नोटबंदी के कारण पीएम मोदी के अच्छे दिनों का इंतजार हुआ और खत्म?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 8 नवंबर को काले धन पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक मतलब नोटबंदी से न केवल 2016-17 वित्तीय वर्ष के आखिरी महीनों में ग्रोथ रेट कम हो गई है बल्कि इससे सरकार के आर्थिक विशेषज्ञों और वित्त मंत्री की मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। इनकी यह मुश्किलें इस साल के बजट में भी अनिश्चितता के तौर दिखाई दी हैं। अभी भी नोटबंदी के असर की गणना की जा रही है इसीलिए न तो वित्त मंत्री अरुण जेटली ने और न मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने 31 जनवरी को इकनॉमिक सर्वे पेश करते हुए इस बारे में कोई आंकड़े जारी नहीं किए।

नोटबंदी के कारण पीएम मोदी के अच्छे दिनों का इंतजार हुआ और खत्म?

सर्वे में बताया गया है कि नोटबंदी से जीडीपी ग्रोथ रेट 0.25 से 0.5 पर्सेंट तक कम हो जाएगी। इसमें साल 2016-17 के दौरान 6.5 पर्सेंट की जीडीपी ग्रोथ रेट रहने की उम्मीद जताई गई है। वहीं, आईएमएफ ने नोटबंदी को देखते हुए साल 2016-17 में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 6.6 और 2017-18 के दौरान 7.2 पर्सेंट रहने की संभावना जताई है। बजट स्टेटमेंट में यह कहा गया है कि 31 मार्च तक नोटबंदी का असर कम हो जाएगा। लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार को भी इस समयसीमा पर पूरा भरोसा नहीं है।

सेंट्रल स्टैटिकल ऑफिस (सीएसओ) ने 4.8 पर्सेंट औसत मुद्रास्फीति का अंदाजा लगाया है। अगर औसतन इतनी ही मुद्रास्फीति रहती है तो बजट के मुताबिक वास्तविक जीडीपी ग्रोथ रेट 6.2 पर्सेंट रहेगी जो इकॉनमिक सर्वे के 6.5 पर्सेंट के अंदाजे से कम होगी। वास्तव में, अगर मुद्रास्फीति की दर कुछ कम रही तो ग्रोथ जरूर सर्वे के आंकड़ों को छू सकती है। सर्वे में कहा गया है कि 2017-18 में इकॉनमिक आउटपुट 6.75 से 7.5 पर्सेंट के बीच रहने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि सरकार का ऐसा लगता है कि इकॉनमी फिर से तेजी पर रहेगी और अगले साल नोटबंदी का असर नहीं रहेगा। हालांकि. यह निश्चिततौर पर नहीं है।

 

पिछले नौ महीने में सरकार के रेवेन्यू में उल्लेखनीय कमी दिखाई दे रही थी लेकिन साल की आखिरी तिमाही में बड़ी रकम अडवांस टैक्स के रूप में बड़ी रकम दी गई है ताकि पुराने 500 और 1,000 रुपये के नोटों का इसमें खपाया जा सके। वित्तीय वर्ष के आखिरी दो महीनों में जब निवेश बढ़ता हुआ दिखता है वहीं, इस बार इसमें कमी आई है और लोगों ने निवेश करने की बजाय धन सेविंग में लगाया है।

उधार लेना हुआ महंगा
लगभग 18 साल पहले सरकार ने वित्तीय घाटे से प्रभावित हुए बिना छोटी बचतों और पब्लिक प्रॉविडेंट फंट में अपनी पूरी देनदारी का हिसाब रखने के लिए एक नया तंत्र बनाया था। इसमें नैशनल स्मॉल सेविंग फंड (एनएसएसएफ) का निर्माण किया गया था जिसमें सभी छोटी बचत योजनाओं जैसे किसान विकास पत्र, नैशनल सेविंग सर्टिफिकेट, सुकन्या समृद्धि अकाउंट व अन्य का पूरा धन रखा जाता था। अब तक यह धन राज्यों को उधार दिया जाता था और बाकी धन केंद्र खुद इस्तेमाल करता था। पिछले कुछ सालों से राज्यों ने एनएसएसएफ फंड से पैसा मांगना बंद कर दिया है क्योंकि इससे कम ब्याज पर मार्केट से आसानी से धन मिल जाता है। केवल अरुणाचल प्रदेश, केरल, मध्य प्रदेश और दिल्ली अभी भी इस फंड से पैसा ले रहे हैं। बाकी का धन केंद्र अपने इस्तेमाल के लिए ले लेता है।

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अब इस फंड से सरकार को 8.8 पर्सेंट के ब्याज दर पर उधार दिया जाता है जबकि अगस्त 2016 तक यह ब्याज दर 9.5 थी। पिछले साल केंद्र सरकार ने एनएसएसएफ से 50,890 करोड़ रुपये उधार लिए थे। इस साल सरकार ने दिसंबर तक 1,07,209 करोड़ रुपये उधार लिए हैं। बजट के मुताबिक, सरकार इस वित्तीय वर्ष के आखिर तक 90,376 करोड़ रुपये उधार लेगी और अगले साल 1 लाख करोड़ रुपये अतिरिक्त लिए जाएंगे। बजट में सरकार का तर्क है कि इस धन से वह बाजार में अपनी देनदारियों से मुक्त होगी। साथ ही, सरकार को मिले कुल रेवेन्यू पर ब्याज का घाटा 33.9 पर्सेंट से बढ़कर 34.4 पर्सेंट हो गया है। यह भी 2017-18 के बजट डॉक्युमेंट के वित्तीय घाटे में जोड़ा जाएगा।

आने वाले महीनों में सरकार पर एनएसएसएफ और स्मॉल सेविंग्स की ब्याज दर में कटौती करने का दबाव रहेगा। पहले अगस्त और फिर सितंबर में पहले ही इनमें कटौती की जा चुकी है। 2018 का बजट मोदी सरकार का पूरा बजट होगा क्योंकि 2019 में आम चुनाव होने हैं। जब इस साल इकनॉमिक ग्रोथ निश्चित तौर पर कम रहनी है और स्थिति में सुधार होने पर ही उम्मीद लगाई जा रही है तो यह निश्चिततौर पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री के अच्छे दिनों का अभी और लंबा इंतजार करना होगा।

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