क्या जानते है वो जगह जहां पहली बार लौंग का पेड़ उगा था…

आप ने लौंग का इस्तेमाल तो किया ही होगा। मसालों में पान के साथ या फिर मुख शुद्धि के तौर पर। कई बार दांत में दर्द होने पर भी लौंग को मुंह में दबाया होगा।लौंग हमारे घरों में कमोबेश रोज़ इस्तेमाल होती है. आज भारत समेत दुनिया के कई देशों में लौंग उगाई जाती है। मगर आज से क़रीब तीन हज़ार साल पहले लौंग सिर्फ़ पूर्वी एशिया के कुछ द्वीपों पर हुआ करती थी। तो चलिए आज आपको ले चलते हैं लौंग के पुश्तैनी घर वाले जज़ीरे की सैर पर।क्या जानते है वो जगह जहां पहली बार लौंग का पेड़ उगा था...करते रहेंगे योग तो बुढ़ापे में नहीं होगी याददाश्त की कोई दिकात..

इस द्वीप का नाम है टर्नेट। ये द्वीप प्रशांत महासागर में स्थित है और आज इंडोनेशिया का हिस्सा है। कहा ये भी जाता है कि दुनिया का सबसे पुराना लौंग का पेड़ टर्नेट में ही है।आप टर्नेट की सैर पर जाएंगे तो वहां के लोग और गाइड आपको उस पेड़ का नाम बताएंगे और उसे दिखाने ले जाएंगे। कई बार वो दूसरे पेड़ दिखाकर आपको झांसा भी दे सकते हैं।

मगर टर्नेट की सिर्फ़ यही ख़ूबी नहीं कि यहां सबसे पहले लौंग का पेड़ उगा था। ये क़ुदरती तौर पर बेहद दिलचस्प जज़ीरा है। इस द्वीप के ज़्यादातर हिस्से में ज्वालामुखी का राज है। एक छोटा सा हिस्सा है जहां पर एक शहर बस गया है। वहीं पर सैलानियों के आने-जाने के लिए एक हवाई पट्टी बना दी गई है। समुद्र के नज़ारे का लुत्फ़ लेने के लिए बीच भी है।

आप जब टर्नेट जाएंगे तो हो सकता है कि इसके आसमान पर ज्वालामुखी की राख उड़ती दिखाई दे. यहां के लोग भी मेहमान नवाज़ हैं. औरत हो या मर्द, सबका स्वागत हैलो मिस्टर कहकर ही किया जाता है। टर्नेट इसके पास स्थित टिडोर और उसके आस-पास के कुछ द्वीप ही ऐसे इलाक़े थे जहां आज से तीन चार हज़ार पहले से लौंग के पेड़ पाए जाते थे। लौंग के कारोबार से इन द्वीपों के बाशिंदों की ज़िंदगी आराम से बसर होती थी। लेकिन जब टर्नेट के सुल्तानों के पास लौंग के कारोबार से काफ़ी दौलत आ गई। तो वो ख़ुद को कुछ ज़्यादा ही ताक़तवर समझने लगे।

टर्नेट के सुल्तानों ने फिलिपींस और पापुआ न्यू गिनी तक अपना दावा ठोकना शुरू कर दिया। टर्नेट और टिडोर के सुल्तानों के बीच जंग छिड़ गई। इसका फ़ायदा अंग्रेज़ और डच कारोबारियों ने उठाया और इस इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया। कई सदियों तक ये द्वीप यूरोपीय देशों के उपनिवेश रहे। अपनी क़ुदरती ख़ूबसूरती के लिए मशहूर इन द्वीपों पर कई तरह के जीव-जंतु भी पाए जाते हैं।  

उन्नीसवीं सदी में अंग्रेज़ वैज्ञानिक अल्फ्रेड रसेल वॉलेस जब नई नस्लों की खोज में पूर्वी एशिया में भटक रहे थे। तो उन्होंने कुछ वक़्त टर्नेट द्वीप पर भी बिताया था। यहां रहने के दौरान ही वॉलेस बीमार पड़ गए। बीमारी के चलते वो कहीं आ-जा नहीं सकते थे। लिहाज़ा खाली बैठने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं था। बीमारी के चलते वॉलेस को मौत का डर सताने लगा। इसी दौरान उन्होंने आस-पास के मंज़र को ग़ौर से देखना शुरू किया।

उन्होंने देखा कि क़ुदरती चुनौतियों से बचने के लिए पूर्वी एशियाई द्वीपों में पाए जाने वाले जानवरों में कई जेनेटिक बदलाव आए हैं। जैसे यहां उड़ने वाले मेंढक पाए जाते हैं। या फिर ओरांगउटान और जानवरों की दूसरी नस्लें भी मिलती हैं। अपनी रिसर्च के दौरान वॉलेस ने जानवरों की बहुत सी ऐसी प्रजातियां यहां देखी जो सोचने पर मजबूर करती हैं. इन नस्लों को देखने के बाद उनके ज़हन में सवाल उठा कि क्यों कुछ प्रजातियां मर जाती हैं। और कुछ ही ज़िंदा बाक़ी रहती हैं।

जवाब बहुत साफ़ था। जो प्रजातियां बीमार पड़ने पर बदले हुए माहौल के साथ तालमेल बैठा पाती हैं वहीं ज़िंदा रहती हैं। बाक़ी की मौत हो जाती है। इसे आज हम विज्ञान के नेचुरल सेलेक्शन’ के सिद्धांत के तौर पर जानते हैं। दरअसल ये अंदाज़ा वॉलेस को ख़ुद बीमार होने पर हुआ था। उन्हें शायद मलेरिया हुआ था। ठंड बहुत तेज़ लग रही थी। वो सोच रहे थे कि घर से इतनी दूर हैं। बेहतर इलाज भी मुमकिन नहीं हैं। वो ठीक कैसे होंगे। अचानक उनके ज़हन में ब्रिटिश अर्थशास्त्री थॉमस माल्थस की थ्योरी घूमने लगी।

माल्थस ने कहा था कि क़ुदरत ज़मीन पर इंसानी की आबादी को ख़ुद ही संतुलित करती रहती है। जब धरती पर जीवों का दबाव बढ़ जाता है। तो क़ुदरत इस पर क़ाबू पाने के लिए बीमारियों प्राकृतिक आपदाओं जैसे-बाढ़ तूफ़ान या अकाल और लड़ाइयों से बढ़ती आबादी पर क़ाबू पाती है। वॉलेस को लगा कि ये सिद्धांत तो जानवरों पर भी लागू होता है. जो भी जीव क़ुदरत की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपने अंदर ज़रूरी बदलाव करता है। वहीं बचता है। बाक़ी नस्लें नष्ट हो जाती हैं। इसे ही वॉलेस ने नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी बताया।

बीमारी से उठने के बाद वॉलेस ने अपनी थ्योरी का पर्चा लिखकर ब्रिटेन के मशहूर वैज्ञानिक और अपने दोस्त चार्ल्स डार्विन को भेजा. डार्विन को जब वॉलेस कि चिट्ठी मिली तो वो हैरान रह गए। डार्विन धर्मसंकट में पड़ गए। वो ख़ुद इस थ्योरी पर पिछले बीस साल से काम कर रहे थे और अभी उनकी क़िताब पूरी होने में काफ़ी वक़्त था। ऐसे में अगर वॉलेस का पर्चा दुनिया के सामने आता है। तो उनकी अपनी क़िताब का मक़सद ही खत्म हो जाएगा। लेकिन डार्विन ने एक अच्छे इंसान की तरह वॉलेस की थ्योरी वाले पर्चे को प्रकाशित कराया। बाद में डार्विन ने अपनी क़िताब, ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ़ स्पीशीज़’ में इस नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी को विस्तार से समझाया। उन्होंने इस क़िताब में वालेस की सोच को भी पूरी तवज्जो दी।

डार्विन की थ्योरी को मज़बूती देने में अल्फ्रेड रसेल वॉलेस का बड़ा योगदान था। लेकिन उन्होंने कभी इसका दावा नहीं किया। टर्नेट द्वीप पर अपनी बीमारी से ठीक होने के बाद भी वॉलेस कई साल पूर्वी एशियाई देशों में घूमते रहे। वहां से वॉलेस साल 1862 में लंदन वापस चले आए। वो अपने साथ करीब सवा लाख से भी ज़्यादा प्रजातियों के नमूने लाए थे। साल 1868 में उन्होंने अपनी यादों का सफ़र भी लिखा. उनका देहांत 90 साल की उम्र में हुआ।

आज दुनिया वॉलेस की शुक्रगुज़ार है कि उन्होंने जानवरों की इतनी नई नस्लों की खोज की। उन्होंने डार्विन की नेचुरल सेलेक्शन की थ्योरी में भी योगदान दिया। आज हमें इंडोनेशिया के द्वीप टर्नेट को इसके लिए शुक्रिया कहना चाहिए। जहां पर पहली बार लौंग उगी और इसी जज़ीरे पर जन्मा था थ्योरी ऑफ़ नेचुरल सेलेक्शन का ख़याल।

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