आज से शुरू हुई भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा

आज से यानी 14 जुलाई से जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू हो रही है जिसमें शामिल होने दूर-दूर से लोग आते हैं और इस पल का लाभ लेते हैं. पुरी की ये यात्रा बहुत ही बड़ी यात्रा होती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम के साथ विराजते हैं. बता दें, आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से ये यात्रा शुरू होती है. रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुण्डिच्चा मंदिर तक पहुंचती है और काफी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं. इस यात्रा का काफी महत्व है और इसके पीछे कई सारे रहस्य भी जुड़े हुए हैं. आज से यानी 14 जुलाई से जगन्नाथ रथ यात्रा शुरू हो रही है जिसमें शामिल होने दूर-दूर से लोग आते हैं और इस पल का लाभ लेते हैं. पुरी की ये यात्रा बहुत ही बड़ी यात्रा होती है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलराम के साथ विराजते हैं. बता दें, आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से ये यात्रा शुरू होती है. रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुण्डिच्चा मंदिर तक पहुंचती है और काफी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें शामिल होते हैं. इस यात्रा का काफी महत्व है और इसके पीछे कई सारे रहस्य भी जुड़े हुए हैं.   रथ यात्रा के रूप में ये परम्परा काफी समय से चली आ रही है जिसके पीछे कुछ कथा भी है. कथा ये कहती है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्मदिन होता है जिस दिन उन्हें 108 कलशों से शाही स्नान करवाया जाता है जिसके बाद वो बीमार हो जाते हैं. स्वास्थ्य में सुधार पाने हेतु भगवान कई दिनों के लिए अपने कक्ष में चले जाते हैं जहां पर उनके निजी सेवक के अलावा कोई नहीं होता. कई दिनों के पश्चात् जब भगवान का स्वास्थ्य ठीक हो जाता है तब उन्हें नगर भ्रमण के लिए ले जाया जाता है.     करीब 15 दिन बाद भगवान स्वस्थ होकर कक्ष से बाहर निकलते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे नव यौवन नैत्र उत्सव भी कहते हैं. इसमें लाखों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं और रथ को खींचने का काम करते हैं. कहा जाता है रथ को खींचने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है और सभी भक्त इसका भरपूर आनंद लेते हैं. तीनों भगवान के रथ को सजा कर उनमें भगवान की मूर्ति स्थापित करके उन्हें यात्रा पर ले जाया जाता है जो करीब 9 दिनों तक चलती है.

रथ यात्रा के रूप में ये परम्परा काफी समय से चली आ रही है जिसके पीछे कुछ कथा भी है. कथा ये कहती है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ का जन्मदिन होता है जिस दिन उन्हें 108 कलशों से शाही स्नान करवाया जाता है जिसके बाद वो बीमार हो जाते हैं. स्वास्थ्य में सुधार पाने हेतु भगवान कई दिनों के लिए अपने कक्ष में चले जाते हैं जहां पर उनके निजी सेवक के अलावा कोई नहीं होता. कई दिनों के पश्चात् जब भगवान का स्वास्थ्य ठीक हो जाता है तब उन्हें नगर भ्रमण के लिए ले जाया जाता है.

करीब 15 दिन बाद भगवान स्वस्थ होकर कक्ष से बाहर निकलते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं, जिसे नव यौवन नैत्र उत्सव भी कहते हैं. इसमें लाखों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं और रथ को खींचने का काम करते हैं. कहा जाता है रथ को खींचने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है और सभी भक्त इसका भरपूर आनंद लेते हैं. तीनों भगवान के रथ को सजा कर उनमें भगवान की मूर्ति स्थापित करके उन्हें यात्रा पर ले जाया जाता है जो करीब 9 दिनों तक चलती है. 

You May Also Like

English News