सपा के गढ़ पर भारी पड़ सकती है परिवार की ‘महाभारत’

यूपी विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण के लिए 12 जिलों की 69 सीटों पर मंगलवार से नामांकन दाखिल होने शुरू हो जाएंगे। सपा का गढ़ समझे जाने वाले इन जिलों को परिवार के विवाद की छाया से बचाना सबसे बड़ी चुनौती है।
सपा के गढ़ पर भारी पड़ सकती है परिवार की 'महाभारत'
 
2012 में सपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में तीसरे चरण के जिलों का सबसे बड़ा योगदान था। इन जिलों में सपा को 80 फीसदी सफलता मिली थी। कुल 69 सीटों पर सपा के उम्मीदवारों ने 55 पर जीत हासिल की थी। कई जिलों में सपा को इकतरफा कामयाबी मिली थी। बसपा को 6, भाजपा को 5 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं।

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तीसरे चरण में 19 फरवरी को जिन जिलों में वोट पड़ेंगे, उनमें सपा और यादव परिवार के गढ़ इटावा, मैनपुरी, औरैया, फर्रूखाबाद, कन्नौज, हरदोई, कानपुर देहात व कानपुर नगर, उन्नाव, लखनऊ, बाराबंकी और सीतापुर जिले शामिल हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, औरैया और बाराबंकी में तो दूसरे दलों का खाता भी नहीं खुला सका था। फर्रुखाबाद सीट से निर्दलीय विजय सिंह विजयी रहे थे।

उन्नाव में सपा विधायक दीपक कुमार के निधन के बाद हुए उपचुनाव में भाजपा के पंकज गुप्ता चुनाव जीते थे। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे और मेट्रो जैसी बड़ी परियोजनाओं से तीसरे चरण के कई जिले लाभान्वित होंगे। देखना होगा कि इसका असर चुनाव पर कितना पड़ेगा।

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मुलायम का रुख प्रभावित करेगा चुनावी नतीजे

तीसरे चरण के जिलों में समाजवादी पार्टी की प्रतिष्ठा दांव है। परिवार के विवाद, मुलायम सिंह को अध्यक्ष पद से हटाने, शिवपाल सिंह को पार्टी व सरकार से किनारे करने जैसे मुद्दों का असर तीसरे चरण पर पड़ सकता है।
दरअसल, मुलायम सिंह परिवार के पैतृक जिला और गांव में इसी चरण में मतदान होना है। मध्य यूपी के कई जिलों में मुलायम सिंह चुनाव प्रचार के लिए गए तो अलग स्थिति होगी और नहीं गए तो अलग स्थिति होगी।तीसरे चरण में परिवार के विवाद की छाया पड़ी तो सपा को घाटा उठाना पड़ सकता है। शिवपाल यादव इसी चरण की जसवंत नगर सीट से चुनकर आते हैं। इटावा और आसपास के यादवों के गढ़ समझे जाने वाले जिलों में मुलायम का काफी सम्मान है। उनका रुख चुनावी संभावना पर असर डालेगा।

तीसरे चरण में गठबंधन की होगी परीक्षा

तीसरे चरण के जिलों में सपा-कांग्रेस गठबंधन की भी परीक्षा होगी। अधिकतर जिलों में यादव मतदाता अच्छी तादाद में हैं। कांग्रेस इन जिलों में अपेक्षाकृत कमजोर है। देखना होगा कि दोनों दलों का वोट बैंक जमीनी स्तर पर एक-दूसरे को ट्रांसफर होता है या नहीं।
हालांकि सपा के गढ़ समझे जाने वाले इटावा, मैनपुरी जिलों समेत कई जगह कांग्रेस प्रत्याशी नहीं रहेंगे लेकिन कानपुर में कांग्रेस तीन से चार सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।लखनऊ, कानपुर को छोड़ कहीं नहीं खुला था भाजपा-कांग्रेस का खाता:
तीसरे चरण के जिलों में भाजपा और कांग्रेस की की स्थिति कमजोर रही थी। कानपुर और लखनऊ को छोड़कर किसी भी जिले में इन दोनों दलों का खाता नहीं खुल सका था।

कांग्रेस के अजय कपूर कानपुर और रीता बहुगुणा जोशी लखनऊ से चुनाव जीती थीं। रीता अब भाजपा में हैं। इसी तरह भाजपा को कानपुर में 4 और लखनऊ में एक सीट मिली थी। लखनऊ से भाजपा के कलराज मिश्र जीते थे। उनके सांसद चुने जाने पर हुए उपचुनाव में गोपालजी टंडन विधायक बने थे।

सपा के कई विधायक भाजपा में

वर्ष 2012 में उन्नाव में सपा ने 6 में से 5 विधानसभा सीट जीती थीं। एक सीट बसपा को मिली थी। उन्नाव की भगवंतनगर सीट से सपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर भाजपा में चले गए हैं। भाजपा ने उन्हें बांगरमऊ से प्रत्याशी बनाया है। सपा ने इटावा से रघुराज शाक्य, बिधुना से प्रमोद कुमार गुुप्ता के टिकट काट दिए हैं। इन विधायकों का रुख भी चुनावी नतीजे प्रभावित करेगा।
इन जिलों में तीसरे चरण में पड़ेंगे वोट:
जिला– सीट
फर्रुखाबाद– 4
हरदाई– 8
कन्नौज– 3
मैनपुरी– 4
इटावा– 3
औरैया– 3कानपुर देहात– 4
कानपुर नगर– 10
उन्नाव– 6
लखनऊ– 9
बाराबंकी में– 6
सीतापुर– 9

2012 में पार्टियों की स्थिति
दल–सीट
सपा–55
बसपा–6
भाजपा–5
कांग्रेस–2
निर्दलीय–1

 

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