‘कूड़े के पहाड़’ पर LG-दिल्ली सरकार की दलीलों से सहमत नहीं हुआ सुप्रीम कोर्ट

कूड़ा निस्तारण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर आए दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने कहा है कि वह दिल्ली स्थित तीनों कूड़े के ढेरों की नियमित निगरानी कर रहे हैं और लगातार कोशिशें की जा रही हैं जिससे का समाधान निकाला जा सके। कोर्ट हालांकि उनकी दलील से सहमत नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि कूड़ा निस्तारण की वैकल्पिक योजनाओं पर संजीदगी से काम करने की जरूरत है। कूड़ा निस्तारण के लिए पर्यावरण विदों व विशेषज्ञों की समिति बनाई जाए।

दलीलों से सहमत नहीं कोर्ट

बीते गुरुवार को सुनवाई के दौरान उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार की ओर से दाखिल किए गए हलफनामे में कोर्ट को बताया गया कि दिल्ली में साफ सफाई और कचरा निस्तारण दिल्ली म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन का काम है और उपराज्यपाल इस काम की निगरानी करते हैं और वही निगम को इस बाबत आदेश दे सकते हैं। उपराज्यपाल की ओर से पेश एएसजी पिंकी आनंद ने कहा था कि उपराज्यपाल ने इस सिलसिले में पिछले डेढ़ साल में 25 बैठकें और सात फील्ड विजिट की हैं। सोमवार को पिंकी आनंद ने हलफनामा दायर कर कहा कि 31 दिसंबर 2016 को कार्यभार संभालने के बाद उपराज्यपाल ने जनवरी 2017 में भलस्वा साइट का निरीक्षण किया था। फरवरी में ओखला व उसके बाद गाजीपुर साइट का मुआयना किया। एलजी ने बुराड़ी स्थित कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट प्लांट (सीएंडडी वेस्ट) का भी दौरा किया। उन्होंने तीनों म्यूनिसिपल कॉरपोरेशनों को दिया था कि इसके वैज्ञानिक निस्तारण की दिशा में काम करें। इसके लिए आइआइटी, सीएसआइआर व टेरी विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय कमेटी भी गठित की थी। कमेटी ने अध्ययन के बाद कूड़ा निस्तारण में आने वाली दुश्वारियों को बयां किया था, जिसमें इसकी ज्यादा ऊंचाई होने व इसके भीतर सुलग रही आग का हवाला दिया गया था। आनंद के मुताबिक भलस्वा साइट पर कमेटी की सलाह पर काम किया जा रहा है।

प्लास्टिक का क्या करेंगे

कोर्ट ने कहा कि एलजी ऑफिस कहता है कि गाजीपुर में कूड़े का ढेर 55 से 45 मीटर पर आ गया है, लेकिन इसके नीचे की प्लास्टिक को आप कैसे निकालेंगे। क्या इसके लिए 45 मीटर डिल करेंगे। अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस ने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत नागपुर व गुरुग्राम में चलाए गए अभियान को दिल्ली में भी लागू किया जा सकता है। कोर्ट ने इस पर विचार की अनुमति दे दी।

अदालत ने लगाई थी फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में लगे कूड़े के पहाड़ पर नाराजगी जताते हुए उपराज्यपाल को पिछले सप्ताह फटकार लगाई थी। कोर्ट ने उन पर कटाक्ष किया था कि आप कहते हैं कि आप के पास अधिकार हैं। आप सुपरमैन हैं, लेकिन करते कुछ नहीं। गाजीपुर में कूड़े का पहाड़ कुतुबमीनार से महज आठ मीटर छोटा रह गया है। कोर्ट ने उपराज्यपाल को 16 जुलाई तक हलफनामा दाखिल कर दिल्ली में कूड़े के पहाड़ हटाने की समयबद्ध योजना पेश करने को कहा था।

तकनीक के माध्यम से हो रहा कूड़े का निस्तारण

दिल्ली के नगर निगम तकनीक के माध्यम से कूड़े व मलबे का निस्तारण कर रहे हैं और उपराज्यपाल भी इस पर ध्यान दे रहे हैं। राजनिवास द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि वह कूड़े एवं मलबे के निस्तारण के लिए गंभीर है। यही वजह है कि अनिल बैजल के उपराज्यपाल बनते ही भलस्वा, ओखला एवं गाजीपुर लैंडफिल साइट और बुराड़ी एवं शास्त्री पार्क डिमोलिशन वेस्ट प्लांट का निरीक्षण किया गया था। इतना ही नहीं वर्ष 2017 में पहली बैठक में निगमों को तकनीक की क्षमता बढ़ाकर कूड़ा निस्तारण के निर्देश दिए गए थे। उपराज्यपाल कूड़े के निपटान की लगातार समीक्षा कर रहे हैं। विशेषज्ञों की राय पर ही कार्य किया जा रहा है।

इन कदमों से कम होगी समस्या

दिसंबर 2019 तक तेहखंड में 25 मेगावाट कूड़े से बिजली का प्लांट शुरू हो जाएगा। इससे 2500 मीटिक टन कूड़े का निस्तारण होगा। ठोस कचरे के निस्तारण के लिए गाजीपुर में कूड़े से बिजली बनाने वाले प्लांट में एक हजार मीटिक टन कूड़े के निस्तारण क्षमता नंवबर 2018 तक बढ़ाएगा। 3000 मीटिक टन की क्षमता वाले चार सीएनडी प्रोसेस प्लांट दिसंबर तक स्थापित होंगे।

कूड़ा निस्तारण का नहीं पर्याप्त इंतजाम

इसे दिल्ली नगर निगमों की लापरवाही ही कहेंगे कि कूड़े के पहाड़ खड़े होते रहे, लेकिन इसके निस्तारण के पर्याप्त उपाय नहीं किए गए। वर्ष 2009 में बुराड़ी में पहला मलबा निस्तारण प्लांट शुरू हुआ और दूसरा वर्ष 2016 में शास्त्री पार्क में। यहां इमारतों के मलबे से टाइल बनाई जाती है। इससे पहले मलबे को किसी लैंडफिल साइट या फिर यमुना किनारे डाल दिया जाता था। लैंडफिल साइट में ज्यादा मात्र में मलबा पहुंचने के कारण ही कूड़े के पहाड़ खड़े हुए हैं। इतना ही नहीं दक्षिणी दिल्ली नगर निगम के गठन हुए छह वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अभी तक उसके पास मलबा निस्तारण का कोई प्लांट नहीं है। अब निगम बक्करवाला में यह प्लांट लगाने की योजना बना रहा है। टेंडर की प्रक्रिया चल रही है। निगम अपने क्षेत्र का मलबा अब भी लैंडफिल साइट पर ही डाल रहा है। निगमों की लापरवाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली में सात हजार टन निर्माण और मरम्मत से मलबा निकलता है। इसमें से केवल 2500 टन मलबे का निस्तारण कर टाइलें बनाई जाती हैं। कूड़े का भी यही हाल है। क्योंकि 10 हजार मीटिक टन प्रतिदिन निकलने वाले कूड़े में से केवल 5500 मीटिक टन कूड़े से ही बिजली बन पाती है। शेष लैंडफिल साइटों पर ही जाता है।

लोग नहीं डालते चिह्नित स्थानों पर मलबा

मलबे को एकत्रित करने के लिए उत्तरी एवं पूर्वी निगम द्वारा स्थान चिह्नित किए गए हैं, लेकिन लोग जहां-तहां मलबा डाल देते हैं। कई बीच रोड पर तो कई फ्लाइओवर के नीचे रात के अंधेरे में मलबा डाल जाते हैं। लोगों को जागरूक करने की जरूरत है।

2021 में रोज निकलेगा 15,750 टन कचरा

कचरा निस्तारण और लैंडफिल साइट मौजूदा समय में तो नासूर बन ही रहे हैं, 2021 तक और विकराल रूप लेने वाले हैं। संशोधित मास्टर प्लान-2015 की मानें तो तब तक रोजाना उत्पन्न होने वाला कचरा और बढ़ जाएगा। दिल्ली में अब तक 16 लैंडफिल साइट पूरी तरह भर चुकी हैं। जबकि चार में अभी कचरा डाला जा रहा है। चार नई साइट शुरू की जानी है। जहां तक कचरे की मात्र का सवाल है तो 2002 में दिल्ली का कुल कचरा 5,543 टन प्रतिदिन था जबकि 2021 तक 15,750 टन प्रतिदिन हो जाएगा।

दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के पूर्व योजना आयुक्त आरजी गुप्ता ने कहा कि दिल्ली की लगातार बढ़ती आबादी की वजह से न तो भविष्य में कचरा कम होगा और न ही लैंडफिल साइट की सुलङोगी। आबोहवा भी खराब ही होती रहेगी। आरजी गुप्ता के मुताबिक तमाम लैंडफिल साइटों के आसपास हरित क्षेत्र बढ़ाना बहुत जरूरी है। इससे वह देखने में भी सुंदर लगेंगी। दूसरे उसके दुष्प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा। इसी तरह कचरे से बिजली बनाने की योजना भी इच्छाशक्ति एवं पूरी ईमानदारी के साथ लागू करनी होगी। उन्होंने बताया कि 1980 में मजनूं का टीला के नजदीक लगातार तीन वर्ष तक कचरे से बिजली बनाई गई थी। अगर इस तरीके को अपनाया जाए तो दिल्ली में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद भी मिल सकेगी।

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