CAG की रिपोर्ट- फसल बीमा योजना में कई खामियां

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी नई रिपोर्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ में कई खामियों को उजागर किया है. उन्होंने कहा कि राज्यों द्वारा प्रभावित किसानों को बीमा राशि मुहैया कराने में की जा रही देरी के चलते किसानों को समय से वित्तीय मदद प्रदान करने का लक्ष्य बाधित हुआ है.

CAG की रिपोर्ट- फसल बीमा योजना में कई खामियां

संसद में शुक्रवार को पेश की गई कैग की रिपोर्ट में फसल बीमा योजना के तहत कई कमियों के बारे में बताया. इसमें बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों द्वारा किसानों के खातों में बीमा राशि जमा करने अनियमितता सहित कई और खामियों का उल्लेख किया गया है. साथ ही राज्य सरकारों को इस संबंध में उनके लिए आवंटित धनराशि समय पर देने के लिए एक प्रणाली विकसित करने की सिफारिश भी की गई है.

कैग का यह भी कहना है कि कृषि बीमा कंपनी (एआईसी) निजी कंपनियों को धनराशि देने से पहले उनके दावों के सत्यापन में तत्परता दिखाने में असफल रहा है.

बुआई के क्षेत्रफल और बीमित क्षेत्रफल से जुड़े आकड़ों में विसंगति को रेखांकित करते हुए सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, “राज्य सरकारों द्वारा इस संदर्भ में एआईसी को मुहैया कराए गए आंकड़ों की सत्यता को सत्यापित नहीं किया जा सका है. केंद्र सरकार ने पिछले साल खरीफ की फसल की बुआई के दौरान पीएमबीएफवाई योजना शुरू की थी और पिछली योजना में सुधार कर इसे मौसम आधारित फसल बीमा योजना का रूप दिया था.

पीएमबीएफआई के तहत किसानों को खरीफ फसलों के लिए बीमा राशि का सिर्फ दो फीसदी, रबी फसल के लिए बीमा राशि का सिर्फ 1.5 फीसदी और बागवानी तथा नकदी फसलों के लिए बीमा राशि का सिर्फ पांच फीसदी देना होता है, जबकि शेष राशि केंद्र सरकार और राज्य सरकार बराबर मात्रा में वहन करती है.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जितने किसानों पर सर्वेक्षण किया गया, उनमें से दो तिहाई (66.66 फीसदी) किसानों को इस योजना की जानकारी ही नहीं थी. बता दें कि योजना के तहत लाभान्वित किसानों की संख्या बेहद कम पाई गई, जबकि ऋण न लेने वाले किसानों को नजरअंदाज किया गया.

 कैग ने योजना की निगरानी और योजना के क्रियान्वयन की निगरानी, नियमित मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार करने तथा राज्य स्तरीय तथा जिला स्तरीय समितियों को बांटे गए कार्यो के संपादन के लिए स्वतंत्र एजेंसी के गठन में असफल रहने के लिए भी केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की आलोचना की है. साथ ही कैग की रिपोर्ट में कहा गया कि राज्य सरकारों द्वारा फसली जमीन से संबंधित आंकड़े जारी करने और वित्तीय एजेंसियों द्वारा दावों का निपटारा करने में देरी की बात सामने आई है.

कैग रिपर्ट में यह भी कहा है कि  सरकारों को ऋण देने वाले बैंकों , वित्तीय संस्थानों और बीमा एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली सूचनाओं पर निर्भर रहना होता है, क्योंकि योजना में बीमित किसानों का डाटाबेस तैयार करने का प्रावधान ही नहीं रखा गया है.

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