गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव: वोट के लिए जाति ही नहीं वर्ग व गोत्र तक का लिया जा रहा है सहारा

गोरखपुर व फूलपुर के उपचुनाव की जंग अंतिम पड़ाव पर पहुंचने के साथ ही दलितों व मुस्लिमों के रुख के चलते न सिर्फ खासी दिलचस्प हो गई बल्कि भविष्य के कई ‘रंग’ छिपाए दिख रही है। वोट जुटाने के लिए जाति ही नहीं वर्ग व गोत्र तक की बिसात बिछ चुकी है। पक्ष हो या विपक्ष, दोनों तरफ से लड़ाई अब अंतर के मोर्चे पर है।गोरखपुर व फूलपुर उपचुनाव: वोट के लिए जाति ही नहीं वर्ग व गोत्र तक का लिया जा रहा है सहारा

भाजपा की कोशिश है कि 2014 के आम चुनाव में जितने वोटों के अंतर से जीत मिली थी उससे अधिक मतों के अंतर से उप चुनाव में भी झंडा फहराया जाए। उधर, विपक्ष दिन रात इस प्रयास में है कि भाजपा की बढ़त को रोककर यह संदेश दिया जाए कि विपक्ष ने खोई ताकत वापस पानी शुरू कर दी है। कौन कितना कामयाब होगा यह तो नतीजा आने पर पता चलेगा। पर, यह दिखने लगा है कि मंचों पर भले ही विकास की बात की जा रही हो लेकिन जमीन पर ‘जंग’ जातियों की ही है।

लोकसभा उपचुनाव के नतीजे जीत या हार ही नहीं बल्कि यह भी तय करेंगे कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 2014 व 2017 के चुनाव में हिंदुओं में टूटी जातीय गोलबंदी की प्रवृत्ति 2019 में भी बढ़ेगी या विपक्ष को इसे रोकने में सफलता मिलेगी। भविष्य के लिए यह संकेत भी मिलेगा कि मुस्लिमों के मन में क्या चल रहा है।

यह भी पता चलेगा कि दलित मतदाता क्या मायावती की तरफ से फिर मुड़ने लगा है या उसका भरोसा दलितों के सरोकारों, रोजगार और सम्मान के नाम पर शुरू किए गए कामों के चलते नरेंद्र मोदी और योगी सरकार पर टिका है। 

यह हैं समीकरण

नतीजों में इन सवालों के जवाब छिपे होने की वजहें है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि उपचुनाव में मतदाताओं का रुख आमतौर पर सरकार के पक्ष में रहता है ताकि उनके क्षेत्र में शुरू कराए गए विकास कार्यों की गति न थमे। इसका उदाहरण लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा के उपचुनाव रहे हैं।

भाजपा ने लोकसभा चुनाव में प्रदेश में गठबंधन के साथ 73 सीटें जीतीं थीं। साथ ही प्रदेश में विधानसभा की लगभग साढ़े तीन सौ सीटों पर बढ़त हासिल की थी। पर, लोकसभा का चुनाव लड़कर सांसद बने विधायकों के यहां जब विधानसभा उपचुनाव हुए तो ज्यादातर में भाजपा हार गई। कहने का अर्थ यह है कि लोगों ने उस समय प्रदेश में मौजूद अखिलेश यादव सरकार के साथ ही खड़े होना पसंद किया ताकि काम होते रहें।

वैसे भी पिछले चार साल में देश में हुए चुनाव के नतीजे यह बताते हैं कि प्रतीकों की राजनीति करने में महारथ हासिल कर चुके मोदी ने अगड़ों के साथ गरीबी के नाम पर व जातीय स्वाभिमान के नाम पर दलितों तथा पिछड़ों को भी अच्छी संख्या में अपने साथ भरोसे से जोड़ा है। इसका प्रमाण प्रदेश में लोकसभा की सुरक्षित सभी 17 सीटों और विधानसभा की सुरक्षित 86 सीटों में 76 पर भाजपा की जीत है। इस आधार पर भी समीकरण भाजपा के पक्ष में है। इसलिए इन चुनाव के नतीजे 2019 के आम चुनाव के राजनीतिक रुझान का संकेत भी होंगे।

आगे के राजनीतिक समीकरणों का भी संकेत देंगे चुनाव नतीजे

वैसे तो बसपा का समर्थन मिलने के बाद दोनों ही जगह सपा के प्रत्याशी की गाड़ियों पर बसपा के भी झंडे लग गए हैं और दावा किया जा रहा है कि बसपा के स्थानीय कार्यकर्ता सपा के लिए वोट मांग रहे हैं। लेकिन, जिस तरह पिछले कुछ वर्षों में दलितों व पिछड़ों की गोलबंदी भाजपा के साथ मजबूत नजर आ रही है, उसे देखते हुए बसपा और सपा के दोस्ती के रिश्ते जमीन पर कोई बड़ा उलट-फेर करने की बहुत उम्मीद नहीं बंधाते।

आमतौर पर देखा गया है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बसपा का प्रभाव जितना खुद उसके चुनाव में होने पर दिखता है उतना चुनाव से बाहर रहने पर नहीं दिखता। बावजूद इसके यह तो पता चलेगा ही कि इस तरह का प्रयोग दलितों और पिछड़ों को किस हद तक एक साथ लाता है। जहां तक मुस्लिमों के मन की बात है तो गोरखपुर और फूलपुर के समीकरण अलग-अलग हैं। फूलपुर में बाहुबली अतीक अहमद का मजबूती से लड़ना जहां सपा के लिए चुनौती बना है तो कांग्रेस के ब्राह्मण प्रत्याशी का मैदान में होने से भाजपा की चुनौती थोड़ी बढ़ी है।

यह नतीजा बताएगा कि ब्राह्मणों का झुकाव स्वाभाविक रूप से भाजपा की तरफ ही रहता है या वह अपने स्वजातीय कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में भी कुछ झुकता है। लेकिन, लगता नहीं कि बसपा के साथ के बावजूद सपा फूलपुर में भाजपा के साथ सीधी लड़ाई में रहेगी। वहीं, गोरखपुर में सपा का निषाद प्रत्याशी होने के बावजूद अति पिछड़ी जातियों का गोरक्षपीठ से लंबे समय से लगाव रहा है। पीठ की पहचान हिंदुत्व से जुड़ी होने के कारण भी लगभग पूरे ही हिंदू समाज का पीठ को साथ मिलता रहा है। पर, लंबे समय बाद पहली बार भाजपा का उम्मीदवार पीठ से बाहर का कोई व्यक्ति है।

ऐसे में यह बात देखने वाली होगी कि लोगों का समर्थन भाजपा उम्मीदवार को वैसे ही मिलता है जैसा खुद योगी के रहते मिला करता था। सपा की बात करें तो यहां कांग्रेस से मुस्लिम उम्मीदवार होना भी उसके समीकरणों पर कुछ असर डाल सकता है। कुल मिलाकर दोनों जगह के नतीजे सिर्फ जीत या हार नहीं बल्कि आगे के राजनीतिक समीकरणों का भी संकेत देंगे।

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