डसाल्ट एविएशन के CEO बोले- राफेल पर भारत से सौदा मिस्र-कतर से अलग

राफेल विमान बनाने वाली कंपनी डसाल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने साफ कहा है कि राफेल का सौदा भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुआ है और इसकी कीमत दोनों सरकारों की मंजूरी से ही तय की गई है. डसाल्ट एविएशन के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने इंडिया टुडे के एग्जिक्यूटिव एडिटर संदीप उन्नीथन को दिए खास इंटरव्यू में भारत-फ्रांस के बीच विमान के कॉन्ट्रैक्ट के बारे में जानकारी दी और कहा कि यह सौदा दोनों देशों के लिए फायदेमंद है.डसाल्ट एविएशन के CEO बोले- राफेल पर भारत से सौदा मिस्र-कतर से अलग

उन्होंने कहा कि राफेल की कीमत हर ग्राहक के लिए एक ही होती है. अंतर बस कॉन्ट्रैक्ट, विमानों की संख्या, विमान की परिभाषा, बेस और बिक्री के बाद मिलने वाली सेवाओं, स्पेयर्स आदि में होता है.

क्या 7.4 अरब यूरो है सौदे की कीमत

यह पूछने पर कि कंपनी ने अपने सालाना नतीजे में राफेल सौदे की कीमत 7.4 अरब यूरो बताई है, ट्रैपियर ने बताया कि यह आंकड़े पुराने हैं, क्योंकि नतीजा साल 2016 का है. इसमें रक्षा निर्यात की जानकारी दी गई है. राफेल सौदा इसका एक हिस्सा है. इसमें मिराज का सौदा भी शामिल है.

ट्रैपियर ने कहा, ‘ यह ऑर्डर हमारे बहीखाते में 2016 में दर्ज हुआ. इसमें यह बताया गया है कि भारत से ऑर्डर मिलने की वजह से हमारा वित्तीय एसेट क्या है. हम यह नहीं बता रहे कि भारत से ऑर्डर 7.4 अरब यूरो का है. सिर्फ मैं जानता हूं कि इसमें कितना हिस्सा राफेल के लिए है और कितना मिराज के लिए. हम इस विवरण को सार्वजनिक नहीं करते.’

उन्होंने कहा कि भारत का सौदा, मिस्र और कतर के सौदे से अलग है. इसलिए कीमतों की तुलना नहीं हो सकती. विमान की कीमत तो समान होती है, लेकिन सौदे की व्यापकता के हिसाब से कॉन्ट्रैक्ट अलग हो जाता है. उन्होंने कहा कि इस सौदे को लेकर चल रही समस्या का कंपनी पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. हम बस यह ध्यान रखते हैं कि हमारे ग्राहक, भारत का रक्षा मंत्रालय और भारतीय वायु सेना हमसे किस तरह से बात कर रही है. हमें उन पर पूरा भरोसा है. 

उन्होंने कहा, ‘कंपनी को आधिकारिक रूप से भारतीय वायु सेना द्वारा दो बार चुना गया, पहली बार 126 विमानों के कॉन्ट्रैक्ट के लिए और दूसरी बार, 36 विमानों के सौदे के लिए. इसका मतलब है कि हर कोई यह मानता था कि राफेल भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ विमान हैं. सौदे की कीमत का मसला भारत और फ्रांस सरकार के बीच का है.

एरिक ट्रैपियर से इंडिया टुडे ने जब पूछा कि क्या सरकार से सरकार समझौते की वजह से कीमत में बढ़त, एंसलिरी और अन्य विवरण जोड़े गए, तो ट्रैपियर ने कहा, ‘नहीं यह कीमत कंपनी ने दी थी. हमने जो कीमत तय की वह म्रिस और कतर के लगभग बराबर ही है.

कीमत को लेकर इतनी गोपनीयता क्यों

राफेल की कीमत को लेकर इतनी गोपनीयता क्यों है, इस सवाल पर ट्रैपियर ने कहा, ‘ज्यादातर रक्षा सौदे गोपनीय ही होते हैं, क्योंकि प्रतिस्पर्धी कंपनियों को कीमत हम नहीं बताना चाहते. वैसे यह विमान खरीदने वाली सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह कीमत सार्वजनिक करे या न करे. दोनों सरकारों ने इसे गोपनीय रखने की बात कही है.’

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