सोनिया की डिनर पॉलिटिक्स: क्या इसलिए नहीं आना चाहते ममता-पवार?

कांग्रेस अध्यक्ष पद राहुल को सौंप चुकीं सोनिया गांधी अब भी मोदी के खिलाफ गठबंधन बनाने के लिए विपक्ष की धुरी बनने की जुगत लगा रही हैं. इसी के मद्देनजर उन्होंने मंगलवार को अपने घर पर तमाम विपक्षी पार्टी के नेताओं को डिनर पर बुलाया है.सोनिया की डिनर पॉलिटिक्स: क्या इसलिए नहीं आना चाहते ममता-पवार?

बतौर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया की कोशिश 2019 के लिए विपक्ष को लामबंद करने की है. इस डिनर से पहले बैठकों में आने वाले 18 दल के नेता या उनके नुमाइंदे शामिल होंगे, लेकिन सपा प्रमुख अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी और एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अब तक शामिल होने पर सहमति नहीं दी है.

हालांकि, सोनिया के मैनेजर अभी भी कोशिश में हैं कि कम से कम पवार और ममता ही शिरकत करें, लेकिन अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिली है. हालांकि इन सभी ने अपने नुमाइंदे भेजने पर सहमति दे दी है.

एक तीर से दो निशाना

इस डिनर डिप्लोमेसी के जरिये सोनिया एक तीर से दो निशाना साधना चाहती हैं. विपक्षी नेताओं को डिनर पर बुलाकर वह ये साबित करना चाहती हैं कि मोदी के विकल्प के तौर पर बनने वाले गठजोड़ का नेतृत्व कांग्रेस के पास ही होगा.

एकजुट होना समय की मांग

सोनिया गांधी का एक बड़ा संदेश ये है कि वह ममता और पवार की तीसरे मोर्चे की अगुवाई की कोशिश को तवज्जो नहीं देतीं. ऐसे में खुद ममता और शरद पवार का डिनर से अब तक दूर रहना कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाला है. हालांकि कांग्रेस मानती है कि मोदी के खिलाफ सबको एकजुट होना ही पड़ेगा और ये पूरे विपक्ष की ज़िम्मेदारी है. इस मुद्दे पर कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने कहा, वक़्त का तकाजा है कि सभी साथ आएं, आज तीसरे-चौथे मोर्चे के कोई मतलब नहीं हैं. 

वैसे कांग्रेस ये समझती है कि राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर पवार और ममता जैसे नेताओं को झिझक है. इसीलिए सोनिया 2019 तक गठबंधन की कमान अपने हाथ में रखना चाहती हैं. आखिर ये दोनों गाहे बगाहे मोदी विरोध के अगुआ बनने की सियासत करते रहे हैं.

ममता की अलग राह

यही वह बात है जो कांग्रेस को रास नहीं आती. ममता ने तीसरे मोर्चे के विकल्प तलाशने के लिए तेलंगाना के सीएम केसीआर को फोन किया था. टीडीपी और टीआरएस ने कांग्रेस की बैकडोर से की गई कोशिशों के बावजूद भोज में आने से फिलहाल इनकार कर दिया है. वहीं बात अगर मराठा क्षत्रप की करें तो कई मौके आए जब पवार ने कांग्रेस को झटका देने में कोताही नहीं बरती.

जारी रहेगी कोशिश

ऐसे में 2019 के लिए मोदी विरोधी गठबंधन की तस्वीर सियासी हिचकोले तो खाती ही रहेगी, लेकिन इसके चलते पार्टी अपनी कोशिशों में कमी नहीं रखना चाहती. आखिर कांग्रेस को भी अहसास है कि आने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि उसके झंडे के नीचे सभी आते हैं या नहीं.

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