SC ने पूछा- क्या कोई रेप पीड़िता हमलावर को I LOVE YOU कहती है, सुना है?

फिल्म ‘पीपली लाइव’ के सह निर्देशक महमूद फारुखी को बलात्कार मामले में बरी किए गए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने बहुत बेहतर तरीके से मामले का निपटारा किया है और इसमें दखल देने का कोई कारण नहीं बनता। याचिका कथित बलात्कार पीड़िता(अमेरिकी शोधकर्ता) की ओर से दायर की गई थी। SC ने पूछा- क्या कोई रेप पीड़िता हमलावर को I LOVE YOU कहती है, सुना है?
35 वर्ष अमेरिकी शोधकर्ता ने फारुखी पर आरोप लगाया था कि 28 मार्च, 2015 को फारुखी ने दिल्ली स्थित अपने घर पर उसके साथ बलात्कार किया। निचली अदालत ने फारुखी को दोषी मानते हुए सात वर्ष कैद की सजा सुनाई थी लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने फारुखी को बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बलात्कार को अविश्वसीन बताया था। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था यह जरूरी नहीं कि कामोन्माद में कहा गया ‘हां’ का मतलब ‘हां’ हो और ‘न’ का मतलब ‘न’ ही हो। 

कुछ इस अंदाज में पीठ ने पूछा याचिकाकर्ता से सवाल

पीठ: याचिकाकर्ता(पीड़िता) और फारुखी एक-दूसरे केलिए अंजान नहीं थे। उनके बीच नजदीकी संबंध थे। यह मामला वैसा नहीं जब दो अपरिचित मिले थे और उनके बीच कुछ हो गया।

वृंदा ग्रोवर(याचिकाकर्ता की वकील): नहीं, मी लॉर्ड। दोनों एक-दूसरे से सिर्फ परिचित थे न कि उनके बीच यौन संबंध थे।

पीठ: हमारा मतलब है कि दोनों मर्जी से मिलते थे और दोनों खुशी- खुशी से ड्रिंक करते थे। दोनों कई चीजें एकसाथ करते थे। 

ग्रोवर: साथ ड्रिंक करने का मतलब यह नहीं कि महिला की हर चीज में सहमति थी।

पीठ : हम यह साबित नहीं करना चाह रहे हैं बल्कि हम कहना चाह रहे हैं कि वे दोनों अपरिचित नहीं थे।

ग्रोवर: जरूर, इसमें कोई शक नहीं कि दोनों अपरिचित नहीं थे। घर जाना और साथ ड्रिंक करने को मौन सहमति नहीं कहा जा सकता।

पीठ: हम कहना चाहते कि इस तरह के मामले में निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल होता है लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले को बहुत अच्छी तरह से निपटारा किया है।

ग्रोवर: लेकिन हाईकोर्ट ने कानून पर ही गौर नहीं किया। धारा-375 में सहमति को परिभाषित किया गया है। इसमें कहा गया है कि सहमति केलिए स्पष्टता और स्वेच्छा जरूरी है साथ ही उसका इजहार भी करना होता है। महिला ने कहा था कि सहमति से यौन संबंध नहीं हुआ था।

पीठ: महिला ने यह कैसे व्यक्त किया कि उसकी सहमति नहीं है?

ग्रोवर: उसने कई बार ‘नहीं’ कहा था। 

पीठ: शुरू में ‘हां’ कहा था। बाद में कामोन्माद में ‘नहीं’ कहा था। लोग हर वक्त फर्जी मुस्कान देते हैं। लेकिन कथित आरोपी यह कैसे समझे कि नहीं फर्जी था या नहीं। महिला ने कहा था कि वह डरी हुई थी लेकिन उसने वह किया जो डरे हुए व्यक्ति के ठीक विपरीत था।

ग्रोवर: ऐसा इसलिए कि वह उसे जानती थी और उससे कई बार मिल चुकी थी। इस तरह का अनोखापन हो जाता है कि जब आप अपराधी को जानते हों।

पीठ: आप क्यों नहीं महिला द्वारा कथित आरोपी को लिखी-मेल पढ़ती हैं। आप संकोच न करें। जब अदालत आपको पढ़ने के लिए कह रही है तो आपको संकोच नहीं करना चाहिए।

ग्रोवर: मुझे ई-मेल पढ़ने में कोई संकोच नहीं। यह ई-मेल रिकार्ड मेरे द्वारा ही रिकार्ड पर लाया गया है न कि आरोपी द्वारा। 

दोस्त अक्सर एक-दूसरे को ‘आई लव यू’ कहते हैं

​पीठ: ई-मेल केआखिरी में महिला ने यह स्वीकार किया है कि वे महज दोस्त नहीं थे।

ग्रोवर: अगर कोई अपरिचित हो तो वहां सहमति का तो सवाल ही नहीं पैदा होता। 

पीठ: आप यह बताइए कि आखिर कथित आरोपी ने क्यों यह नहीं समझना चाहिए था कि उसकी सहमति है। आप ई-मेल पढिए। 

ग्रोवर: ठीक है मी लॉर्ड।

पीठ: आपके पास वकालत का लंबा तजुर्बा है। कितनी बार अपने सुना है कि जब पीड़िता ने घटना के बाद ‘हमलावर’ को आई लव यू कहा हो। 

ग्रोवर: वे दोस्त थे। दोस्त अक्सर एक-दूसरे को ‘आई लव यू’ कहते हैं। 

पीठ: आप बताएं कि उस घटना से पहले दोनों कितनी बार मिले थे?

ग्रोवर: शायद दो या तीन बार। लेकिन घटना वाले दिन पहली बार वह अकेले उसके घर गई थी। पीड़िता आरोपी को जानती थी। उसकी पत्नी को भी जानती थी। ऐसे में आरोपी के घर जाने को कुछ और नहीं समझा जाना चाहिए। 

पीठ: आपने ही कहा था कि वह कई बार आरोपी के घर गई थी।

ग्रोवर: ठीक है। लेकिन जहां तक यौन संबंध की बात है, न का मतलब हां नहीं हो सकता। 

पीठ: साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि उनके बीच अलग संबंध थे। आप रिकार्ड देखिए। इसमें कहा गया कि महिला फारुखी की पत्नी की मौजूदगी में भी उसके घर जाती थी और जब पत्नी किचन में होती थी तो वे दोनों एक-दूसरे को किस करते थे।

ग्रोवर: यह सही है कि ये मेरे बयान हैं। लेकिन जब कोई जबरन कुछ करना चाहता है तो क्या मुझे यह कहने से रोका सकता है कि मेरी सहमति नहीं है। 

पीठ: हम हाईकोर्ट केआदेश दखल नहीं दे सकते। हाईकोर्ट का फैसला सही है।

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