बरुथनी एकादशी व्रत, करोड़ों सालों की तपस्या का देता है फल

मल्टीमीडिया डेस्क। वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को बरुथनी एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 12 अप्रैल को है। विष्णु पुराण के अनुसार बरुथनी एकादशी का व्रत सौभाग्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इस दिन गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व होता है।मल्टीमीडिया डेस्क। वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को बरुथनी एकादशी कहते हैं। इस बार यह एकादशी 12 अप्रैल को है। विष्णु पुराण के अनुसार बरुथनी एकादशी का व्रत सौभाग्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। इस दिन गंगा स्नान और दान का विशेष महत्व होता है।  जो यह व्रत करता है उसके सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन जरुरतमंद को दान देने से करोड़ों वर्ष तक तपस्या करने और कन्यादान के भी फलों से बढ़कर फल मिलता है।  बरूथनी एकादशी व्रत कथा  पद्म पुराण के अनुसार, प्राचीन समय में नर्मदा तट पर मांधाता राजा राज्य सुख भोग रहा था। राजकाज करते हुए भी वह अत्यन्त दानशील और तपस्वी था। एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था, तब एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा। थोड़ी देर बाद वह राजा को घसीट कर वन में ले गया। तब राजा ने घबरा गया, लेकिन तपस्या धर्म के अनुकुल क्रोध न करके भगवान श्री विष्णु से प्रार्थना की।  भक्तों को संकट से बचाने वाले श्री विष्णु वहां प्रकट हुए़ और भालू को चक्र से मार डाला। राजा का पैर भालू खा चुका था, जिससे राजा शोकाकुल था। तब भगवान विष्णु ने उसको दु:खी देखकर कहा कि कि तुम मथुरा में मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा बरूथनी एकादशी का व्रत करके करो।  ट्रेन जैसा दिखता है अलवर का यह सरकारी स्कूल, बरामदा प्लेटफॉर्म जैसा  इसके प्रभाव से तुम पुन: अंगों वाले हो जाओगे। भालू ने तुम्हारा जो अंग काटा है, वह अंग भी ठीक हो जाएगा। यह तुम्हारा पैर पूर्वजन्म के अपराध के कारण भालू खा गया था। राजा ने इस व्रत को पूरी श्रद्वा से किया और वह फिर से सुंदर अंगों वाला हो गया।  इस व्रत में इन कार्यों से बचें  एकादशी से एक दिन पहले से ही कांसे के बर्तन में भोजन, मांस, मसूर की दाल, चने, शाक, शहद और पान आदि का सेवन न करें। किसी दूसरे के अन्न, दूसरी बार भोजन न करें। मन को पवित्र बनाएं, जुआ न खेलें, रात्रि को शयन न करें, निंदा, क्रोध और झूठ न बोलें।

जो यह व्रत करता है उसके सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन जरुरतमंद को दान देने से करोड़ों वर्ष तक तपस्या करने और कन्यादान के भी फलों से बढ़कर फल मिलता है।

बरूथनी एकादशी व्रत कथा

पद्म पुराण के अनुसार, प्राचीन समय में नर्मदा तट पर मांधाता राजा राज्य सुख भोग रहा था। राजकाज करते हुए भी वह अत्यन्त दानशील और तपस्वी था। एक दिन जब वह तपस्या कर रहा था, तब एक जंगली भालू आकर उसका पैर चबाने लगा। थोड़ी देर बाद वह राजा को घसीट कर वन में ले गया। तब राजा ने घबरा गया, लेकिन तपस्या धर्म के अनुकुल क्रोध न करके भगवान श्री विष्णु से प्रार्थना की।

भक्तों को संकट से बचाने वाले श्री विष्णु वहां प्रकट हुए़ और भालू को चक्र से मार डाला। राजा का पैर भालू खा चुका था, जिससे राजा शोकाकुल था। तब भगवान विष्णु ने उसको दु:खी देखकर कहा कि कि तुम मथुरा में मेरी वाराह अवतार मूर्ति की पूजा बरूथनी एकादशी का व्रत करके करो।

इसके प्रभाव से तुम पुन: अंगों वाले हो जाओगे। भालू ने तुम्हारा जो अंग काटा है, वह अंग भी ठीक हो जाएगा। यह तुम्हारा पैर पूर्वजन्म के अपराध के कारण भालू खा गया था। राजा ने इस व्रत को पूरी श्रद्वा से किया और वह फिर से सुंदर अंगों वाला हो गया।

इस व्रत में इन कार्यों से बचें

एकादशी से एक दिन पहले से ही कांसे के बर्तन में भोजन, मांस, मसूर की दाल, चने, शाक, शहद और पान आदि का सेवन न करें। किसी दूसरे के अन्न, दूसरी बार भोजन न करें। मन को पवित्र बनाएं, जुआ न खेलें, रात्रि को शयन न करें, निंदा, क्रोध और झूठ न बोलें।

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