महात्मा गांधी हत्या मामला: SC ने तुषार गांधी से पूछा किस अधिकार से बने पक्षकार

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के मामले में दोबारा जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर कोर्ट ने न्यायमित्र अमरेंदर सरन से दोबारा जांच के लिए डाली गई याचिका की कानूनी वैधता पर विचार करने को कहा है. इस पर सरन ने जवाब देने के लिए कोर्ट से चार हफ्ते का समय मांगा है.महात्मा गांधी हत्या मामला: SC ने तुषार गांधी से पूछा किस अधिकार से बने पक्षकारआधार कार्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने ममता को लगाई फटकार, दिया ये बड़ा बयान….

किस अधिकार से बने पक्षकार: सुप्रीम कोर्ट

हालांकि गांधी के परपोते तुषार गांधी ने याचिका का विरोध किया है. सोमवार को इस केस में पक्षकार बनने के लिए तुषार गांधी भी सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार बनने पहुंचे. कोर्ट ने तुषार से कहा कि आगे देखेंगे कि आपका अधिकार क्षेत्र क्या है? शीर्ष कोर्ट ने दोनों पक्षों से अपना अधिकार क्षेत्र स्पष्ट करने को कहा है.

6 अक्टूबर को हुई थी अमरेंदर सरन की नियुक्ति

इससे पहले सर्वोच्च कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि क्या महात्मा गांधी की हत्या के मामले में और जांच की जरूरत है, 6 अक्टूबर को याचिकाकर्ता द्वारा पेश सामग्री की जांच के लिए वरिष्ठ वकील ए. सरन को नियुक्त किया था.

न्यायमूर्ति एस.ए. बोबड़े के नेतृत्व वाली पीठ ने सरन को मुंबई निवासी आईटी पेशेवर पंकज चंद्रा फडनीस द्वारा पेश सामग्री की जांच करने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने हालांकि कहा कि प्रथमदृष्टया उन्हें नहीं लगता कि पेश की गई सामग्री जांच आगे बढ़ाने का आदेश देने के लिए पर्याप्त है.

याचिकाकर्ता अपने मामले पर बहस के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए. याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि गांधी की हत्या में तीन लोग शामिल थे और नाथूराम गोडसे सहित सिर्फ दो व्यक्तियों को मौत की सजा मिली. उन्होंने कहा कि इस मामले में मौत की सजा 15 नवंबर 1949 को दी गई थी और सर्वोच्च कोर्ट 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया, इसलिए गांधी की हत्या के मामले को सर्वोच्च कोर्ट ने नहीं देखा.

मूर्खतापूर्ण है याचिकाः तुषार गांधी

महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया में याचिका की सुनवाई को मूर्खतापूर्ण बताया है. उन्होंने कहा कि जब उन्हें इस याचिका के बारे में पता चला तो उनको बड़ी हैरानी हुई. गांधी के पड़पोते तुषार ने आगे सवाल किया कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पास कोई और काम नहीं है?

तुषार ने कहा, “एक तरफ तो कोर्ट काम के अत्यधिक बोझ का रोना रोता है और दूसरी तरफ ऐसी याचिकाओं की सुनवाई करता है. ऐसी याचिकाओं को पहले ही खारिज कर देना चाहिए.”

सुप्रीम कोर्ट नहीं करना चाहता था सुनवाई

उन्होंने कहा, “जब मुंबई हाईकोर्ट में याचिका की गई थी तो इसे तुरंत खारिज कर दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसा होना चाहिए था. मुझे पता चला है कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका की सुनवाई नहीं करना चाहता था, लेकिन काफी दबाव के बाद कोर्ट ने न्यायमित्र की नियुक्ति कर दी.”

तुषार ने आगे कहा, “यह एक षडयंत्र है. बापू की हत्या के बारे में गलत सूचना फैलाने की कोशिश की जा रही है. इनके निशाने पर कपूर आयोग की रिपोर्ट है. इस आयोग की रिपोर्ट से ही इन लोगों को दिक्कत है.” वहीं, कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “मैं खुश हूं कि अभी और सच्चाई सामने आएगी.” 

उर्दू में दर्ज FIR में है पूरी वारदात का जिक्र

30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या हुई थी, बापू की हत्या की एफआईआर उसी दिन यानी 30 जनवरी को दिल्ली के तुगलक रोड थाने में दर्ज की गई थी. एफआईआर उर्दू में लिखी गई थी जिसमें पूरी वारदात के बारे में बताया गया था.

दिल्ली के तुगलक रोड के रिकॉर्ड रूम में आज भी वो एफआईआर संभाल कर रखी गई है, एफआईआर को बाकायदा लेमिनेशन करवा कर रखा गया है, अगर कभी भी बापू की हत्या का मामला फिर से खुलता है और जांच नए सिरे से शुरू होती है तो इसी एफआईआर के आधार पर जांच शुरू की जाएगी.

गोडसे के अलावा किसी और ने चलाई थी गोली?

क्या महात्मा गांधी का कोई दूसरा हत्यारा भी था? वैसे पुलिस तो इस कहानी पर भरोसा करती है कि गांधी पर तीन गोलियां चलाई गई थीं, लेकिन क्या चौथी गोली भी थी जिसे नाथूराम गोडसे के अलावा किसी और ने चलाया था? ऐसे कई सवालों को लेकर उच्चतम न्यायालय में दायर एक याचिका पर 6 अक्टूबर को सुनवाई हुई.

अभिनव भारत ने दायर की है याचिका

आपको बता दें कि यह याचिका अभिनव भारत, मुंबई के शोधकर्ता और ट्रस्टी पंकज फडनिस ने फाइल की है. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में गांधी की मौत को इतिहास का सबसे बड़ा कवर-अप बताते हुए केस को दोबारा से खोलने की मांग की गई है.

याचिका में अनुरोध किया गया है कि नया जांच आयोग गठित करके गांधी की हत्या के पीछे की बड़ी साजिश का खुलासा किया जाए. याचिका में गांधी की हत्या की जांच के बारे में भी सवाल उठाए गए हैं जिसमें कहा गया कि क्या यह इतिहास में मामला ढकने की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है और क्या उनकी मौत के लिए विनायक दामोदर सावरकर को जिम्मेदार ठहराने का कोई आधार है या नहीं.

गांधी की हत्या के दोषियों को हुई थी फांसी

अभिनव भारत मुंबई के शोधार्थी और डाक्टर पंकज फडनिस की ओर से दायर याचिका में दावा किया गया कि वर्ष 1966 में गठित न्यायमूर्ति जे एल कपूर जांच आयोग साजिश का पता लगाने में पूरी तरह नाकाम रहा. यह साजिश राष्ट्रपिता की हत्या के साथ पूरी हुई.

गांधी की हत्या के दोषियों को 15 नवंबर 1949 को फांसी पर लटकाया गया था, जबकि सावरकर को सबूतों के अभाव में संदेह का लाभ दिया गया. सावरकर से प्रेरित होकर अभिनव भारत, मुंबई की स्थापना 2001 में हुई थी और इसने सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए काम करने का दावा किया था.

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