बड़ी खबर: ना पैसा, ना साथी, कैसे हुंकार भरेगा माया का हाथी

बीएसपी सुप्रीमो मायावती विरोधी दलों को अपनी सियासी ताकत का अहसास कराने के लिए 18 सितंबर से अपनी रैलियों का दौर शुरू कर रही हैं. मायावती की ये रैलियां राज्य के मंडल स्तर पर आयोजित हैं. इस कड़ी में 18 सितंबर को पहली रैली मेरठ और सहारनपुर मंडल की संयुक्त रैली मेरठ में है. बीएसपी के राजनीतिक भविष्य के मद्देनजर ये रैलियां काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.बड़ी खबर: ना पैसा, ना साथी, कैसे हुंकार भरेगा माया का हाथीमोदी सरकार के खिलाफ कांग्रेस ने, विपक्षी दलों के साथ साझी विरासत बचाओ सम्मेलन में एकजुटता किया प्रदर्शित

मायावती की रैलियों को सफल बनाने वाले फंड रेजर और भीड़ रेजर दोनों या पार्टियां छोड़ चुके हैं या फिर मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि ना पैसा, ना साथी कैसा हुंकार भरेगा मायावती का हाथी.

ईवीएम के खिलाफ बीएसपी का प्रदर्शन फेल

बता दें कि यूपी के 2017 विधानसभा चुनाव में मायावती ने करारी हार के बाद ईवीएम को कोसा था. उन्होंने कहा था कि हर महीने की 11 तारीख को जिला मुख्यालयों पर बीएसपी कार्यकर्ता प्रदर्शन करेंगे. ये सिलसिला तब तक जारी रहेगा, जब तक ईवीएम के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं होती. मायावती के ये फरमान पूरी तरह से फेल हो गया. बीएसपी कार्यकर्ता ईवीएम के खिलाफ जिला मुख्यालयों पर नहीं जुट सके.

अंबेडकर जयंती पर नहीं जुटी भीड़

बीएसपी सुप्रीमो मायावती हर साल 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के मौके पर बड़ी रैली करती रही हैं. इस साल भी मायावती ने लखनऊ के अंबेडकर मैदान में 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के मौके पर रैली का आयोजन किया था, लेकिन इस रैली में बीएसपी भीड़ जुटाने में कामयाब नहीं हो सकी. महज कुछ हजार लोग ही एकत्रित हुए थे.

रैलियों के फेल होने के पीछे ये वजह

दरअसल मायावती की रैलियों को सफल बनाने में पार्टी के महासचिव की अहम भूमिका रहती थी. पिछले 6 महीने में कई महासचिव पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टियों में चले गए हैं या फिर मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया है. ऐसे में पार्टी में ऐेसे लोगों की कमी हो गई है, जो मायावती की रैलियों में भीड़ जुटाने का काम किया करते थे. इनमें बीएसपी के ओबीसी चेहरा रहे स्वामी प्रसाद मौर्य, मुस्लिम नेता, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, दलितों में इंद्रजीत सरोज, आरके चौधरी जैसे नेता आज पार्टी में नहीं है. ऐसे में मायावती के सामने भीड़ जुटाने वाले नेताओं की पूर्ती के बिना रैली कैसे सफल होगी ये बड़ा सवाल है.

 

फंड रेजर की कमी से भी जूझ रही बीएसपी

मौजूदा समय में बीएसपी के पास फंड रेजर नेताओं की कमी से जूझ रही है. मायावती की रैलियों को सफल बनाने में नसीमुद्दीन जैसे कई नेता फंड रेजर का काम करते थे, लेकिन पिछले दिनों मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. ऐसे में रैलियों के लिए खर्च होने वाले पैसे का इंतजाम कैसे होगा.

फंड देने से कतरा रहे नेता

बीएसपी की एक रैली का खर्च करीब ढेड़ से दो करोड़ रुपये तक होता है, जो पार्टी नेता करते हैं. ये रैलियां जिस जिले या लोकसभा में होनी होती है ऐसे में वहां के प्रभारी सारा खर्च उठाते हैं. लोकसभा और विधानसभा में बीएसपी को मिली करारी हार के बाद पार्टी के नेता पैसा खर्च करने से कतरा रहे हैं. ऐसे में मायावती की मंडल स्तर पर होने वाली रैलियों पर आर्थिक संकट है.

मेरठ और आजमगढ़ के बाद क्या होगा

सूत्रों के मुताबिक मेरठ की रैली का जिम्मा जहां याकूब कुरैशी और काजी राशिद मसूद उठा रहे हैं, क्योंकि इनके पास पैसे की भरमार है. वहीं आजमगढ़ में होने वाली रैली का खर्च मुबारकपुर के विधायक जमाली उठाएंगे और बनारस की रैली का जिम्मा अंसारी बंधुओं पर है. इसके बाद बाकी रैलियों का खर्च उठाने के लिए कोई नेता तैयार नहीं हो रहा है. खासकर गोरखपुर, बुंदेलखंड, बरेली, फैजाबाद, इलाहाबाद जैसे मंडल की रैलियां शामिल हैं.

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