तीन नौकरशाहों को HC से मिली बड़ी राहत, 13 जून तक दिल्ली एसेंबली नहीं उठाएगी कठोर कदम

 विधानसभा अध्यक्ष रामनिवास गोयल द्वारा शिक्षा, ऊर्जा और राजस्व विभाग के प्रधान सचिवों को सदन में उपस्थित रहने के निर्देश को लेकर तीनों अधिकारियों को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के दौरान दिल्ली विधानसभा से गुजारिश की वह इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाए। जस्टिस संगीता ढींगरा और सी. हरि शंकर ने यह भी कहा कि तीनों अधिकारियों के खिलाफ 13 जून तक कोई कार्रवाई नहीं की जाए। उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों का यह रवैया न केवल सदन बल्कि लोकतंत्र का भी अपमान है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इस मामले पर ट्वीट भी किया। उन्होंने लिखा, यह कैसे संभव है कि शिक्षा सचिव और निदेशक, विधानसभा को यह बताने से मना कर दें कि स्कूलों में शिक्षकों के कितने पद खाली हैं? वह भी इस अजीब तर्क के साथ कि यह मामला 'सर्विस मैटर्स' के तहत आता है, अत: यह विधानसभा के दायरे से बाहर है।

यह है पूरा मामला

इन तीनों ही विभागों के अधिकारियों ने विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान पूछे गए प्रश्नों का जवाब नहीं दिया था। इसके विरोध में विधानसभा अध्यक्ष ने 15 मिनट के लिए सदन की कार्यवाही भी स्थगित कर दी थी। साथ ही यह भी कहा कि यह स्थिति अघोषित आपातकाल जैसी है। ऐसा हाल तो अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं था। दरअसल, विधानसभा के बजट सत्र की तरह बुधवार को फिर यह स्थिति उत्पन्न हुई थी कि विधायकों द्वारा लगाए गए विभिन्न प्रश्नों का जवाब देने से शिक्षा, ऊर्जा और राजस्व विभाग के अधिकारियों ने मना कर दिया था।

इस पर विधानसभा अध्यक्ष ने कड़ी आपत्ति जताई और विधायकों ने भी सदन में खूब हंगामा किया था। विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी के पास जाकर विधायकों ने उपराज्यपाल और अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी भी की।

विधायकों का यह भी कहना था कि उपराज्यपाल के इशारे पर ही अधिकारी ऐसा कर रहे हैं। इस पर विधानसभा अध्यक्ष ने निर्देश दिया कि बुधवार को इन तीनों विभागों के प्रधान सचिव विधानसभा में मौजूद रहें। साथ ही उन्होंने ऐसे सभी आठ अनुत्तरित प्रश्नों का मामला प्रश्न एवं संदर्भ समिति को भी रेफर कर दिया।

उन्होंने यह भी कहा कि अधिकारियों का यह रवैया न केवल सदन बल्कि लोकतंत्र का भी अपमान है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इस मामले पर ट्वीट भी किया। उन्होंने लिखा, यह कैसे संभव है कि शिक्षा सचिव और निदेशक, विधानसभा को यह बताने से मना कर दें कि स्कूलों में शिक्षकों के कितने पद खाली हैं? वह भी इस अजीब तर्क के साथ कि यह मामला ‘सर्विस मैटर्स’ के तहत आता है, अत: यह विधानसभा के दायरे से बाहर है।

 
 

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