मशहूर गायिका जरीना बेगम का लखनऊ में लंबी बीमारी के बाद निधन

मशहूर गायिका जरीना बेगम का आज लखनऊ में निधन हो गया। गजल, ठुमरी और दादरी को एक नई पहचान वाली जरीना बेगम का जन्म बहराइच के नानपारा में हुआ था। जरीना बेगम लंबे समय से बीमार चल रहीं थी और परिवार के लोगों की आर्थिक हालत दयनीय होने के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो पाया।जरीना बेगम की बेटी रूबीना, दामाद नावेद और दिव्यांग बेटा अयूब उनके साथ रहते हैं। जरीना बेगम मूलरूप से बहराइच के नानपारा कस्बे की रहने वाली थीं। गाने में उनकी दिलचस्पी बचपन में आसपास के माहौल से हुई। उनके वालिद शहंशाह हुसैन नानपारा के कव्वाल थे। उनके पति तबला वादक थे। बावजूद घर में लड़कियों के गाने को कोई भी प्रोत्साहन नहीं मिलता था।  दामाद नावेद ने बताया कि अम्मी ने छिप-छिपाकर गाने का रियाज शुरू किया। ऐसे ही छिप-छिपकर वे रेडियो स्टेशन तक पहुंचीं। उनके हुनर को असल मुकाम तब मिला, जब वे बेगम अख्तर के नजदीक आईं।    बेगम अख्तर ने उनको बैठक गायिकी के आदाब और तौर-तरीके सिखाए। जरीना बेगम ने शौहर तबला-नवाज कुरबान अली के साथ देशभर की महफिलों में अपनी गायिकी के जौहर बिखेरे। आकाशवाणी ने भी उनको ए ग्रेड आर्टिस्ट के रूप में स्वीकार किया। अम्मी न तो पढ़ी-लिखी थीं और न ही इतनी तेज कि बदलते वक्त से कदम मिला सकें। यही वजह है कि उन्हें अपनी दुनिया में एक वक्त के लिए शोहरत तो खूब मिली लेकिन वो उनकी जिंदगी को खुशहाली नहीं बख्श पाई।  नौ वर्ष पहले लकवा के कारण उनकी तबीयत खराब होने लगी। इसके बाद एक साथ कई बीमारियों से लड़ रही हैं। उन्होंने बीमारी की हालत में दिल्ली के इंदिरा गांधी हॉल में गाया था और यही उनकी आखिरी परफॉर्मेंस थी।

बहराइच के नानपारा से जरीना बेगम 1972 में लखनऊ आ गई थी। बेगम अख्तर की शिष्या बीमारी के कारण जीवन के अंतिम दिनों में आर्थिक तंगी की जूझती रहीं। उनके इलाज का खर्च पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उठाया था। उन्होंने आज भी उनके अंतिम संस्कार के लिए 50 हजार रुपए की धनराशि भेजी थी।

गुजरे जमाने की मशहूर गायिका बेगम अख्तर की शिष्या जरीना बेगम का आज लंबी बीमारी के बाद आज लखनऊ में निधन हो गया। उनको गजल, ठुमरी और दादरी को एक नई पहचान देने के लिए आज भी याद किया जाता है। बीती सात अक्टूबर को बेगम अख्तर के 103वें जन्मदिवस के मौके पर गूगल ने डूडल बना कर उन्हें श्रृद्धांजलि दी। उनकी शिष्य और दरबारी-बैठक गायिकी की आखिरी फनकार जरीना बेगम पिछले काफी दिनों से लखनऊ के केके अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थीं।

जरीना बेगम के दामाद मोहम्मद नावेद ने सभी से गुहार लगाई, लेकिन सरकार की तरफ से कुछ भी नहीं किया गया। नावेद ने कहा कि मदद की गुहार सभी से लगाई थी लेकिन सरकार की तरफ से कुछ भी नहीं किया गया। आज सुबह मेरी सास की आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई। केके अस्पताल,डालीगंज के आईसीयू में जरीना बेगम भर्ती थीं। जहां करीब तीन महीने तक उनका इलाज चला।

दामाद नावेद ने बताया कि तीन वर्ष पहले प्रदेश सरकार ने जरीना बेगम को पांच लाख रुपये की धनराशि वाला बेगम अख्तर अवॉर्ड दिया था। वह भी इलाज में खर्च हो गया था। नावेद के मुताबिक उनके गुर्दे में दिक्कत थी। उनको पहले सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन सुधार होता न देख फिर से केके हॉस्पिटल में ले आये।

जरीना बेगम की बेटी रूबीना, दामाद नावेद और दिव्यांग बेटा अयूब उनके साथ रहते हैं। जरीना बेगम मूलरूप से बहराइच के नानपारा कस्बे की रहने वाली थीं। गाने में उनकी दिलचस्पी बचपन में आसपास के माहौल से हुई। उनके वालिद शहंशाह हुसैन नानपारा के कव्वाल थे। उनके पति तबला वादक थे। बावजूद घर में लड़कियों के गाने को कोई भी प्रोत्साहन नहीं मिलता था।

दामाद नावेद ने बताया कि अम्मी ने छिप-छिपाकर गाने का रियाज शुरू किया। ऐसे ही छिप-छिपकर वे रेडियो स्टेशन तक पहुंचीं। उनके हुनर को असल मुकाम तब मिला, जब वे बेगम अख्तर के नजदीक आईं।

बेगम अख्तर ने उनको बैठक गायिकी के आदाब और तौर-तरीके सिखाए। जरीना बेगम ने शौहर तबला-नवाज कुरबान अली के साथ देशभर की महफिलों में अपनी गायिकी के जौहर बिखेरे। आकाशवाणी ने भी उनको ए ग्रेड आर्टिस्ट के रूप में स्वीकार किया। अम्मी न तो पढ़ी-लिखी थीं और न ही इतनी तेज कि बदलते वक्त से कदम मिला सकें। यही वजह है कि उन्हें अपनी दुनिया में एक वक्त के लिए शोहरत तो खूब मिली लेकिन वो उनकी जिंदगी को खुशहाली नहीं बख्श पाई।

नौ वर्ष पहले लकवा के कारण उनकी तबीयत खराब होने लगी। इसके बाद एक साथ कई बीमारियों से लड़ रही हैं। उन्होंने बीमारी की हालत में दिल्ली के इंदिरा गांधी हॉल में गाया था और यही उनकी आखिरी परफॉर्मेंस थी।

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