‘छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा’ और किशोर कुमार की अंतिम यात्रा

1981 में बनी राकेश कुमार की फ़िल्म ‘याराना’ का गीत ‘छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा’ सुनते हुए हम एहसास कर पाते हैं कि किशोर कुमार अपनी अंतिम यात्रा के और करीब जा रहे हैं. 'छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा' और किशोर कुमार की अंतिम यात्रा

यह वह दौर था जब किशोर उदासी के गीतों को नई ऊंचाइयां दे रहे थे और उनकी नेजल के साथ थोड़ी भारी आवाज जिसको अंग्रेजी में ग्रेनी कहते हैं इन गीतों के लिए माकूल साबित हो रही थी.

राजेश रोशन के द्वारा कंपोज्ड यह गीत है तो यूं रोमांटिक किन्तु इसको गाया गया है विरह गीत के अंदाज में, जिसमें गाने वाला प्रेमी अपनी प्रेमिका से हृदय की बात जाहिर करता है बिल्कुल साफगोई के साथ और अपनी भावनावों के सैलाब को रोकता नहीं, पर प्रेमिका को सुनकर लगे जैसे पता नहीं जब दोनों बिछड़ जाएंगे तो क्या होगा.

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यह उत्कृष्ट प्रेम की एक बानगी भर है, जहां मिलते रहते हुए भी उसके जश्न से ज्यादा बिछड़ने का गम सताता हो.

‘आजा तेरा आंचल मैं प्यार से भर दूं. तू ही मेरा जीवन तू ही जीने का सहारा’ के बाद वायलिन एवं बांसुरी की जुगलबंदी के बीच हल्का चटकाया गया तुम्बा, गीत को उसके अंतिम पड़ाव में ले जाता है जिसको आंख बंद कर सुनने पर महसूस होता है कि गाने में एक और अंतरा होगा किन्तु जनाब यही चाहत तो वापस इस गाने को रिवाइंड कर सुनने का आदि बनाती है और हम जैसे श्रोता एक सिटींग में कम से कम 7 बार इस गीत को सुने बिना खुद का मन और पेट दोनों भरा नहीं मानते. 
 

किशोर की आवाज के भारीपन और कम्पनता में डूब गए

 

‘छूकर मेरे मन को’ ऐसा गीत है जिसको गाने के बाद शायद किशोर कुमार ने भी सोचा होगा कि अब और गाने की जरूरत नहीं क्योंकि उसके टक्कर में किसी अन्य गीत का खड़ा होना एक जटिल प्रक्रिया है.

गीत की शुरुआत में गिटार और बांसुरी से संगीत प्रेमी का स्वागत होता है प्रेम नगरी में, जहां आने के बाद सुनने वाला सितार की कर्णप्रिय धुन से लबालब ताल में गोता लगाता हुआ किशोर की आवाज के भारीपन और कम्पनता में ऐसा डूबता है कि वह उस दुनिया की नागरिकता लेना चाहता है और पर्दे पर अमिताभ बच्चन और नीतू सिंह के प्यार की हर अटखेलियों का गवाह बनना अपनी आवश्यकता समझता है.

यह भी गौरतलब हो कि शुरुआत में सुनने पर यह गीत आपको आरडी बर्मन द्वारा बनाया गया लगेगा किन्तु है राजेश रोशन का. रोशन के पुत्र राजेश रोशन ने बहुत चुनिंदा फिल्मों में संगीत दिया है किंतु वे सभी गाने कालजयी हैं.

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इस गीत को बनाते वक्त रोबिंद्र शोंगीत का गहरा प्रभाव संगीतकार पर रहा और मूल बंगला की धुन ‘तोमर होलो शुरू आमार होलो शारा’ सुनकर ही राजेश रोशन ने इस गीत का निर्माण आधुनिक साजों से किया किन्तु गीत में बांसुरी एवं सितार वाले हिस्सों को सुनकर रोबिंद्र शोंगीत की याद बरबस आती है.

गीत हिंदी ही नहीं बल्कि भारतीय फिल्म संगीत में विशिष्टता रखता है. कुछ इस तरह का भाव बहुत सालों बाद आमिर खान की फ़िल्म ‘गजनी’ के गीत ‘कैसे मुझे तुम’ में भी उत्पन्न हुआ था क्योंकि वह गीत भी रोमांटिक था किंतु सुनने वाले को एक बारगी लगेगा कि यह सैड सांग है.

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