खुद करोडों के कर्ज में दबा था लेकिन यात्री के 8 लाख रुपए…

New Delhi : देबेंद्र कापड़ी एक कैब ड्राईवर है। 4 दिन पहले देबेंद्र ने एयरपोर्ट से एक यात्री को अपनी टैक्सी में बैठाया था। जिसे देबेंद्र ने पहाड़गंज ड्रॉप किया।खुद करोडों के कर्ज में दबा था लेकिन यात्री के 8 लाख रुपए...

ड्रॉप करने के बाद देबेंद्र को एहसास हुआ कि पैसेंजर की बैग उसकी गाड़ी में ही छूट गया है। उस बैग में विदेशी नोट के अलावा गहने, लैपटॉप, आईफोन और कैमरा था। सारे सामान की कीमत लगभग 8 लाख रुपए थी. इसके बाद देबेंद्र ने डमेस्टिक एयरपोर्ट पुलिस स्टेशन में जाकर उस बैग को जमा किया।

 

देबेंद्र ने पुलिस को बताया कि उसे पता था कि बैग में क्या है. इसके बावजूद भी उसने बैग वापस करने का फैसला किया है. देबेंद्र की इस सच्चाई को देखकर पुलिस का मुंह खुला रह गया।

ये बैग श्रीनगर के मुबशिसर वानी का था। पुलिस को बैग में एक शादी का कार्ड भी मिला, जिस पर नंबर मौजूद था. पुलिस ने बात करके उस बंदे को उसका बैग सौंपा दिया। हिदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक देबेंद्र ने ये सच्चाई तब दिखाई है, जब उसके ऊपर दो लाख हजार रुपए का कर्ज है।

22 साल का देबेंद्र बिहार के बांका से है। और पिछले 3 साल से दिल्ली में टैक्सी चला रहा है। 2008-9 में देबेंद्र के पिता ने अपनी दो बेटियों की शादी के लिए एक लाख रुपए लोन लिया था। जिसका हर महीने 5 परसेंट ब्याज देना होता है। गुजरते समय के साथ ब्याज बढ़ता गया।

रकम वापसी का प्रेशर बहुत ज़्यादा था। देबेंद्र की परिवार को पहले वॉर्निंग मिलती है और फिर परिवार समेत जान से मारने की धमकियां। जुड़ते जाते ब्याज की वजह से 1 लाख का लोन महज़ दो साल में बढ़ कर 2 लाख हो गया। देबेंद्र की फैमिली ने लोन चुकाने के लिए 2011 में अपनी जमीन भी बेच दी। देबेंद्र का बड़ा भाई कमाने के लिए घर छोड़ गुजरात चला गया।

देबेंद्र कहता है- ‘मेरे पिता मानसिक परेशानी से गुजर रहे हैं और मेरी मां बीमार है लेकिन हमारे पास उनकी दवा के भी पैसे नहीं है। हर गुजरते दिन के साथ हमारी आर्थिक स्थिति और खराब हो रही है. 17 साल की उम्र में मैंने पढ़ाई छोड़ कमाने का सोचा क्योंकि मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था। जिसके बाद मैं नौकरी के लिए दिल्ली आ गया।

देबेंद्र दिल्ली एयरपोर्ट के पास मेहरम नगर में रहता है। देबेंद्र ने एक छोटा सा रूम ले रखा है, जिसमें उसके साथ 2 लोग और रहते हैं. देबेंद्र जिस जगह रहता है, वहां जिंदगी गुजारना बेहद मुश्किल है। देबेंद्र अगर चाहता तो अपने लोन की बराबर की रकम लेकर लोन चुका सकता था। या सारा का सारा माल ही बेचकर कुछ दिनों के लिए अपने और अपनी फैमिली के लिए आराम की लाइफ चुन लेता. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।

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