भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं…

भारत का इतिहास संपन्‍नता और भव्‍यता से भरा पड़ा है. लाखों की तादाद में हर रोज पर्यटक यहां की खूबसूरती और परंपराओं के दर्शन करने के लिए खींचे चले आते हैं. राजा महाराजाओं के इस देश में इमारतों और किलों के नायाब नमूने आजतक मौजूद हैं जिन्‍हें देखने का मोह पर्यटक छोड़ नहीं पाते हैं. भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...मानसून के सीजन में बढ़ जाती है केरल की और भी खूबसूरती, इन जगहों पर करें खूब मस्‍ती

1. आगरा का किला: उत्तर प्रदेश के आगरा में स्थित इस किले को यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शामिल किया है. पहले यह किला राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान के पास था, जिस पर बाद में महमूद गजनवी ने कब्जा कर लिया था. अपने वास्तुशिल्प, नक्काशी और सुंदर रंग-रोगन के साथ इसकी भव्यता के कारण यह देश सभी किलों में से सबसे ज्‍यादा सुंदर माना जाता है. इस किले की चहारदीवारी के अंदर एक पूरा शहर बसा हुआ जिसकी कई इमारतें उत्‍कृष्‍ट कला के नमूनों में से एक हैं. सफेद संगमरमर की मोती मस्जिद, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, मुसम्मन बुर्ज, जहांगीर पैलेस, खास महल और शीश महल उनमें से कुछ खास हैं. मुगल शासक बादशाह अकबर ने 1573 में आगरा के किले के निर्माण की शुरुआत की थी. भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...2. लाल किला: लाल किला दिल्ली का एक विश्व प्रसिद्ध किला है. इसका निर्माण तोमर राजा अनंगपाल ने 1060 में करवाया था. बाद में पृथ्वीराज चौहान ने इसे फिर से बनवाया और शाहजहां ने इसे तुर्क शैली में ढलवाया था. लाल बलुआ पत्थरों और प्राचीर के कारण इसे लाल किला कहा जाता है. भारत के लिए यह किला ऐतिहासिक महत्व रखता है. हर साल भारत के प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लालकिले पर तिरंगा फहराते हैं. भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...मुगल शासक, शाहजहां ने 11 वर्ष तक आगरा से शासन करने के बाद तय किया कि राजधानी को दिल्‍ली लाया जाए और यहां 1618 में लाल किले की नींव रखी गई. वर्ष 1647 में इसके उद्घाटन के बाद महल के मुख्‍य कक्ष भारी पर्दों से सजाए गए और चीन से रेशम और टर्की से मखमल लाकर इसकी सजावट की गई. लगभग डेढ़ मील के दायरे में फैले इस किले के लाहौर और दिल्‍ली गेट दो प्रवेश द्वार हैं.

3. चित्तौड़गढ़ का किला: राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में स्थित यह किला 700 एकड़ जमीन में फैला हुआ है. जमीन से 500 फुट की ऊंची पहाड़ी पर बना यह किला बेराच नदी के किनारे स्थि‍त है. 7वीं सदी से 16वीं सदी तक यह राजपूत वंश का महत्वतपूर्ण गढ़ हुआ करता था. इस किले की विशेषता इसके मजबूत प्रवेशद्वार, बुर्ज, महल, मंदिर, दुर्ग तथा जलाशय हैं जो राजपूत वास्‍तुकला के उत्‍कृष्‍ट नमूनों में से हैं. इस किले के सात प्रवेश द्वार हैं. प्रथम प्रवेश द्वार पैदल पोल के नाम से जाना जाता है जिसके बाद भैरव पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोली पोल, लक्ष्‍मण पोल तथा अंत में राम पोल है जो 1459 में बनवाया गया था. किले की पूर्वी दिशा में स्‍थित प्रवेशद्वार को सूरज पोल कहा जाता है. भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...4. ग्वालियर का किला: मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में स्थित इस किले का निर्माण राजा मानसिंह तोमर ने करवाया था. यह उत्तर और मध्य भारत के सर्वाधिक सुरक्षित किलों में से एक है. सुंदर स्थापत्य कला, दीवारों और प्राचीरों पर बेहतरीन नक्काशी, रंग-रोगन और शिल्प के कारण यह किला बेहद खूबसूरत दिखाई देता है. यह किला ग्वालियर शहर के प्रमुख स्मारकों में से एक है. यह किला गोपांचल नामक पर्वत पर स्थित है. लाल बलुए पत्थर से बना यह किला शहर की हर दिशा से दिखाई देता है. इस किले के भीतरी हिस्सों में मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूने मौजूद हैं.  भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...पन्द्रहवीं शताब्दी में निर्मित गूजरी महल उनमें से एक है जो राजा मानसिंह और गूजरी रानी मृगनयनी के गहन प्रेम का प्रतीक है. इसे बलुआ पत्थर की पहाड़ी पर निर्मित किया गया है और यह मैदानी क्षेत्र से 100 मीटर ऊंचाई पर है. किले की बाहरी दीवार लगभग 2 मील लंबी है और इसकी चौड़ाई एक किलोमीटर से लेकर 200 मीटर तक है. 

5. सोनार का किला: सोनार का किला राजस्थान के जैसलमेर में स्थित है. इस किले की खासियत यह है कि इस पर जैसे ही सुबह सूरज की किरणें पड़ती हैं. यह सोने की तरह दमकता है. इसलिए इसे सोनार का किला कहते हैं. वैसे रेगिस्तान के बीच में स्थित होने से इसे रेगिस्तान का दुर्ग भी कहा जाता है. यह दुनिया के बड़े किलों में से एक है और इसमें चारों ओर 99 गढ़ बने हुए हैं. इनमें से 92 गढ़ों का निर्माण 1633 से 1647 के बीच हुआ था.
जैसलमेर के किले का मुख्य आकर्षण गोपा चौक स्थित किले का प्रथम प्रवेश द्वार ही है. यह विशाल और भव्य द्वार पत्थर पर की गई नक्काशी का शानदार नमूना है. दूसरा आकर्षण दुर्ग के अंतिम द्वार हावड़पोल के पास स्थित दशहरा चौक है जो इस दुर्ग का खास दर्शनीय स्थल है. यहां पर्यटक खरीददारी का आनंद ले सकते हैं. दशहरा चौक में स्थानीय शिल्प और हस्तकला की बेहद खूबसूरत वस्तुओं की छोटी-छोटी दुकानें हैं जिन पर कांच जड़े वस्त्र, चादरें, फ्रेम और कई अन्य कलात्मक वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं.  भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...जैसलमेर किले में एक अन्य आकर्षण है राजमहल. यह महल किले के अंदरूनी हिस्से में बना हुआ है. किसी समय यह महल जैसलमेर के राजा महाराजाओं के निवास का मुख्य स्थल हुआ करता था. इस वजह से यह दुर्ग का सबसे खूबसूरत हिस्सा भी है. वर्तमान में इस महल के एक हिस्से को म्यूजियम और हैरिटेज सेंटर के रूप में तब्दील कर दिया गया है.

6. कांगड़ा किला: यह किला हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित है जिसका निर्माण कांगड़ा के शाही परिवार ने कराया था. यह दुनिया के सबसे पुराने किलों में से एक है और इसे देश के सबसे पुराने किलों में गिना जाता है. इसे नगरकोट या कोट कांगड़ा के नाम से भी जाना जाता है जो पुराने कांगड़ा नगर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है. बाणगंगा और मांझी नदियों के ऊपर स्थित कांगड़ा, 500 राजाओं की वंशावली के पूर्वज राजा भूमचंद की ‘त्रिगतरा’ भूमि का राजधानी नगर था. कांगड़ा का किला धन-संपति के भंडार के लिए इतना प्रसिद्ध था कि मोहम्मद गजनी ने भारत में अपने चौथे अभियान के दौरान पंजाब को हराया और सीधे ही 1009 ईसवी में कांगड़ा पहुंचा था. भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...7. सिंधुदुर्ग: यह किला मुंबई से 400 किलोमीटर की दूरी पर समुद्र के बीच में बनाया गया था.  किले का निर्माण शिवाजी ने 1664 से 1667 के बीच किया था. सिंधुदुर्ग अपनी खूबसूरती की वजह से आज भी पर्यटकों को अपनी और आकर्षित करता है. यह मुंबई के दक्षिण में महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में स्थित है.भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...8. गोलकुंडा का किला: आंध्रप्रदेश की राजधानी हैदराबाद से 11 किलोमीटर की दूरी पर बने इस किले का निर्माण काकतिया शासकों ने करवाया था. इसे भव्यता और सुंदर संरचना के कारण जाना जाता है. आज भी हजारों की संख्या में पर्यटकाें का यहां जमावड़ा देखा जा सकता है. भारत की विरासत समेटे इन किलों को देखने एक बार जरूर जाएं...इस दुर्ग का निर्माण वारंगल के राजा ने 14वीं शताब्दी में कराया था. बाद में यह बहमनी राजाओं के हाथ में चला गया और मुहम्मदनगर कहलाने लगा. 1512 ई. में यह कुतुबशाही राजाओं के अधिकार में आया. फिर 1687 ई. में इसे औरंगजेब ने जीत लिया. ग्रेनाइट की एक पहाड़ी पर बने इस दुर्ग में कुल आठ दरवाजे हैं. साथ ही यह पत्थर की तीन मील लंबी मजबूत दीवार से घिरा है. मूसी नदी दुर्ग के दक्षिण में बहती है. दुर्ग से लगभग आधा मील दूर उत्तर में कुतबशाही राजाओं के ग्रेनाइट पत्थर के मकबरे हैं जो टूटी-फूटी अवस्था में अब भी मौजूद हैं.

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