यात्रा से पहले बीमार हुए भगवान जगन्नाथ

ऐसा कहा जाता है अगर सच्चे मन से भगवान की आराधना की जाए तो वह अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते हैं. यही नहीं बल्कि मन में एक सच्चा विश्वास ही आपको भगवान से मिला सकता है. आज हम आपको एक ऐसा सच्चा विश्वास और प्रभु के प्रति अटूट प्रेम के बारे में बताने जा रहे हैं जहां भक्‍त अपने प्रभु को बीमार मानकर उनकी एक नन्हें बच्चे की तरह देखभाल करते हैंऐसा कहा जाता है अगर सच्चे मन से भगवान की आराधना की जाए तो वह अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करते हैं. यही नहीं बल्कि मन में एक सच्चा विश्वास ही आपको भगवान से मिला सकता है. आज हम आपको एक ऐसा सच्चा विश्वास और प्रभु के प्रति अटूट प्रेम के बारे में बताने जा रहे हैं जहां भक्‍त अपने प्रभु को बीमार मानकर उनकी एक नन्हें बच्चे की तरह देखभाल करते हैं.    यही नहीं बल्कि इस दौरान उन्हें खाने-पीने की ऐसी किसी चीज का भोग नहीं लगाया जाता है जिनसे उनकी सेहत खराब हो जाए. जी हाँ आप यह जानकार हैरान हो सकते हैं लेकिन उड़ीसा स्थित जगन्नाथ पुरी में मौजूद भगवन जगन्नाथ के दरबार में ऐसा किया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं तो इस दौरान उन्हें देसी वस्‍तुओं से बना काढ़ा पिलाया जाता है.    लगभग 15 दिन के उपचार के बाद भगवान जगन्‍नाथ स्‍वस्‍थ होते हैं तब तक उनकी हर रोज इसी तरह सेवा की जाती है. इसके अलावा बताया जाता है कि जब भगवान जगन्नाथ बीमार होते हैं तो इस दौरान मंदिर के पट भी बंद रहते हैं. दरअसल इसके पीछे का गहरा रहस्य यह है, पुराणों में बताया गया है कि जब राजा इंद्रदुयम्‍न अपने राज्य में भगवान की प्रतिमा का निर्माण करवा रहे थे तब शिल्‍पकार भगवान की अधूरी प्रतिमा छोड़कर चले गए थे.    इस दौरान राजा इंद्रदुयम्‍न बेहद दुखी हुए थे तब भगवान ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि वे चिंता न करें बालरूप में इसी आकार में पृथ्‍वीलोक पर विराजेंगे. इसके बाद भगवान ने राजा को ओदश दिया कि 108 घट के जल से उनका अभिषेक किया जाए और इस दौरान ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा थी. ख़ास बात यह है कि तब से लेकर आज भी यह अभिषेक ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा के दौरान किया जाता है.    जाहिर से बात है कि अगर किसी नन्हें बालक को यदि कुंए के ठंडे जल से स्‍नान कराया जाएगा तो बीमार पड़ ही जायेगा. यही वजह है कि प्रभु को बीमार मानकर ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा से अमावस्‍या तक उनकी एक नन्हें बालक की तरह देखभाल की जाती है. जानकारी के लिए बताना चाहेंगे कि इस साल ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा 27 जून को थी और तब से लेकर उनका इलाज चल रहा है. 14 जुलाई को यानिकि रथ यात्रा से ए‍क दिन पहले वह स्‍वस्‍थ होते हैं और इस दौरान बड़े ही धूम धाम से भव्य यात्रा निकाली जाती है..

यही नहीं बल्कि इस दौरान उन्हें खाने-पीने की ऐसी किसी चीज का भोग नहीं लगाया जाता है जिनसे उनकी सेहत खराब हो जाए. जी हाँ आप यह जानकार हैरान हो सकते हैं लेकिन उड़ीसा स्थित जगन्नाथ पुरी में मौजूद भगवन जगन्नाथ के दरबार में ऐसा किया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं तो इस दौरान उन्हें देसी वस्‍तुओं से बना काढ़ा पिलाया जाता है.

लगभग 15 दिन के उपचार के बाद भगवान जगन्‍नाथ स्‍वस्‍थ होते हैं तब तक उनकी हर रोज इसी तरह सेवा की जाती है. इसके अलावा बताया जाता है कि जब भगवान जगन्नाथ बीमार होते हैं तो इस दौरान मंदिर के पट भी बंद रहते हैं. दरअसल इसके पीछे का गहरा रहस्य यह है, पुराणों में बताया गया है कि जब राजा इंद्रदुयम्‍न अपने राज्य में भगवान की प्रतिमा का निर्माण करवा रहे थे तब शिल्‍पकार भगवान की अधूरी प्रतिमा छोड़कर चले गए थे.

इस दौरान राजा इंद्रदुयम्‍न बेहद दुखी हुए थे तब भगवान ने उन्हें दर्शन देकर कहा कि वे चिंता न करें बालरूप में इसी आकार में पृथ्‍वीलोक पर विराजेंगे. इसके बाद भगवान ने राजा को ओदश दिया कि 108 घट के जल से उनका अभिषेक किया जाए और इस दौरान ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा थी. ख़ास बात यह है कि तब से लेकर आज भी यह अभिषेक ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा के दौरान किया जाता है.

जाहिर से बात है कि अगर किसी नन्हें बालक को यदि कुंए के ठंडे जल से स्‍नान कराया जाएगा तो बीमार पड़ ही जायेगा. यही वजह है कि प्रभु को बीमार मानकर ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा से अमावस्‍या तक उनकी एक नन्हें बालक की तरह देखभाल की जाती है. जानकारी के लिए बताना चाहेंगे कि इस साल ज्‍येष्‍ठ मास की पूर्णिमा 27 जून को थी और तब से लेकर उनका इलाज चल रहा है. 14 जुलाई को यानिकि रथ यात्रा से ए‍क दिन पहले वह स्‍वस्‍थ होते हैं और इस दौरान बड़े ही धूम धाम से भव्य यात्रा निकाली जाती है.

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