चर्चा में है विशाल की पटाखा का ट्रेलर, लेखक ने बताया कैसे बनी ये फिल्म?

सितंबर में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘पटाखा’ रिलीज के लिए तैयार है. इस फिल्म की कहानी राजस्थान के करौली के एक छोटे से गांव रौंसी की है, जहां दो सगी बहनें छुटकी और बड़की में हमेशा भारत और पाकिस्तान की तरह जंग चलती रहती है. फिल्म की कहानी राजस्थान के कहानीकार चरण सिंह ‘पथिक’ की चर्चित कहानी ‘दो बहनें’ पर आधारित है. पथिक खुद करौली के ही रहने वाले हैं. उन्होंने कहानी के साथ ही फिल्म निर्माण में भी काफी सहयोग किया है. पटाखा रिलीज से पहले पथिक ने आजतक से खास बातचीत में फिल्म से जुड़े तमाम पहलुओं पर बात की.सितंबर में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘पटाखा’ रिलीज के लिए तैयार है. इस फिल्म की कहानी राजस्थान के करौली के एक छोटे से गांव रौंसी की है, जहां दो सगी बहनें छुटकी और बड़की में हमेशा भारत और पाकिस्तान की तरह जंग चलती रहती है. फिल्म की कहानी राजस्थान के कहानीकार चरण सिंह 'पथिक' की चर्चित कहानी 'दो बहनें' पर आधारित है. पथिक खुद करौली के ही रहने वाले हैं. उन्होंने कहानी के साथ ही फिल्म निर्माण में भी काफी सहयोग किया है. पटाखा रिलीज से पहले पथिक ने आजतक से खास बातचीत में फिल्म से जुड़े तमाम पहलुओं पर बात की.  मूल कहानी पर फिल्म के बदले टाइटल को लेकर पथिक ने बताया- "दो बहनें कहानी पर आधारित फिल्म का नाम पटाखा उन दो बहनों की आदतों की वजह से पड़ा, जो एक चिंगारी लगते ही पटाखे की तरह फूटने लगती हैं और धमाका कर देती हैं. इसलिए इसका नाम पटाखा रखा गया. हालांकि इससे पहले फिल्म का नाम 'छुरियां' रखा गया था, लेकिन नाम के उच्चारण को लेकर इसे बदलने का फैसला किया गया."  पथिक ने बताया, ये कहानी 2006 में समकालीन भारतीय साहित्य के अंक में छपी थी और अरुण प्रकाश इसके संपादक थे. विशाल भारद्वाज ने ये कहानी 2011 में पढ़ी थी. उसके बाद 31 जुलाई को उनके असिस्टेंट ने मुझे फोन किया और पूछा कि क्या आप विशाल को जानते हैं? मैंने कहा- "आखिर उन्हें कौन नहीं जानता." उनके असिस्टेंट ने बताया, विशाल भारद्वाज ये कहानी पढ़कर काफी खुश हैं. उन्होंने मुझे मुंबई आने और अपने कहानी संग्रह को भेजने के लिए कहा. इस वक्त में मेरे दो ही संग्रह आए थे- एक तो 'बात ये नहीं है' और दूसरा 'पीपल के फूल'.     (गांव में विशाल भारद्वाज के साथ चरण सिंह पथिक)  पथिक ने बताया, "कुछ समय बाद मेरे पास फिर से फोन आया और पूछा गया कि आपकी कौन-कौन सी कहानियों पर फिल्म बन सकती है? तब मैंने कहा था कि ये तो मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता. लेकिन मैंने कसाई, दंगल, दो बहनें कहानी का नाम सुझाया. फिर 2012 में राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिलने के बाद मुझे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से स्टोरी टेलिंग के लिए बुलावा आया. वहां मैंने 'फिरनेवालियां' कहानी सुनाई, जो व्यंग्य और तंज करते हुए हंसाती है. उस दौरान गुलजार ने मेरी कहानी की तारीफ की और मुझसे कहानी का संग्रह मांग लिया.  पथिक के मुताबिक, मुझे पता चला कि वहां विशाल भारद्वाज भी आए हैं और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं. उस वक्त मैंने बीच प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके पीछे जाकर कहा- "आई एम चरण सिंह पथिक." भारद्वाज ने कहा- "प्रेस कॉन्फ्रेंस कैंसल, अब मुझे मेरा भाई मिल गया." पथिक के मुताबिक, "इतना कह विशाल प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़ मेरे साथ आ गए. उस दौरान दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उनके बेटे संदीप दीक्षित वहां मौजूद थे और उन्होंने विशाल भारद्वाज को चाय के लिए कहा. लेकिन विशाल ने कहा- अब चाय दिल्ली आकर पीएंगे, मुझे मेरा भाई मिल गया है. उसके बाद फ्लाइट होने की वजह से वो चले गए और उन्होंने कहा कि जल्द आपके गांव आएंगे. साथ ही उन्होंने दूसरी कहानी 'बक्खड़' की भी तारीफ की."  पथिक ने बताया, कुछ दिनों बाद विशाल भारद्वाज ने गांव का दौरा किया और पूरी लोकेशन देखी. वैसे तो फिल्म फरवरी में शूट होनी थी, लेकिन किसी अन्य प्रोजेक्ट की वजह से इसकी तारीख आगे बढ़ गई. दरअसल फरवरी में राजस्थान में मौसम ठीक रहता है. क्योंकि इस दौरान ज्यादा गर्मी नहीं पड़ती है और सर्दी भी कम ही होती है. तारीख बढ़ने से राजस्थान में गर्मी का मौसम शुरू हो गया, इसलिए फिल्म की शूटिंग करौली की बजाय माउंट आबू में पूरी की गई.  दो महीने में शूट हुई फिल्म  पथिक ने बताया, "राजस्थान में फिल्म शूट होने में करीब दो महीने का वक्त लगा. शूटिंग दो हिस्सों में की गई थी, क्योंकि एक्ट्रेस का वजन बढ़ाने के लिए एक महीने के लिए शूटिंग रोक दी गई थी. शूटिंग मई में शुरू हुई थी और 10 जुलाई 2018 तक खत्म हो गई थी.

मूल कहानी पर फिल्म के बदले टाइटल को लेकर पथिक ने बताया- “दो बहनें कहानी पर आधारित फिल्म का नाम पटाखा उन दो बहनों की आदतों की वजह से पड़ा, जो एक चिंगारी लगते ही पटाखे की तरह फूटने लगती हैं और धमाका कर देती हैं. इसलिए इसका नाम पटाखा रखा गया. हालांकि इससे पहले फिल्म का नाम ‘छुरियां’ रखा गया था, लेकिन नाम के उच्चारण को लेकर इसे बदलने का फैसला किया गया.”

पथिक ने बताया, ये कहानी 2006 में समकालीन भारतीय साहित्य के अंक में छपी थी और अरुण प्रकाश इसके संपादक थे. विशाल भारद्वाज ने ये कहानी 2011 में पढ़ी थी. उसके बाद 31 जुलाई को उनके असिस्टेंट ने मुझे फोन किया और पूछा कि क्या आप विशाल को जानते हैं? मैंने कहा- “आखिर उन्हें कौन नहीं जानता.” उनके असिस्टेंट ने बताया, विशाल भारद्वाज ये कहानी पढ़कर काफी खुश हैं. उन्होंने मुझे मुंबई आने और अपने कहानी संग्रह को भेजने के लिए कहा. इस वक्त में मेरे दो ही संग्रह आए थे- एक तो ‘बात ये नहीं है’ और दूसरा ‘पीपल के फूल’.

(गांव में विशाल भारद्वाज के साथ चरण सिंह पथिक)

पथिक ने बताया, “कुछ समय बाद मेरे पास फिर से फोन आया और पूछा गया कि आपकी कौन-कौन सी कहानियों पर फिल्म बन सकती है? तब मैंने कहा था कि ये तो मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता. लेकिन मैंने कसाई, दंगल, दो बहनें कहानी का नाम सुझाया. फिर 2012 में राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिलने के बाद मुझे जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से स्टोरी टेलिंग के लिए बुलावा आया. वहां मैंने ‘फिरनेवालियां’ कहानी सुनाई, जो व्यंग्य और तंज करते हुए हंसाती है. उस दौरान गुलजार ने मेरी कहानी की तारीफ की और मुझसे कहानी का संग्रह मांग लिया.

पथिक के मुताबिक, मुझे पता चला कि वहां विशाल भारद्वाज भी आए हैं और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं. उस वक्त मैंने बीच प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके पीछे जाकर कहा- “आई एम चरण सिंह पथिक.” भारद्वाज ने कहा- “प्रेस कॉन्फ्रेंस कैंसल, अब मुझे मेरा भाई मिल गया.” पथिक के मुताबिक, “इतना कह विशाल प्रेस कॉन्फ्रेंस छोड़ मेरे साथ आ गए. उस दौरान दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और उनके बेटे संदीप दीक्षित वहां मौजूद थे और उन्होंने विशाल भारद्वाज को चाय के लिए कहा. लेकिन विशाल ने कहा- अब चाय दिल्ली आकर पीएंगे, मुझे मेरा भाई मिल गया है. उसके बाद फ्लाइट होने की वजह से वो चले गए और उन्होंने कहा कि जल्द आपके गांव आएंगे. साथ ही उन्होंने दूसरी कहानी ‘बक्खड़’ की भी तारीफ की.”

पथिक ने बताया, कुछ दिनों बाद विशाल भारद्वाज ने गांव का दौरा किया और पूरी लोकेशन देखी. वैसे तो फिल्म फरवरी में शूट होनी थी, लेकिन किसी अन्य प्रोजेक्ट की वजह से इसकी तारीख आगे बढ़ गई. दरअसल फरवरी में राजस्थान में मौसम ठीक रहता है. क्योंकि इस दौरान ज्यादा गर्मी नहीं पड़ती है और सर्दी भी कम ही होती है. तारीख बढ़ने से राजस्थान में गर्मी का मौसम शुरू हो गया, इसलिए फिल्म की शूटिंग करौली की बजाय माउंट आबू में पूरी की गई.

दो महीने में शूट हुई फिल्म

पथिक ने बताया, “राजस्थान में फिल्म शूट होने में करीब दो महीने का वक्त लगा. शूटिंग दो हिस्सों में की गई थी, क्योंकि एक्ट्रेस का वजन बढ़ाने के लिए एक महीने के लिए शूटिंग रोक दी गई थी. शूटिंग मई में शुरू हुई थी और 10 जुलाई 2018 तक खत्म हो गई थी.

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