GDP के 1.56 फीसदी रक्षा बजट के सहारे अब डोकलाम जैसे हालात से निपट पाएगी सेना!

संसद में जब बजट पेश किया जाता है तो 10 लाख से ज्यादा की संख्या वाली हमारी सेनाओं के सर्वोच्च अधिकारी बड़े ध्यान से इसे देखते हैं. इन लोगों के कंधे पर देश की सीमाओं की रक्षा, एक अरब से ज्यादा लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है. आखिरकार रक्षा क्षेत्र की तकदीर इस बात से ही तय होती है कि सरकार सेनाओं के लिए कितना आवंटन करने को तैयार है. पिछले कई बजट से रक्षा क्षेत्र को जो आवंटन हो रहा है, वह सेना अधिकारियों को संतुष्ट करने लायक बात नहीं है. ऐसे में जब हमारे देश को डोकलाम जैसे हालात से निपटने पड़ रहे हों, जीडीपी के डेढ़ फीसदी के रक्षा बजट को भला पर्याप्त माना जा सकता है.GDP के 1.56 फीसदी रक्षा बजट के सहारे अब डोकलाम जैसे हालात से निपट पाएगी सेना!

देश के सामने खतरे बड़े हैं, दो परमाणु ताकत वाले पड़ोसी हमारे दुश्मन हैं. लेकिन हमारे सैनिकों के पास जो साजोसामान है, वह कम है और पुराना पड़ रहा है. हालत यह है कि एयरफोर्स के तमाम हेलीकॉप्टर और विमानों को ‘उड़ते ताबूत’ कहा जा रहा है. नौसेना के पास कुछ दर्जन ही पनडुब्ब‍ियां हैं, जबकि चीन के पास 60 से ज्यादा. सेना को अगले कुछ वर्षों में 2,200 155एएम तोपों की जरूरत है, लेकिन उसे अभी 145 होवित्जर एम 777 तोप भी नहीं मिल पाए हैं. इस सूची का कोई अंत नहीं है. हमारे पास जो गोला-बारूद हैं, उनसे महज 40 दिन तक ही जंग लड़ी जा सकती है. हमारे ज्यादातर हेलीकॉप्टर पुराने हैं और अगले 10 वर्षों में 1,000 से 1200 हेलीकॉप्टरों की जरूरत पड़ेगी. वायु सेना के 42 स्क्वाड्रन्स घटकर 32 ही रह गए हैं और इनमें और कमी आएगी, क्योंकि मिग 23 और मिग 27 जैसे विमान रिटायर हो गए हैं.

सरकार तो तमाम रक्षा खरीद सौदों को मंजूरी देने की रुचि दिखा रही है, लेकिन ऐसा लगता है कि रक्षा मंत्रालय अपनी गफलत से बाहर नहीं आ पा रहा. अगर हम रक्षा खरीद की बात करें तो सेना के पास दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है. सरकार की नई रक्षा खरीद प्रक्रिया (DPP), 2016 पुराने DPP 2013 के मुकाबले ज्यादा प्रगतिशील हैं,  लेकिन इससे भी खरीद की रफ्तार नहीं बढ़ पाई है.

अगर जीडीपी के हिसाब से बात करें तो प्रतिरक्षा बजट इसका महज 1.56 फीसदी रहा है, जबकि प्रतिरक्षा मामलों पर संसदीय समिति का कहना है कि इसे कम से कम 3 फीसदी होना चाहिए. शेकतकर समिति ने इसे कम से कम 2.2 फीसदी रहने की बात कही है. पाकिस्तान का रक्षा बजट वहां के जीडीपी का 3.5 फीसदी और चीन का 1.9 फीसदी है. इजरायल तो अपने जीडीपी का 5.7 फीसदी प्रतिरक्षा पर खर्च करता है. अगर वैश्विक औसत की बात करें तो यह भी 2.2 फीसदी है. चीन की अर्थव्यवस्था हमसे काफी बड़ी है, इसलिए यह समझा जा सकता है कि उसका रक्षा बजट हमसे काफी ज्यादा है. अगर हम इसी तरह प्रतिरक्षा बजट का आवंटन करते रहे तो हमारी सेना और चीन की सेना के बीच खाई और बढ़ती जाएगी. 

इसलिए हमारे देश के प्रतिरक्षा बजट में काफी बढ़त करनी होगी. ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि ज्यादा रक्षा खर्च से बाकी ग्रोथ पर असर पड़ेगा. आखिर इजरायल जैसे देश जीडीपी का 5.7 फीसदी खर्च करते हुए भी अपने ग्रोथ को अच्छी तरह से प्रबंधित कर रहे हैं.

सुरक्षा के लिहाज से हमारा देश एक चौरोह पर खड़ा है. हमें अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा को बनाए रखने के लिए निर्णायक कदम उठाने होंगे. चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के निर्माण पर चीन करीब 60 अरब डॉलर खर्च कर रहा है. यह कॉरिडोर भारत की सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा है. डोकलाम इसका उदाहरण है कि हमें किस तरह की अकस्मात चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. देश में एक दशक से भी ज्यादा समय से प्रतिरक्षा क्षेत्र उपेक्ष‍ित है, अब इस सरकार से उम्मीद है कि वह कुछ साहसिक फैसले करेगी, क्योंकि हम नोटबंदी, जीएसटी जैसे कदम सरकार को उठाते देख चुके हैं.

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