मन की शांति के लिए प्रभु का स्मरण करना होता है जरूरी

यह आवश्यक है कि हम अपने चित्त को अनुशासित करें, इन्द्रियों को अनुशासित करें, लेकिन प्रश्न है कि हम कैसे अपने चित्त को अनुशासित करेंगे? उदाहरण के लिए, जब हम अपने घर से बाहर होते हैं, तो हमें वह शांति नहीं मिलती, जो घर आकर मिलती है। बाहर हमारी चंचलता बढ़ती है, अशांति बढ़ती है। अपने कमरे में बिस्तर पर आने के बाद जब हम अपने चित्त को समाहित करके कुछ समय बिताते हैं, तो हमें बहुत आनंद प्राप्त होता है।मन की शांति के लिए प्रभु का स्मरण करना होता है जरूरी
 योग दर्शन के अनुसार, समाधान है कि हम अपने मन के फैलाव को रोकें। यह कैसे किया जाए? यह चिंता हर किसी को रही है कि अपने चित्त को कैसे समाहित या एकाग्र करें। जो मन विभिन्न विषयों-चीजों से जुड़ रहा है, जो कभी शांत नहीं होता उसे हम कैसे जोड़ें? उसे हम कैसे रोकें? इसके लिए अच्छा समाधान प्रभु का स्मरण है। यदि कोई यम-नियम नहीं करता और समाधिस्थ होना चाहता है, मोक्ष की कामना करता है, तो उसके लिए विकल्प भी है। 
महर्षि पतंजलि ने ईश्वर प्रणिधान को समाधि का विकल्प बताया है। कहा है कि ईश्वर का चिंतन करो। ईश्वर के लिए अपने जीवन को समर्पित करो, ऐसा करने से कुछ खास किए बिना मोक्ष या समाधि की सिद्ध हो जाएगी। विकल्प को बहुत ध्यान से समझना चाहिए। जैसे, हम हवाई जहाज से नहीं जा सकते, तो रेल से जा सकते हैं, रेल से नहीं जा सकते, तो बस से जा सकते हैं। बस से नहीं जा सकते, तो पैदल जा सकते हैं। समाधि के लिए विकल्प बता दिया कि ईश्वर का ध्यान करो। यह भी साधन का भाग है। भगवान ने कहा भी है कि मेरी शरण में आ आओ -‘मामेकं शरणं ब्रज।’ इसमें ज्ञान की विशेष जरूरत नहीं है। 

मेरे ऊपर पूर्ण रूप से विश्वास करके, सभी मोह-माया, प्रपंच, सभी दूसरे अवलंबों को, दूसरे आश्रयों को पूर्णत: विदाई देकर तुम आ जाओ मेरी शरण में। मैं तुम्हें मोक्ष दूंगा, तुम्हारे शोक दूर करूंगा। तुम्हें तमाम प्रकार के दुखों से दूर करूंगा। यह भी मोक्ष का मार्ग है। यम-नियम योग दर्शन के महत्वपूर्ण सोपान हैं। आज समाज के हर व्यक्ति को जरूरत है कि वह यम-नियम का अवलंबन करे। महा चंचलता से युक्त मन को संभालना हैद्घ नियंत्रित करना है, तो यम-नियम का पालन करना होगा। 

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