4 साल में फीकी पड़ी मोदी लहर? जानिए क्या कहते हैं 2014 के बाद 19 उपचुनावों के नतीजे

साल 2014 का लोकसभा चुनाव ‘मोदी लहर’ के नाम रहा और भारतीय जनता पार्टी ने अप्रत्याशित बहुमत के साथ केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाई. लेकिन 2014 के बाद देशभर में लोकसभा के लिए कराए गए 19 उपचुनावों के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. सवाल ये कि क्या मोदी लहर दिन ब दिन कमजोर पड़ रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी कई सीटें हैं जिनमें 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी जीती थी लेकिन उपचुनावों में यहां से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा.4 साल में फीकी पड़ी मोदी लहर? जानिए क्या कहते हैं 2014 के बाद 19 उपचुनावों के नतीजे

2014 में उपचुनाव (मैनपुरी और वडोदरा)

आम चुनावों के नतीजे आने के तुरंत बाद मैनपुरी और वडोदरा लोकसभा सीटों के लिए सितंबर 2014 में उपचुनाव कराए गए. ये दोनों सीटें क्रमशः मुलायम सिंह यादव और नरेंद्र मोदी द्वारा खाली की गईं. मैनपुरी से समाजवादी पार्टी के तेज प्रताप यादव विजयी रहे जबकि वडोदरा में बीजेपी की रंजन बेन बड़े अंतर के साथ पार्टी को जीत दिलाने में सफल रहीं.

2015 में उपचुनाव (वारंगल, बनगांव और कृष्णागंज)

साल 2015 में तेलंगाना के वारंगल और पश्चिम बंगाल के बनगांव और कृष्णागंज लोकसभा सीट पर उपचुनाव कराया गया. वारंगल की सीट कादियान श्रीहरि के टीआरएस सरकार में डिप्टी सीएम बनने से खाली हुई तो बनगांव और कृष्णागंज की सीट सदस्यों के निधन से खाली हुई. उपचुनाव में वारंगल की सीट पर टीआरएस के दयाकार पुसुनूरी जबकि पश्चिम बंगाल में दोनों सीटों पर टीएमसी उम्मीदवार ममता ठाकुर और सत्यजीत विश्वास विजयी रहे.

2016 में उपचुनाव (तुमलुक, कूचबिहार, शहडोल और लखीमपुर)

साल 2016 में चार लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए. कूचविहार और शहडोल की सीट सदस्यों के निधन के बाद खाली हुईं जहां क्रमशः तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी अपने-अपने उम्मीदवार को जीत दिलाने में सफल रहीं. इसके अलावा तुमलुक में भी तृणमूल कांग्रेस के लिए उपचुनाव पूरी तरह से एक तरफा रहा तो असम के लखीमपुर की सीट सर्वानंद सोनोवाल के मुख्यमंत्री बनाए जाने से खाली हुई और बीजेपी ने आसानी से ये सीट बचाने में सफलता पाई. 

2017 में उपचुनाव (गुरुदासपुर, श्रीनगर और अमृतसर)

साल 2017 में हुए लोकसभा उपचुनाव बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती लेकर आए. पार्टी को फिल्म अभिनेता विनोद खन्ना के निधन के बाद गुरुदासपुर की सीट से हाथ धोना पड़ा. इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी को कांग्रेस के सुनील जाखड़ ने 1 लाख 93 हजार के रिकॉर्ड मतों से हरा दिया. वहीं बीजेपी को पंजाब की अमृतसर सीट पर मार्च 2017 में हुए उपचुनाव में एक बार फिर कांग्रेस के हाथ मुंह की खानी पड़ी. गौरतलब है कि 2004 और 2009 के आम चुनावों में यह सीट बीजेपी के नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस प्रत्याशी को बड़े अंतर के साथ हराकर जीती थी. लेकिन 2014 में यहां से बीजेपी ने अरुण जेटली को खड़ा किया जिन्हें कांग्रेस के दिग्गज कैप्टन अमरिंदर सिंह ने हरा दिया. उपचुनावों में कांग्रेस के गुरजीत सिंह आहूजा ने बीजेपी के राजिंदर सिंह चिन्ना को करारी हार दी. श्रीनगर सीट पीडीपी के पास थी लेकिन उसके सांसद द्वारा इस्तीफा देने के बाद हुए उपचुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के साझा उम्मीदवार फारूक अब्दुल्ला विजयी रहे.

2018 में उपचुनाव (अजमेर, अलवर, उलबेरिया, अररिया, गोरखपुर और फूलपुर)

साल 2018 उपचुनावों के जरिए राजनीतिक उलटफेर के लिए बेहद खास रहा. इस साल दो चरणों में देशभर में 6 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव कराए गए. पहले चरण में अजमेर, अलवर और उलबेरिया तो दूसरे चरण में अररिया, गोरखपुर और फूलपुर में चुनाव हुए. पहले चरण में राजस्थान की दो सीट अजमेर और अलवर जहां बीजेपी सांसद सांवर लाल जाट और महंत चंद नाथ के निधन के बाद उपचुनाव कराए गए. बीजेपी के दोनों उम्मीदवारों को यहां कांग्रेस के रघु शर्मा और डॉ करण सिंह यादव के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा. गौरतलब है कि इन दोनों लोकसभा सीटों पर कुल 8-8 विधानसभा सीटें हैं और नतीजों की खास बात यह रही कि सभी विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी बीजेपी से आगे रहे.

वहीं अंतिम चरण में उत्तर प्रदेश के फूलपुर और गोरखपुर की हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीट पर उपचुनाव कराए गए. फूलपुर की सीट बीजेपी नेता केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने और गोरखपुर योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर खाली हुई. इन दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार जीते. वहीं बिहार की अररिया लोकसभा सीट पर भी बीजेपी को आरजेडी के उम्मीदवार के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा. लिहाजा, चार साल के दौरान देश में हुए मध्यावधि चुनावों के नतीजों से साफ है कि देश में मोदी लहर 2014 के मुकाबले कमजोर पड़ी है.

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