लोकतंत्र का काला द‍िन: कहीं कर्नाटक विधानसभा का हाल यूपी जैसा न हो जाए

देशभर में कर्नाटक विधानसभा में येदियुरप्पा सरकार के फ्लोर टेस्ट का जिक्र है. आखिर इसी फ्लोर टेस्ट के जरिए राज्य सरकार का भविष्य तय होना है. इसी बीच उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा का जिक्र होना बेहद जरूरी है. उत्तर प्रदेश विधानसभा के साथ एक काला अध्‍याय जुड़ा हुआ है और आशंका है आज कर्नाटक विधानसभा में ऐसी स्‍थिति बन सकती है.देशभर में कर्नाटक विधानसभा में येदियुरप्पा सरकार के फ्लोर टेस्ट का जिक्र है. आखिर इसी फ्लोर टेस्ट के जरिए राज्य सरकार का भविष्य तय होना है. इसी बीच उत्‍तर प्रदेश के विधानसभा का जिक्र होना बेहद जरूरी है. उत्तर प्रदेश विधानसभा के साथ एक काला अध्‍याय जुड़ा हुआ है और आशंका है आज कर्नाटक विधानसभा में ऐसी स्‍थिति बन सकती है.  यूपी की 13वीं विधानसभा अबतक सबसे विवादित मानी जाती है. ये विधानसभा शुरुआत से ही विवादों में घिरी रही, राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक बनी और इसमें विधायकों की खुले-आम ख़रीद-फ़रोख़्त और दल-बदल बार-बार देखे गए.  इस विधानसभा के दौरान यूपी ने चार सीएम देखे. वहीं एक मौक़ा ऐसा भी आया जब ही एक ही समय मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार विधानसभा में एक साथ बैठे रहे और आख़िरकार शक्ति प्रदर्शन के बाद ही तय हुआ कि असली मुख्यमंत्री कौन है. हालांकि सबसे बड़ा काला अध्‍याय सदन में मारपीट होना था. इस घटना का वीडियो भी मौजूद है और आज तक लोग लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने वाली घटना के रूप में जिक्र करते हैं.  लोकतंत्र का काला दिन  21 अक्‍टूबर 1997 भारत के लोकतंत्र के काले दिन के रूप में याद रखा जाएगा. उस दिन विधानसभा के भीतर विधायकों के बीच माइकों की बौछार, लात-घूंसे, जूते-चप्पल सब चले. विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया था.     उन्हें 222 विधायकों का समर्थन मिला जो भाजपा की मूल संख्या से 46 अधिक था. कांग्रेस नेता प्रमोत तिवारी ने सदन में वोटिंग की मांग की. कांग्रेस के साथ बीएसपी विधायक भी हंगामा करने लगे. इस बीच एक विधायक ने स्‍पीकर पर माइक फेंक द‍िया. इसके बाद विधायकों में हाथापाई होने लगी. 40 से अध‍िक विधायकों को गंभीर चोटें आईं.  कालेदिन से पहले ये हुआ  13वीं विधानसभा के लिए 17 अक्तूबर 1996 को नतीजे आए. किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं मिला था. 425 सीटों की विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी 173 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनी. जबकि समाजवादी पार्टी को 108, बहुजन समाज पार्टी को 66 और कांग्रेस को 33 सीटें मिलीं. तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राष्ट्रपति शासन को छह महीने बढ़ाने के लिए केंद्र को सिफ़ारिश भेजी. हालांकि राष्ट्रपति शासन का पहले ही एक साल पूरा हो चुका था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए राष्ट्रपति शासन छह महीने बढ़ाने के केंद्र के फ़ैसले को मंज़ूरी दे दी.  इसके बाद हालात बिगड़ते चले गए. शुरुआत हुई एक बेमेल राजनीतिक गठबंधन से. बसपा और बीजेपी दोनों पार्टियों ने छह-छह महीने राज्य का शासन चलाने का फ़ैसला किया. इस तालमेल से पहले 17 अक्‍टूबर 1995 में भाजपा ने ही बसपा सरकार से समर्थन वापस लिया था, जिसकी वजह से राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. पहले छह महीनों के लिए 21 मार्च 1997 को बसपा की मायवती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं.     विधानसभा अध्यक्ष के मुद्दे पर दोनों पार्टियों में मतभेद हुए. बाद में बीजेपी के केसरीनाथ त्रिपाठी को विधानसभा अध्यक्ष बनाए जाने की मंज़ूरी बसपा ने दे दी. मायावती के छह महीने पूरे होने के बाद बीजेपी के कल्याण सिंह 21 सितंबर 1997 को मुख्यमंत्री बने. मायावती सरकार के अधिकतर फ़ैसले बदले गए और दोनों पार्टियों के बीच मतभेद खुल कर सामने आ गए.  सिर्फ़ एक महीने के भीतर ही मायावती ने 19 अक्‍टूबर 1997 को कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया. राज्यपाल रोमेश भंडारी ने दो दिन के भीतर ही यानी 21 अक्‍टूबर को कल्याण सिंह को अपना बहुमत साबित करने का आदेश दिया.  बसपा, कांग्रेस और जनता दल में भारी टूट हुई और इन पार्टियों के कई विधायक पाला बदलकर बीजेपी के साथ हो गए.  काले दिन के बाद क्‍या हुआ  विधानसभा में हुई हिंसा के बाद राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश कर दी. 22 अक्तूबर को केंद्र ने इस सिफ़ारिश को राष्ट्रपति के आर नारायणन को भेज दिया. लेकिन राष्ट्रपति नारायणन ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश को मानने से इनकार कर दिया और दोबारा विचार के लिए इसे केंद्र सरकार के पास भेज दिया. केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश को दोबारा राष्ट्रपति के पास न भेजने का फ़ैसला किया.  दो मुख्यमंत्री  इसके बाद कल्याण सिंह ने दूसरी पार्टियों से आए हर विधायक को मंत्री बना दिया. देश के इतिहास में पहली बार 93 मंत्रियों के मंत्री परिषद को शपथ दिलाई गई. विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी ने सभी दलबदलूओं विधायकों को हरी झंडी दे दी. इस फ़ैसले की बहुत आलोचना हुई. 21 फ़रवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सीएम कल्याण सिंह को बर्ख़ास्त कर जगदंबिका पाल को रात में साढ़े दस बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. हाईकोर्ट ने अगले दिन यानी 22 फ़रवरी को राज्यपाल के आदेश पर रोक लगा दी और कल्याण सिंह सरकार को बहाल कर दिया.  उस दिन राज्य सचिवालय में अजीब नज़ारा देखने को मिला क्योंकि वहां दो-दो मुख्यमंत्री बैठे हुए थे. जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज़ हो गए थे, लेकिन जब उन्हें हाई कोर्ट का आदेश लिखित में मिला तो वे कल्याण सिंह के लिए कुर्सी छोड़कर चले गए. बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 26 फ़रवरी को एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन हुआ. इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई.  कल्‍याण सिंह के हाथ से भी गई सत्‍ता  1999 में बीजेपी से कल्‍याण सिंह की भी छुट्टी हो गई. उसके बाद बीजेपी के रामप्रकाश गुप्ता को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपी. वे 12 नवंबर 1999 को राज्य के मुख्यमंत्री बने. हालांकि वह बेहतर सीएम साबित नहीं हो सके. गुप्‍ता के इस्‍तीफे के बाद 28 अक्‍टूबर 2000 को राजनाथ सिंह ने कुर्सी संभाली. वहीं 14वें व‍िधानसभा चुनाव से पहले मार्च 2002 में फ‍िर राष्‍ट्रपति शासन लगा था. बीजेपी और रालोद के समर्थन से मई 2002 में मायावती सीएम के रूप में फ‍िर से वापस आई.

यूपी की 13वीं विधानसभा अबतक सबसे विवादित मानी जाती है. ये विधानसभा शुरुआत से ही विवादों में घिरी रही, राजनीतिक अस्थिरता का प्रतीक बनी और इसमें विधायकों की खुले-आम ख़रीद-फ़रोख़्त और दल-बदल बार-बार देखे गए.

इस विधानसभा के दौरान यूपी ने चार सीएम देखे. वहीं एक मौक़ा ऐसा भी आया जब ही एक ही समय मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार विधानसभा में एक साथ बैठे रहे और आख़िरकार शक्ति प्रदर्शन के बाद ही तय हुआ कि असली मुख्यमंत्री कौन है. हालांकि सबसे बड़ा काला अध्‍याय सदन में मारपीट होना था. इस घटना का वीडियो भी मौजूद है और आज तक लोग लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने वाली घटना के रूप में जिक्र करते हैं.

लोकतंत्र का काला दिन

21 अक्‍टूबर 1997 भारत के लोकतंत्र के काले दिन के रूप में याद रखा जाएगा. उस दिन विधानसभा के भीतर विधायकों के बीच माइकों की बौछार, लात-घूंसे, जूते-चप्पल सब चले. विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया था.

उन्हें 222 विधायकों का समर्थन मिला जो भाजपा की मूल संख्या से 46 अधिक था. कांग्रेस नेता प्रमोत तिवारी ने सदन में वोटिंग की मांग की. कांग्रेस के साथ बीएसपी विधायक भी हंगामा करने लगे. इस बीच एक विधायक ने स्‍पीकर पर माइक फेंक द‍िया. इसके बाद विधायकों में हाथापाई होने लगी. 40 से अध‍िक विधायकों को गंभीर चोटें आईं.

कालेदिन से पहले ये हुआ

13वीं विधानसभा के लिए 17 अक्तूबर 1996 को नतीजे आए. किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं मिला था. 425 सीटों की विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी 173 सीटें हासिल कर सबसे बड़ी पार्टी बनी. जबकि समाजवादी पार्टी को 108, बहुजन समाज पार्टी को 66 और कांग्रेस को 33 सीटें मिलीं. तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राष्ट्रपति शासन को छह महीने बढ़ाने के लिए केंद्र को सिफ़ारिश भेजी. हालांकि राष्ट्रपति शासन का पहले ही एक साल पूरा हो चुका था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए राष्ट्रपति शासन छह महीने बढ़ाने के केंद्र के फ़ैसले को मंज़ूरी दे दी.

इसके बाद हालात बिगड़ते चले गए. शुरुआत हुई एक बेमेल राजनीतिक गठबंधन से. बसपा और बीजेपी दोनों पार्टियों ने छह-छह महीने राज्य का शासन चलाने का फ़ैसला किया. इस तालमेल से पहले 17 अक्‍टूबर 1995 में भाजपा ने ही बसपा सरकार से समर्थन वापस लिया था, जिसकी वजह से राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. पहले छह महीनों के लिए 21 मार्च 1997 को बसपा की मायवती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं

विधानसभा अध्यक्ष के मुद्दे पर दोनों पार्टियों में मतभेद हुए. बाद में बीजेपी के केसरीनाथ त्रिपाठी को विधानसभा अध्यक्ष बनाए जाने की मंज़ूरी बसपा ने दे दी. मायावती के छह महीने पूरे होने के बाद बीजेपी के कल्याण सिंह 21 सितंबर 1997 को मुख्यमंत्री बने. मायावती सरकार के अधिकतर फ़ैसले बदले गए और दोनों पार्टियों के बीच मतभेद खुल कर सामने आ गए.

सिर्फ़ एक महीने के भीतर ही मायावती ने 19 अक्‍टूबर 1997 को कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया. राज्यपाल रोमेश भंडारी ने दो दिन के भीतर ही यानी 21 अक्‍टूबर को कल्याण सिंह को अपना बहुमत साबित करने का आदेश दिया.  बसपा, कांग्रेस और जनता दल में भारी टूट हुई और इन पार्टियों के कई विधायक पाला बदलकर बीजेपी के साथ हो गए.

काले दिन के बाद क्‍या हुआ

विधानसभा में हुई हिंसा के बाद राज्यपाल रोमेश भंडारी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश कर दी. 22 अक्तूबर को केंद्र ने इस सिफ़ारिश को राष्ट्रपति के आर नारायणन को भेज दिया. लेकिन राष्ट्रपति नारायणन ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश को मानने से इनकार कर दिया और दोबारा विचार के लिए इसे केंद्र सरकार के पास भेज दिया. केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश को दोबारा राष्ट्रपति के पास न भेजने का फ़ैसला किया.

दो मुख्यमंत्री

इसके बाद कल्याण सिंह ने दूसरी पार्टियों से आए हर विधायक को मंत्री बना दिया. देश के इतिहास में पहली बार 93 मंत्रियों के मंत्री परिषद को शपथ दिलाई गई. विधानसभा अध्यक्ष केसरीनाथ त्रिपाठी ने सभी दलबदलूओं विधायकों को हरी झंडी दे दी. इस फ़ैसले की बहुत आलोचना हुई. 21 फ़रवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने सीएम कल्याण सिंह को बर्ख़ास्त कर जगदंबिका पाल को रात में साढ़े दस बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. हाईकोर्ट ने अगले दिन यानी 22 फ़रवरी को राज्यपाल के आदेश पर रोक लगा दी और कल्याण सिंह सरकार को बहाल कर दिया.

उस दिन राज्य सचिवालय में अजीब नज़ारा देखने को मिला क्योंकि वहां दो-दो मुख्यमंत्री बैठे हुए थे. जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज़ हो गए थे, लेकिन जब उन्हें हाई कोर्ट का आदेश लिखित में मिला तो वे कल्याण सिंह के लिए कुर्सी छोड़कर चले गए. बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 26 फ़रवरी को एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन हुआ. इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई.

कल्‍याण सिंह के हाथ से भी गई सत्‍ता

1999 में बीजेपी से कल्‍याण सिंह की भी छुट्टी हो गई. उसके बाद बीजेपी के रामप्रकाश गुप्ता को उत्तर प्रदेश की बागडोर सौंपी. वे 12 नवंबर 1999 को राज्य के मुख्यमंत्री बने. हालांकि वह बेहतर सीएम साबित नहीं हो सके. गुप्‍ता के इस्‍तीफे के बाद 28 अक्‍टूबर 2000 को राजनाथ सिंह ने कुर्सी संभाली. वहीं 14वें व‍िधानसभा चुनाव से पहले मार्च 2002 में फ‍िर राष्‍ट्रपति शासन लगा था. बीजेपी और रालोद के समर्थन से मई 2002 में मायावती सीएम के रूप में फ‍िर से वापस आई.

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