RSS: प्रणब दा के भाषण को कांग्रेस व भाजपा अपनी-अपनी तरह से देख रही है, जानिए क्या है दोनों मत!

नागपुर: पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को संघ के कार्यक्रम में जाने से रोकने की कोशिश करने वाले कांग्रेस नेताओं के तेवर उनके भाषण के बाद बदले हुए नजर आए। प्रणब के नागपुर जाने को लेकर आलोचना पर उतारू कांग्रेस नेता अब इसे अपनी वैचारिक जीत के रूप में देख रहे हैं। वहीं भाजपा प्रणब मुखर्जी के आरएसएस के कार्यक्रम में जाने पर बड़ी जीत मान रही है।


कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि पूर्व राष्ट्रपति ने संघ के मुख्यालय जाकर उन्हें सच्चाई का आईना दिखाया है। कांग्रेस ने माना कि पूर्व राष्ट्रपति के संघ मुख्यालय जाने को लेकर चर्चा ,विवाद और चिंताएं थीं। उन्होंने संघ को उन्हीं के मंच से भारत की गौरवशाली परंपराओं का पाठ पढ़ाया है।

कांग्रेस कह रही है कि प्रणब ने संघ की आंख और आत्मा पर चढ़े मकडज़ाल को उतारने का प्रयास किया है। संघ और देश को ये बताया कि भारत अपनी विविधिता और अहिंसा में जीता है। भारत सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता सबको साथ लेकर चलने की क्षमता, अलग-अलग धर्म,जाति,विचार, पहचान, खानपान और विभिन्न भाषाओं से एक सूत्र में बंधा है। सुरजेवाला ने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति ने वर्तमान मोदी सरकार को राजधर्म की याद दिलाई है।

भारतीय स्वयं सेवक संघ को लेकर तरह-तरह की धारणाओं को खारिज करते हुए मोहन भागवत ने साफ कर दिया कि हम जैसा करते हैं वैसा ही दिखते हैं। चुनौती दी, आइए आप भी परख सकते हैं। यहां आने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। आइए, समझिए और अपना भाव बनाइए। हम जैसे थे वैसे ही रहेंगे।

उन्होंने कहा कि विचार कुछ भी हो, जाति कुछ भी हो समाज हितैषी आचरण को बढ़ावा देने वाले लोगों का संगठन है संघ। उन्होंने कहा कि तत्व ज्ञान की हमारे पास कभी कमी नहीं रही, हां व्यवहार के मामले में हम निकृष्ट थे, लेकिन अब कुछ सुधार हुआ है। इसके बावजूद अभी भी बहुत कुछ हासिल किया जाना बाकी है।

संघ प्रमुख ने कहाए भारत को दुनिया की समस्याओं का जवाब देना है। इस गंतव्य तक पहुंचने के लिए संघ सभी सज्जन शक्तियों को इक_ा करना चाहता है। प्रामाणिक लोगों में मत आड़े नहीं आते हैं। सब मिलकर चलते हैं। प्रणब मुखर्जी को बुलाये जाने पर भागवत ने साफ किया कि संघ की परंपरा रही है कि हम देश के सज्जनों को आमंत्रित करते हैं। इस बार कुछ विशेष चर्चा चली।

इसका कोई अर्थ नहीं है। यह वैसे ही हुआ है जैसे हर साल होता है। संघ और प्रणब मुखर्जी वही रहेंगे जो पहले थे। संघ संपू्र्ण समाज को संगठित करना चाहता है। इसलिए हमारे लिए कोई पराया नहीं है। भारत की धरती पर जन्मा प्रत्येक व्यक्ति भारत का पुत्र है। देशभक्ति करना उसका काम है।

केवल पोषण और आजीविका के लिए प्रकृति ने हमें साधन नहीं दिए हैं। भाषाओं और पंथों की विविधता तो पहले से ही है। विविधता होना सुंदरता है। विविधता के बीच एकता ही हमारी संस्कृति है। यह सारे विश्व और स्वार्थ के भेद मिटाकर सुख शांति पूर्ण जीवन देने वाली भूमि है। मत.मतांतर तो होते ही रहते हैं।

लेकिन इन सब बातों की एक मर्यादा है। अंततरू हम सब भारत माता के पुत्र हैं। हम सब मिलकर इसका भाग्य बदल देंगे। हेडगेवार ने कांग्रेस के आंदोलनों में दो बार भाग लिया। आजादी के आंदोलन में क्रांतिकारियों का साथ दिया। उन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र बोस का भी जिक्र किया। किसी राष्ट्र का भाग्य बनाने वाले समूह नहीं होते हैं। सरकारें बहुत कुछ कर सकती हैं लेकिन सब कुछ नहीं कर सकती हैं। जब तक देश का सामान्य समाज गुणसंपन्न होकर देश के लिए पुरुषार्थ करने के लिए तैयार नहीं होता है तब तक सारे दल और समूह भी कुछ नहीं कर सकते हैं।

हम सब एक हैं सबके पू्र्वज एक हैं। यह किसी को तुरंत समझ में आ जाता है लेकिन किसी.किसी को कुछ मालूम ही नहीं है। अपने संकुचित भेद छोड़कर इस भेद को हम सब समझ लें तो इस सनातन समाज को समृद्ध बनाया जा सकता है। संगठित समाज ही देश का भाग्य बदल सकता है।

किसी भी कार्य को करने के लिए शक्ति चाहिए। शक्ति संगठन में होती है। सबके मिलकर काम करने में होती है। अगर शक्ति को शील का आधार नहीं रहा तो वह शक्ति दानवी शक्ति बन जाती है। विद्या प्राप्त लोग विवाद में समय गंवा देते हैं। धनपति उसके मद में ही चूर रहते हैं।

जबकि शक्ति संपन्न लोग इसका इस्तेमाल दूसरों को परेशान करने के लिए करते हैं। जबकि विद्या का इस्तेमाल ज्ञान के प्रसार में होना चाहिए। पांच गुणों के आधार पर संघ के कार्यकर्ता अपना जीवन बिताते हैं। इसी आधार पर संघ अपने प्रति प्रतिकूलता के वातावरण को अनुकूलता में बदलने में कामयाब रहा है। प्रणब मुखर्जी के आरएसएस कार्यक्रम में जाने को लेकर भाजपा काफी खुश है।

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