बड़ी खबर: 6 गोली लगने के बाद भी पाक आर्मी पर भाड़ी पड़ा ये भारतीय जवान

ये कहानी भारतीय सेना के एक ऐसे वीर योद्धा की है जिसने अकेले ही पकिस्तानी आर्मी की एक पूरी बटालियन को झुकने पर मजबूर कर दिया। जिसकी वीरता के लिए उसे जीवित रहते हुए भारत के सबसे बड़े पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। हम बात कर रहे हैं टाइगर हिल टॉप विजेता 18 ग्रिनेडियर के वीर जवान योगेन्द्र सिंह यादव की।

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आपको बता दें कि कारगिल वॉर विश्व के अब तक के सबसे कठिन युद्धों में से एक था। इस युद्ध में हजारों फीट ऊंची पहाडिय़ों पर चढ़ कर दुश्मन को मारना था और इस पर भारतीय सेना ने जांबाजी का परिचय दिया था। 

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ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव ने 6 गोलियां लगने के बाद भी दुश्‍मन के चार सिपाहियों को मारा था। योगेंद्र की इस बहादुरी के लिए उन्हें 15 अगस्त 1999 को सिर्फ 19 साल की उम्र में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। वह भारतीय सेना में आज भी देश की सेवा कर रहे हैं। योगेंद्र सिंह यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के औरंगाबाद अहीर गांव में 1980 में हुआ था।

योगेन्द्र यादव ने शादी के 15 दिन बाद ही देश की आन के लिए युद्ध के लिए कारगिल की तरफ बढ़ गए थे। वे भारतीय सेना के 18 ग्रेनेडियर यूनिट का हिस्सा थे। 1999 के कारगिल युद्ध से कुछ दिनों पहले योगेन्द्र अपनी शादी के लिए घर आए हुए थे। 5 मई 1999 को उनकी शादी थी। शादी के बाद 20 मई को वे वापस जम्मू कश्मीर पहुंचे तो उन्हें पता चला की उनकी बटालियन 18 ग्रिनेडियर द्रास सेकटर की सबसे ऊंची पहाड़ी तोलोलिंग पर लड़ाई लड़ रही है।
द्रास सेक्टर पहुंचकर उन्होंने जवानों के साथ युद्ध किया, उस लड़ाई में उनकी बटालियन के 2 अफसर, 2 जेसीओ और 22 जवान शहीद हुए। 12 जून को उनकी बटालियन ने तोलोलिंग पहाड़ी जीत कर उसपर तिरंगा फहरा दिया। सबसे कम मात्र 19 वर्ष कि आयु में परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले इस वीर योद्धा ने उम्र के इतने कम पड़ाव में जांबाजी का ऐसा इतिहास रच दिया कि आने वाली सदियां भी याद रखेंगीं।
उसके बाद उनकी बटालियन को टाइगर हिल को कैप्चर करने का हुक्म दिया गया, उस आदेश को सुनकर उनकी बटालियन के कमांडिंग अफसर कुशाल चंद ठाकुर ने एक नई घातक टुकड़ी बनाई, जिसमें बटालियन के नए-नए यंग सोल्जर्स को चुना गया। यह टुकड़ी 18 ग्रिनेडियर की सबसे अहम् टुकड़ी थी, जिसको सबसे पहले टाईगर हिल पर जाकर उस रास्ते पर कब्जा करना था जिस रास्ते से पाकिस्तानी यह सोच भी नहीं सकते थे कि यहां से भी इंडियन आर्मी ऊपर आ सकती है।
2 जुलाई 1999 को 18 ग्रिनेडियर ने टाइगर हिल पर चढ़ाई करने की तैयारी शरू कर दी और उसी दिन शाम को साढ़े 6 बजे योगेन्द्र और उनके साथियों ने भी चढऩा शुरू कर दिया। तीन दिन और 2 रात की लगातार चढ़ाई के बाद 5 जुलाई को सुबह वे टाइगर हिल पर पहुंचे। सुबह का वक्त था रास्ता इतना कठिन था कि रस्सों का सहारा लेकर, एक दूसरे का सहारा लेकर साथी चढ़ सके।
बर्फीली आंधियों चल रही थी मुंह पर थपेड़े से मार रहे थे, लेकिन सारे जवान इसकी परवाह न करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जिस रास्ते से वे चढ़ रहे थे उस रास्ते के दोनों तरफ नाले थे और नालों में दुश्मनों का बंकर। अंधेरे की वजह से योगेन्द्र और उनके साथी बंकरों को नहीं देख पाए और पाकिस्तानी सेना ने उनके ऊपर फायरिंग कर दी।
अंधाधुंध गोला बारी शरू हो गई। तकरीबन दिन के साढ़े 10 बज चुके थे, पांच घंटे की फायरिंग में दुश्मन यह अंदाजा नहीं लगा पाया कि वहां इंडियन आर्मी के कितने जवान हैं। योगेन्द्र समेत सात जवानों ने दिखा दिया कि वहां पर 7 नहीं बल्कि 700 जवान हैं। तकरीबन 11 बजे दुश्मन की एक छोटी सी टुकड़ी भारतीय जवानों को देखने आई कि वास्तव में वहां पर कम जवान हैं या फिर ज्यादा।
जब पाक आर्मी उनके बिलकुल नजदीक आई तो उन्होंनेे उनपर फायरिंग शुरू दी, जिसमें 8 को मौत के घाट उतार दिया और 2 घायल हो गए। उन दोनों घायल पाक सैनिकों ने अपने कमांडर को बता दिया कि वहां पर केवल 7 हिन्दुस्तानी जवान हैं तब उनके कमांडर ने फिर से प्लानिंग की और दोबारा आधे घंटे के बाद फिर से अटैक किया।
अब तकरीबन 70 पाक सैनिक उनके ऊपर अटैक करने के लिए आए और उन्होंने अल्लाह हु अकबर के नारे लगाने शुरू कर दिए। योगेन्द्र और उनके साथी इंतजार करने लगे कि दुश्मन जैसे ही उनके नजदीक आए वे उनके ऊपर अंधाधुंध फायरिंग शुरु कर दें, क्योकि अब उनके पास हथियारों की कमी हो रही थी और नीचे से सप्लाई हो नहीं पा रही थी। जब वे नजदीक पहुंचे तो पाक सैनिकों ने ऊपर से ही पत्थर मारने शरू कर दिए। उन्होंने भारतीय जवानों को सिर झुकाने पर मजबूर कर दिया तब भी वे जैसे तैसे पत्थरों के बीच से दुबक के गोली चलाते रहे।
अल्लाह हु अकबर का नारा लगाकर पाक सैनिक योगेन्द्र और उनके साथियों के ऊपर टूट पड़े। छह भारतीय जवान शहीद हुए, लेकिन उन्होंने दुश्मन के 35 जवानों को मौत के घाट उतार दिया। योगेन्द्र भी बेहोशी की हालत में पड़े हुए थे। गोलियां लगी हुई थी चारों तरफ से खून निकल रहा था, लेकिन उन्हें दर्द नहीं हो रहा था क्योंकि देशभक्ति का जूनून जब सिर पर चढ़ जाता हैं तो उस समय सिर्फ तिरंगा या फिर भारत माता ही दिखाई पड़ती हैं। योगेन्द्र को जब होश आया तो वे सही मौके की तलाश में चुप चाप वहीं पड़े रहे। उन्होंने सोचा कि मैं अभी मैं अकेला हूं और दुश्मन ज्यादा हैं जैसे ही पाक सैनिक इक्कठा होगा मैं मौके का फायदा उठाकर इनको ज्यादा से ज्यादा मार गिराऊंगा।
जब योगेन्द्र बेहोश पड़े थे तो उन्होंने सोचा कि देखें पाकिस्तानी आर्मी हमारी आर्मी के साथ कैसा सलूक करती है। योगेन्द्र ने देखा कि भारत के शहीद जवानों की डेड बॉडी पर पाक सैनिकों ने तीन-तीन बार आकर गोलियां मारी, पूरी डेड बॉडी छलनी कर दी फिर भी उन्हें सब्र नहीं आया। उन्होंने बूट से ठोकरे मारी और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने शुरु कर दिए।
उन्होंने हमारी 500 मीटर नीचे एमएमजी पोस्ट को बर्बाद करने के लिए मैसेज किया कि यहां जो इन्डियन आर्मी का जो पोस्ट हैं उसे बर्बाद कर दो। तब योगेन्द्र के दिल में एकदम से घंटी बजी की अगर इन्होंने उस पोस्ट पर कब्जा कर लिया तो ऊपर और नीचे इनका पोस्ट हैं और बीच में भारतीय पोस्ट। हमारे साथी तो अपने आप ही खत्म हो जाएंगे, क्योकि नीचे वाले साथियों को नहीं पता हैं कि ऊपर वाले जो साथी हैं वह शहीद हो चुके हैं।
योगेन्द्र ने भगवान से दुआ की कि मुझे इतना जिन्दा रख दें कि मैं अपने साथियों को सूचना दे दूं कि आपके ऊपर हमला होने वाला हैं। योगेन्द्र यह सोच ही रहे थे कि अपने साथियों को कैसे संदेश दूं, तभी दुश्मनों की सेना के कमांडर ने आदेश दिया कि भारतीय फौजियों की रायफलें उठा लो। एक पाक सैनिक राइफलें उठा रहा था तो दूसरा फिर से भारतीय जवानों को गोलियां मारने लगा।
उसने योगेन्द्र को भी देख लिया और उनके पैर पर गोली मारी फिर जांघ और बाजू में मारी गोलियां मारकर चला गया। योगेन्द्र का सिर पहले ही फटा हुआ था। उन्होंने सोचा कि अगर यह मेरे सिर और सीने पर गोली नहीं मारेंगे तो मैं जिन्दा रहूंगा चाहे पैर ही क्यों न काट के ले जाएं। लेकिन वो फिर वापस आया और पलटते ही उसने योगेन्द्र की छाती पर फायर कर दिया।
योगेन्द्र की छाती की जेब में उनका पर्स रखा हुआ था और उसमें पांच-पांच के सिक्के थे, वह सिक्के इक्कठे थे। गोली उस सिक्के पर लगी। दुश्मन को लगा कि योगेन्द्र शहीद हो गए हैं और वो जाने लगे। फिर योगेन्द्र के पास जो हथगोला बचा हुआ था उस ग्रेनेड को लिया और उसे दुश्मन के ऊपर थ्रो कर दिया। सर्दी के कारण सभी ने कोट पहन रखा था।
ग्रेनेड दुश्मन की टोपी में गिर गया, जब तक वह ग्रेनेड को निकाल पाता ग्रेनेड फट गया। पाक सैनिक मारे गए और उनके खेमे में खलबली मच गई। पाकिस्तानी आर्मी को लगा कि इंडियन आर्मी नीचे से आ गई। योगेन्द्र के एक हाथ में गोली लगी थी, उन्होंने दूसरे हाथ से रायफल उठाई और वहीं से दनादन फायरिंग शुरू करदी और पाक के चार फौजियों को मौत के घाट उतार दिया।
पाकिस्तानी सैनिक भाग खड़े हुए, उन्होंने पीछे मुड़कर यह भी नहीं देखा कि यहां पर इंडियन आर्मी का एक ही सोल्जर है। योगेन्द्र चारों तरफ से फायरिंग करते रहे और उनको भगाते रहे। फिर योगेन्द्र अपने साथियों के पास वापस आए। उन्हें लगा कि शायद इनमें से कोई जिन्दा हो, लेकिन देखा तो सभी शहीद हो गए थे। योगेन्द्र बहुत देर तक अपने साथियों को याद करके रोते रहे।
अब उन्हें नीचे करीब 500 मीटर जाना था। वे एक नाले से नीचे लुढ़कने की सोचे। टूटे हुए बाएं हाथ को उन्होंने उखाडऩे की कोशिश की। उन्हें लगा कि अब ये बेकार हो चुका हैं। एक झटका दिया, लेकिन हाथ अब भी जुड़ा हुआ था और अलग न हो सका। उन्होंने हाथ को बेल्ट में फंसा लिया और लुढ़क गए। तभी उन्होंने देखा की भारतीय सेना के जवान एमएमजी पोस्ट की तरफ से आ रहे थे।
योगेन्द्र की टीम के कमांडर लेफ्टिनेंट बलवान सिंह और कैप्टन सचिन नेपालकर को उन्होंने आवाज दी। योगेन्द्र की कंडीशन देखकर कोई नहीं कह रहा था वो जिन्दा बचेंगे। उनकी ड्रेस के चीथड़े उड़ गए थे। उन्होंने कहा कि सर मुझे कुछ नहीं हुआ है, लेकिन यहां पर हमला होने वाला है। उन्होंने तुरंत सीओ को सूचना दी कि हमारी जो टीम ऊपर हमला करने के लिए गई थी उसमें से एक जिन्दा वापस आया हैं और बाकी सभी छह साथी शहीद हो चुके हैं।
सीओ ने कहा कि इस जवान को तुरंत नीचे भेजो। योगेन्द्र पहुंचे तो खून अभी भी बह ही रहा था। उनका इलाज शुरु हो गया। सीओ ने तुरंत रीप्लानिंग की और फिर एक रिजर्व कंपनी को टाइगर हिल पर भेजा और उसी रात को टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया गया।
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