आखिर क्यों भगवान शिव के सिर पर हमेशा चन्द्रमा सुशोभित रहता है?

भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों की समस्त पीड़ा का अंत होता है। इनकी पूजा करने का विषेश दिन सोमवार का माना गया है। जब कभी भगवान शिवशंकर की बात होती है या फिर उनका स्मरण किया जाता है, तो शिव जी की वेशभूष के रूप में उनके सिर पर चन्द्रमा सुशोभित नजर आता है। क्या कभी आपने सोचा है, आखिर भगवान शिव शंकर के सिर पर चन्द्रमा होेने का राज क्या हो सकता है? अगर आप भी अब तक इस रहस्य से अंजान हैं, तो यहां पर आज हम इसी विषय पर चर्चा करने वाले हैं, यहां पर हम जानेंगे कि आखिर कैसे भगवान शिव के सर पर चन्द्रमा स्थापित हुआ?भगवान शिव की आराधना करने से भक्तों की समस्त पीड़ा का अंत होता है। इनकी पूजा करने का विषेश दिन सोमवार का माना गया है। जब कभी भगवान शिवशंकर की बात होती है या फिर उनका स्मरण किया जाता है, तो शिव जी की वेशभूष के रूप में उनके सिर पर चन्द्रमा सुशोभित नजर आता है। क्या कभी आपने सोचा है, आखिर भगवान शिव शंकर के सिर पर चन्द्रमा होेने का राज क्या हो सकता है? अगर आप भी अब तक इस रहस्य से अंजान हैं, तो यहां पर आज हम इसी विषय पर चर्चा करने वाले हैं, यहां पर हम जानेंगे कि आखिर कैसे भगवान शिव के सर पर चन्द्रमा स्थापित हुआ?  शिवपुराण में वर्णित पहली पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन किया गया था, तो उसमें से विष निकला था और पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले उस विष को ग्रहण किया था। विष पीने के बाद भगवान शिव का शरीर विष के प्रभाव के कारण अत्यधिक गर्म होन लगा। ये देखकर चंद्रमा ने विनम्र स्वर में प्रार्थना की, कि उन्हें माथे पर धारण करके अपने शरीर को शीतलता दें, ताकि विष का प्रभाव कुछ कम हो सके।  पहले तो शिव ने चंद्रमा के इस आग्रह को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि चंद्रमा श्वेत और शीतल होने के कारण इस विष की असहनीय तीव्रता को सहन नहीं कर पाते। लेकिन अन्य देवतागणों के निवेदन के बाद शिव ने निवेदन स्वीकार कर लिया। माना जाता है कि विष की तीव्रता के कारण चांद के श्वेत रंग में नीला रंग घुल गया, जिस कारण से पूर्णिमा की रात चांद का रंग थोड़ा-थोड़ा नीला भी प्रतीत होता है।

शिवपुराण में वर्णित पहली पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन किया गया था, तो उसमें से विष निकला था और पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए स्वयं भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले उस विष को ग्रहण किया था। विष पीने के बाद भगवान शिव का शरीर विष के प्रभाव के कारण अत्यधिक गर्म होन लगा। ये देखकर चंद्रमा ने विनम्र स्वर में प्रार्थना की, कि उन्हें माथे पर धारण करके अपने शरीर को शीतलता दें, ताकि विष का प्रभाव कुछ कम हो सके।

पहले तो शिव ने चंद्रमा के इस आग्रह को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि चंद्रमा श्वेत और शीतल होने के कारण इस विष की असहनीय तीव्रता को सहन नहीं कर पाते। लेकिन अन्य देवतागणों के निवेदन के बाद शिव ने निवेदन स्वीकार कर लिया। माना जाता है कि विष की तीव्रता के कारण चांद के श्वेत रंग में नीला रंग घुल गया, जिस कारण से पूर्णिमा की रात चांद का रंग थोड़ा-थोड़ा नीला भी प्रतीत होता है।

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