CAG रिपोर्ट ने यूपी में सड़क निर्माण में उजागर किया भ्रष्टाचार का खेल…

सपा सरकार में सड़कों के निर्माण की आडिट में कैग (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) ने अनियमितताओं के कई उदाहरण सामने रखे हैं। इनमें अनुबंध से कई गुना भुगतान और छद्म कंपनियों के प्रकरण भी हैं। रिपोर्ट में ठेकेदारों और इंजीनियरों के बीच हुए कई अनुबंधों को परस्पर गठजोड़ की संज्ञा दी है और उनमें हुई बंदरबांट की ओर इशारा किया है। इसके अलावा वित्तीय गड़बडिय़ों का जिक्र है।CAG रिपोर्ट ने यूपी में सड़क निर्माण में उजागर किया भ्रष्टाचार का खेल...अभी- अभी: समाजवादी पार्टी को लगे दो बड़े झटके, दो एमएलसी ने दिया इस्तीफा

कैग आडिट में बस्ती में एक ऐसे मामले का पर्दाफाश हुआ, जिसमें ठेकेदार से एक काम का अनुबंध 97663 रुपये में हुआ लेकिन, उसे 14.07 लाख का भुगतान किया गया। इस प्रकरण में विभागीय उदासीनता भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, निर्माण खंड-एक बस्ती में फरवरी-2008 में तीन कामों के लिए निविदाएं आमंत्रित की गई थीं। किंतु इसमें ठेकेदारों से करार चार साल और नौ महीने बाद दिसंबर, 2012 में हुआ जबकि समाजवादी पार्टी सत्ता में आ चुकी थी और विभागीय मंत्री शिवपाल सिंह यादव थे।

इन तीनों कामों के लिए दो ठेकेदारों ने टेंडर डाले थे और एक ही कंपनी के साथ तीनों कामों के करार हुए थे। लेखा परीक्षा में पाया गया कि एक काम में 97663 रुपये का अनुबंध हुआ लेकिन, कंपनी को 14.07 लाख का भुगतान किया गया। निर्माण खंड ने दो अन्य काम का विवरण आडिट टीम को उपलब्ध ही नहीं कराया।

प्रधान महालेखाकार पीके कटारिया की इस रिपोर्ट में इसी तरह उन्नाव का भी एक मामला दिया गया है। इसमें निर्माण खंड उन्नाव में तीन ठेकेदारों ने अपनी फर्म में एक ही इंजीनियर को तैनात दिखाया। इसके लिए उन्होंने शपथपत्र भी दाखिल किया था। तीनों ठेकेदारों ने उक्त इंजीनियर को अपनी फर्म से वेतन दिया जाना भी दर्शाया था। आडिट रिपोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निश्चित रूप से इसमें दो ठेकेदारों ने गलत हलफनामा दिया था लेकिन, अधिशासी और अधीक्षण अभियंताओं ने इसकी अनदेखी कर दी।

अधीक्षण अभियंता गोरखपुर वृत्त के अधीन पांच खंडों में 128 अनुबंध ऐसे थे जिनकी लागत 101 करोड़ रुपये से अधिक थी लेकिन इसमें सिर्फ दो ठेकेदारों ने ही निविदाएं डाली। इसमें सांठगांठ की साजिश देखी गई। इसी तरह ठेकेदारों से जमानत कम लिए जाने, उनकी हैसियत प्रमाणपत्र का सत्यापन न किए जाने के तमाम प्रकरण हैं। आडिट रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि लगभग 70 फीसद काम में विलंब हुआ जिससे योजना की लागत बढ़ती गई। ऐसे अधिकारियों ने अपने चहेते ठेकेदारों को अनुचित फायदा पहुंचाने के नजरिए से भी किया। 

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