इन बातों का खास ख्याल रख के मनाएं हैप्पी एंड सेफ दिवाली…

दिवाली के दौरान आतिशबाजी और राजधानी के दमघोंटू प्रदूषण को लेकर चिकित्सकों ने बेहद गंभीरता से लेने और समय रहते राजधानी के वायुमंडल में प्रदूषण के स्तर में सुधार की जरूरत को बल दिया है। साथ ही विशेष जोर देकर यह भी कहा है कि अगर आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो एक समय ऐसा आएगा कि राजधानी में लोगों का रहना मुश्किल ही नहीं हो जाएगा, बल्कि बीमारियां विस्फोटक रुप ले लेंगी। इन बातों का खास ख्याल रख के मनाएं हैप्पी एंड सेफ दिवाली...#सावधान: कही इस दिवाली आपकी थाली में मिठाई की जगह जहर तो नहीं…

बारूद की गंध से बढ़ सकता है साइनस और दमा
आतिशबाजी के दौरान पटाखों से निकले धुंए के कारण राजधानी दिल्ली के आवरण में कई दिनों तक धुंध छाई रहती है। जानकर हैरानी होगी कि इस दौरान अस्पतालों में साइनस, एलर्जी, दमा और सांस से संबंधित मरीजों की तादाद बेहद बढ़ जाती है। आतिशबाजी से निकला धुंआ लोगों की आंखों पर भी प्रभाव डालता है। जिसके कारण आंखों में लाली, जलन, खुजली, अंदरूनी सूजन सहित कई अन्य पीड़ादायक बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। 

अर्थराइटिस और दिल की बीमारियों को मिलता है बढ़ावा
 एम्स ने पहले ही अपने अध्ययन के जरिये यह स्पस्ट कर दिया है कि प्रदूषण से अर्थराइटिस का कनेक्शन है। हाल ही में एम्स में आयोजित सेमिनार के में एम्स रूमेटोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने दिवाली के बाद अर्थराइटिस और रूमेटिक मरीजों की तादाद में बढ़ोत्तरी होने की आशंका व्यक्त की है। वहीं कार्डियोलॉजिस्टों ने प्रदूषण को हृदय रोगियों के लिए खतरा करार दिया है। केवल इतना ही नहीं जहरीले वायु के कारण दिल का दौरा पडऩे का जोखिम सामान्य से कहीं अधिक बढ़ जाता है। 

आतिशबाजी के धमाके से कान को खतरा 
चिकित्सकों के मुताबिक राजधानी दिल्ली में दिवाली के दिन एक सेकंड में औसतन चार शोर वाले पटाखे चलाए जाते हैं। यह स्थिति माइग्रेन से पीड़ित, बीमार और अत्यधिक तनाव के शिकार मरीजों के लिए भारी परेशानी का सबब बनता है। माइग्रेन जैसे रोग तो सामान्य से ज्यादा शोर और बारूद की गंध के कारण बढ़ जाते हैं।  बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो दिवाली और उसके बाद के दो-तीन दिनों तक घर की चारदीवारी में महज इसलिए घिर जाते हैं क्योंकि, बाहर निकलते ही उनकी स्थिति खराब होने लगती है। कुल मिलाकर देखा जाए तो हमारा रोमांच हमारे कुछ लोगों के लिए खतरनाक और परेशानी वाला साबित हो रहा है। इसका सामाजिक स्तर पर विचार किया जाना चाहिए।

हो सकती हैं कई तरह की परेशानियां 
वायु प्रदूषण: आंखों में जलन, त्वचा का अल्सर, कोलाइटिस हिस्टीरिया, न्यूरोसिस, कमजोर याददाश्त बच्चों में अत्यधिक असमानताएं, नवजातों की मौत, मानसिक रोग, आत्मुग्धता, अप्रसन्नता, संवेदना, चर्म रोग।

ध्वनि प्रदूषण: उच्च रक्त चाप, मानसिक तनाव, हृदय रोग, पाचन क्रिया में गड़बड़ी, हार्मोन के निकलने में परिवर्तन, दुर्बल स्नायु तंत्र, निद्रा में बाधा, कान के पर्दों को क्षति, सुनने की ताकत का कमजोर हो जाना। 

जल प्रदूषण: पेट की बीमारियां, कॉलरा, भोजन पचने में परेशानी, अल्सर, पेट और आंत का कैंसर।

  • आंखों में जलन और सूखापन की समस्या होने पर थोड़े-थोड़े अंतराल पर पानी से आंखों को धोते रहें। 
  • एलर्जी, दमा, साइनस और माइग्रेन से पीड़ित लोग नाक और मुंह को ढंक कर रखें।
  • पटाखों के शोर से बचने के लिए कानों को ढंक कर रखा जा सकता है। इसके लिए एंटी न्वाइज हीयर पैड का इस्तेमाल कर सकते हैं। 
  • किसी भी तरह की परेशानी की स्थिति में नजदीकी विशेषज्ञ या चिकित्सक से संपर्क करें। 
  • त्वचा और आंखों का विशेष ख्याल रखें क्योंकि, प्रदूषण सबसे पहले इन्हें ही प्रभावित करता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है प्रदूषण  

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