थ्रिलर ड्रामे से कम नहीं है. पिछले साल इसी अक्टूबर के महीने में मुलायम सिंह यादव का समाजवादी आंगन राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो गया था. इस आखड़े में एक तरफ से लंगोट कसकर अखिलेश यादव उतरे, तो दूसरी ओर उनके चाचा शिवपाल यादव.किसी थ्रिलर ड्रामे से कम नहीं यादव परिवार की सियासी कुश्ती..आजम खान ने राम और कृष्ण को बताया आपना आर्दश, सीएम योगी से पूछा सवाल!

चाचा-भतीजे की इस सियासी वर्चस्व की लड़ाई में अखिलेश को जहां राम गोपाल यादव का साथ मिला तो वहीं शिवपाल को मुलायम का. लेकिन मुलायम के हर दांव से शिवपाल और कमजोर होते गए और अखिलेश मजबूत. इस तरह समाजवादी पार्टी आज पूरी तरह से अखिलेशमय हो चुकी है.

मुलायम कुनबे में सियासी जंग का आगाज

मुलायम कुनबे में चाचा-भतीजे के बीच सियासी वर्चस्व की जंग काफी पुरानी है. मार्च 2012 में जब समाजवादी पार्टी प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज हुई तो सत्ता के सिंहासन पर मुलायम नहीं अखिलेश की ताजपोशी की गई. ये बात शिवपाल को नगावार गुजरी, लेकिन मुलायम के समझाने-बुझाने पर वो शांत हो गए. शिवपाल सरकार में दूसरे नंबर के नेता बने. लेकिन वक्त बे-वक्त दोनों के बीच शह-मात का खेल जारी रहा.

 मुलायम के अखाड़े में कुश्ती

अखिलेश यादव ने गायत्री प्रजापति सहित कई मंत्रियों को हटाया तो मुलायम और शिवपाल को ये बात नागवार गुजरी. मुलायम ने अखिलेश से इनको बहाल करने को कहा, लेकिन अखिलेश ने इससे साफ इंकार कर दिया. नेताजी ने अखिलेश को सबक सिखाने के लिए उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया. जवाब में अखिलेश ने भी शिवपाल को अपने मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया.

शिवपाल का संगठन पर कब्जा

शिवपाल को मुलायम के साथ-साथ अमर सिंह का भी साथ मिला. उन्होंने मंत्रिमंडल से बाहर होने के बाद अखिलेश के कई करीबियों को पार्टी से बाहर कर दिया. शिवपाल ने उनकी जगह अपने करीबियों को प्रदेश संगठन में तवज्जो दी. इतना ही नहीं पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. अखिलेश इससे भड़क गए उन्होंने साफ कहा कि परिवार में कलह के पीछे अमर सिंह का हाथ है.

अखिलेश के हाथों से छिना माइक

अखिलेश यादव की बढ़ी नाराजगी को देखते हुए, सुलह समझौते की कोशिश की गई. इसके लिए पार्टी मुख्यालय में अधिवेशन बुलाया गया. इस अधिवेशन में शिवपाल ने अपनी बात रखी. इसके बाद अखिलेश बोलने के लिए आए, उन्होंने जब पिता के खिलाफ छपी एक खबर का जिक्र शुरू किया तो शिवपाल यादव ने अखिलेश के हाथ से माइक छीन लिया और कहा कि CM झूठ बोल रहे हैं.

अखिलेश और रामगोपाल पार्टी से आउट

शिवपाल को मंत्रिमंडल में वापस न लेने के लिए मुलायम ने रामगोपाल को जिम्मेदार माना. मुलायम सिंह यादव ने प्रेस कांफ्रेंस करके अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता को भी यादव कुनबे में कलह का जिम्मेदार माना गया. इसके बाद मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक यादव की पत्नी आपर्णा यादव ने आगे आकर मोर्चा संभाला.

अखिलेश ने किया पार्टी पर कब्जा

पार्टी से बाहर किए जाने पर रामगोपाल यादव और अखिलेश यादव ने पार्टी का अधिवेशन बुलाया, जिसमें पार्टी के अधिकतर दिग्गज आए. इसमें मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटाकर अखिलेश यादव की ताजपोशी की गई और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. 

 सपा की लड़ाई चुनाव आयोग तक आई

समाजवादी पार्टी के मालिकाना हक की लड़ाई चुनाव आयोग तक आई. अखिलेश के पक्ष में पार्टी के ज्यादातर जनप्रतिनिधि थे. वहीं शिवपाल खेमे में सिर्फ दर्जन भर नेता ही रह गए. अमर सिंह शिवपाल के साथ चुनाव आयोग गए तो वहीं रामगोपाल, नरेश अग्रवाल सहित अभिषेक मिश्रा ने अखिलेश की पैरवी की. इसके बाद चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी का फैसला अखिलेश के पक्ष में किया.  

मुलायम नहीं उतरे चुनाव प्रचार में

विधानसभा चुनाव से पहले सपा में सुलह समझौते की एक और कोशिश की गई, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिल सकी. मुलायम सिंह यादव अखिलेश से इतना नाराज थे कि उन्होंने विधानसभा चुनाव में शिवपाल के सिवा किसी के लिए प्रचार नहीं किया. शिवपाल जीत गए मगर मुलायम की दूसरी बहू अपर्णा यादव हार गई.

 अपर्णा ने योगी को दिखाई गौशाला

उत्तर प्रदेश की सत्ता पर बीजेपी के काबिज होने के बाद अपर्णा यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी गौशाला दिखाई. योगी ने उनकी गौशाला की जमकर तारीफ भी की. इतना ही नहीं शिवपाल यादव ने भी योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की.  कहा जा सकता है कि अखिलेश विरोधी खेमे ने योगी आदित्यनाथ से नजदीकी दिखाने की कोशिश कर अपने इरादे दिखाए.

मुलायम को पार्टी की कमान दिए जाने की पैरवी

कुनबे में कलह के चलते अखिलेश यादव को हार का सामना करना पड़ा. पार्टी 236 विधायकों से घटकर पचास विधायकों से कम पर सिमट गई. इसके बाद से शिवपाल यादव लगातार पार्टी की कमान मुलायम को दिए जाने की बात उठाते रहे हैं. लेकिन अखिलेश ने कहा कि वह पार्टी की कमान नहीं छोड़ेंगे. इसके बाद शिवपाल ने नई पार्टी बनाने का राग आलपा, लेकिन मुलायम ने ऐन वक्त पर नई पार्टी बनाने से इनकार कर दिया और कहा कि अखिलेश को मेरा आशीर्वाद है, जिसके बाद शिवपाल के सारे अरमानों पर पानी फिर गया.

सुलह के बने आसार

मुलायम सिंह यादव के नई पार्टी बनाने से इनकार करने के बाद अखिलेश ने उनसे मुलाकात करके राष्ट्रीय अधिवेशन में आने का निमंत्रण दिया था. मुलायम ने शिवपाल से भी मतभेद भुलाने को कहा.  इसी का नतीजा रहा कि राष्ट्रीय अधिवेशन से एक दिन पहले शिवपाल ने अखिलेश को फोन करके नए अध्यक्ष बनने की अग्रिम बधाई दी, तो अखिलेश ने कहा कि चाचा का हमेशा से उन पर आशीर्वाद रहा है.

अखिलेशमय हुई सपा

गुरुवार को आगरा के राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश को पांच साल के लिए निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया तो शिवपाल ने फिर ट्वीट करके भतीजे को बधाई दी. इस तरह कुनबे की कलह का खुशनुमा अंत होता दिख रहा है. लेकिन सपा की कहानी में पिछले एक साल में इतने ट्विस्ट आए हैं कि आगे कुछ नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं ली जा सकती.

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