डायरी दिनांक 26.02.2017

26 फरवरी 17…आज श्रीगुरुजी कोलकाता चले गए, सो उनसे कोई बात नहीं हो पायी,पर एक पुराना वाक्या बताती हूँ…कुछ समय पूर्व एक सज्जन आश्रम आये थे और टिपण्णी कर गए,” यह कैसा आश्रम है जहाँ लोग table- chair पर बैठते हैं और लैप-टॉप पर काम करते हैं।” यह बात सुनकर श्रीगुरुजी बोले,” हमने फिल्मों को देख कर संतों, ऋषियों की एक छवि बना ली कि उनके सर पे जूड़ा होता होगा और पेड़ के नीचे ही बैठे रहते होंगे….हम यह क्यों नहीं समझते कि संत को तो सभी विषयों और तकनीक का ज्ञान होना ही चाहिये और आश्रम को भी आज की आधुनिक प्रणाली के अनुसार systems develop करने चाहिए तभी तो आश्रम training center कहलायेगा…आज के बच्चों को पुराने system से कैसे train करेंगे भला? पुष्पक विमान हो या ब्रह्मास्त्र चलाना, सब उस समय की तकनीक ही तो थी, जिसे राम-कृष्ण ने आश्रमों में ऋषियों से ही सीखी थी….और हम सोचते हैं आश्रम मतलब केवल घंटे- दीपक से पूजा विधि सीखना….। अरे! सोचने की बात है अगर फिर प्रभु का अवतार हुआ ,युद्ध हुआ तो क्या धनुष – बाण से लड़ेंगे…”
” आपको पुरोहित जी मंदिर में बुला रहे हैं ,” किसी ने मुझे आवाज़ दी… मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मैं यही सोच रही थी कि आज के बच्चों का training center आश्रम कैसे बन पाएगा अगर आधुनिकता से परहेज़ करेगा… युवाओं को कैसे जोड़ पायेगा…अगर युवा जुड़ेंगे ही नहीं तो उन्हें आधुनिकता और परंपरा का सही समन्वय कैसे सिखाया जाएगा?
मैं उन सज्जन को याद कर उनकी संकीर्ण मानसिकता पर मुस्कुराई और जल्दी-जल्दी सीढियां चढ़ने लगी.

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