जन्मदिन विशेष: नंगे पांव हुई थी “उपन्यास सम्राट” प्रेमचंद के जीवन की शुरुआत

‘उपन्यास सम्राट’ के नाम से पहचाने वाले महान लेखक मुंशी प्रेमचंद के जीवन की शुरुआत नंगे पांव (पैर) हुई थी. और इन नंगे पांवों ने ही चलकर एक साहित्य का संसार दिया, नंगे पांव उनकी कोई रचना नहीं थी अपितु यह उनके जीवन की वास्तविकता थी. उपन्यासकार कहे, कहानीकार कहे या फिर एक लेखक, प्रेमचंद अपनी कलम के दम पर हर कला में पारंगत थे. किन्तु शायद आप उनके जीवन से जुड़े वे पहलु नहीं जानते होंगे, जिन्होंने मुंशी प्रेमचंद को न सिर्फ एक लेखक बनाया बल्कि एक महान रचनाकार के रूप में दुनिया के सामने प्रतिस्थापित किया. उनके जीवन से जुडी इन बातो ने, विषम परिथितियों ने एक समता और समानता का प्रतिक दुनिया को दिया.

प्रेमचंद वो शख्श है, जिसके मार्मिक शब्द मन से निकलकर पन्नो पर उभर गए. हवा के झोंको की तरह हर इंसान के जहन में उतर गए. कुरीतियों को दूर करने के लिए रंगमंच के किरदारों में ढलकर समाज को झकझोर कर दिया. और ये मार्मिक शब्द यही नहीं रुके इन्होनें फ़िल्मी पर्दो पर भी अपना वो जादू बिखेरा जो जन्मो जन्मांतर तक कोई नहीं भूल सकता है.

मुंशी प्रेमचंद का संघर्ष भरा प्रारम्भिक जीवन – प्रेमचंद का पूरा जीवन आभावों में बिता और इस दुःख, संकट और आभाव ने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा. मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के लमही गांव में हुआ था, जो वाराणसी के निकट है. इनके पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था. पिता लमही गाव में ही डाकघर के मुंशी थे. मुंशी प्रेमचन्द का वास्तविक नाम धनपतराय श्रीवास्तव  था लेकिन इन्हें मुंशी प्रेमचन्द और नवाब राय के नाम से ज्यादा जाना गया. इनके पिता का मासिक वेतन सिर्फ 25 रूपये था, ऐसे में हम समझ सकते है कि प्रेमचंद के पिता अपने परिवार का पालन पोषण किस तरह से करते होंगे.

प्रेमचंद के जीवन में संघर्ष भरा दिन तब शुरू हुआ जब वे करीब 7 वर्ष के थे और उनकी माता का निधन हो गया. बाद में उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली. किन्तु उनके जीवन में आयी नयी मां से उन्हें मातृत्व का सुख नहीं मिल सका. कहा जाता है कि प्रेमचंद के घर में भयंकर गरीबी थी. हालात यह थे कि प्रेमचंद के पास पहनने के लिए न कपड़े होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था. यहाँ तक कि पढ़ने के लिए अपने गांव से दूर वाराणसी नंगे पांव जाना पड़ता था. जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. दूसरी और घर में सौतेली माँ का व्यवहार उन्हें कभी एक मां ना दे सका. वही जब प्रेमचंद की उम्र मात्र 14 वर्ष थी उनके पिता का भी देहांत हो गया. जिससे उनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियों और दुखो का पहाड़ टूट पड़ा.

प्रेमचंद का सपना वकील बनने का था किन्तु उनकी यह यात्रा पूरी ना हो सकी. प्रेमचन्द ने स्कूल आने-जाने से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर में एक कमरा लेकर रहने लगे. इनको ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था. जिसमे से तीन रुपये घर वालों को देते थे और दो रुपये पर स्वयं का जीवन चलाते थे.

प्रेमचंद की शिक्षा और कार्य –  अपने आभाव भरे जीवन में प्रेमचन्द ने जैसे तैसे मैट्रिक पास किया. जिसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य, पर्सियन और इतिहास विषयों से स्नातक की उपाधि द्वितीय श्रेणी में प्राप्त की.  प्रेमचंद सिर्फ हिंदी के ही जानकार नहीं थे अपितु वे उर्दू और अंग्रेजी में भी दक्ष थे. इंटरमीडिएट कक्षा में भी उन्होंने अंग्रेज़ी साहित्य एक विषय के रूप में पढा था. पढाई पूरी करने के दौरान प्रेमचंद शुरूआती दौर में अध्यापक भी रहे है. वही वे जितने बड़े लेखक थे उतने ही देश भक्ति से ओतप्रोत थे. कहा जाता है कि उन्होंने महात्मा गांधी के आव्हान पर अपनी नौकरी छोड़ दी थी.

प्रेमचंद का विवाह और व्यक्तित्व – संघर्ष के दिनों में जब प्रेमचंद पंद्रह वर्ष के थे, उनका विवाह हो गया था. यह विवाह उनकी सौतेली मां तथा नाना ने तय किया था. जिससे यह विवाह उनके जीवन के अनुरूप नहीं था. लड़की न तो देखने में सुंदर थी, न वह स्वभाव से शीलवती थी. ऐसे में उनकी पत्नी और वे नदी के दो किनारो की तरह हो गए. जो फिर कभी ना मिल सके. जिसके बाद उन्होंने कुरीतियों का दमन करते हुए एक बाल विधवा शिवरानी देवी से शादी की. शिवरानी देवी के पिता फ़तेहपुर के पास के इलाक़े में एक साहसी ज़मीदार थे और अपनी बेटी का पुनर्विवाह करवाना चाहते थे. ऐसे में प्रेमचंद ने उन्हें अपनी जीवन संगिनी बनाया. जिसके बाद उनके जीवन में दुखो की डगर थोड़ी कम हुई.

अपने जीवन में इतनी परेशानियां होने के बाद भी प्रेमचंद हंसमुख स्वाभाव के ईमानदार, दयावान और निर्भीक व्यक्ति थे. वे हमेशा राष्ट्र के लिए समर्पण के भाव से काम करते थे. हालांकि अपने दोबारा विवाह करने और अपनी रचनाओं से समाज तथा कुरीतियों पर प्रहार करने के कारण विवादों में रहे है. प्रेमचंद ने लेखन का कार्य अपने शुरूआती जीवन में ही प्रारंभ कर दिया था. किन्तु प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन नाम से आया जो 1908 में प्रकाशित हुआ. सोजे-वतन देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत होने के कारण इस पर अंग्रेज़ी सरकार ने रोक लगा दी और भविष्‍य में इस तरह का लेखन न करने की चेतावनी दी. जिसके कारण उन्हें नाम बदलकर लिखना पड़ा.

प्रेमचंद और साहित्य – प्रेमचंद ने अपना पूरा जीवन लेखन के प्रति समर्पित किया था. अपने पुरे जीवन काल में उन्होंने करीब तीन सौ से अधिक कहानियां, लगभग 15 उपन्यास, 3 नाटक, 7 से अधिक बाल पुस्तके और अनेक पत्र पत्रिकाओ का संपादन,    समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण और लेख लिखे. उनकी रचनाये सामाजिक परिवेश और वर्तमान के जनमानस पर आधारित थी. उन्होंने अपनी रचनाओं में अन्धविश्वास, पुरानी प्रथाओं तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों पर जमकर प्रहार किया.  उपन्यास में गहरी पकड़ होने के कारण उन्हें हिंदी साहित्य के उपन्यास सम्राट की उपाधि दी गयी, उनके उपन्यासों में गोदान, कर्मभूमि, गबन, रंगभूमि, सेवा सदन,कायाकल्प, निर्मला आदि प्रमुख है.

उपन्यास सम्राट के अलावा प्रेमचंद को एक कहानीकार के रूप में भी जाना जाता है. जिसमे आज भी उनकी कुछ कहानियां लोगो को मुँह जुबानी याद है. और आज के आधुनिक समय में भी उनका गहरा प्रभाव है. उनकी कहानियो में नमक का दरोगा, दो बैलो की कथा, पूस की रात, पंच परमेश्वर, माता का हृदय, ईदगाह आदि प्रमुख है.

जीवन के अंतिम क्षण – प्रेमचंद हिंदी जगत में एक ऐसे दीपक के रूप में जले है, जिसका पूरा जीवन अन्धेरेमयी परिस्थिति में बिता, किन्तु अपने साहित्य से वे इस समज को हमेशा के लिए रोशन कर गए. वे अपने जीवन के अंतिम समय में भी लेखन का कार्य करते रहे और 8 अक्टूबर, 1936 को बीमारी के कारण प्रेमचंद अपने साहित्य संसार को छोड़कर हमेशा के लिए अमर हो गए. अपने अंतिम समय में वे  ‘मंगलसूत्र’ नामक उपन्यास की रचना कर रहे थे, किन्तु उसे पूरा ना कर सके. जिसे बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया. नंगे पांव शुरू हुई उनकी यह जीवनयात्रा ना सिर्फ एक राह बता गयी, बल्कि यह सन्देश दे गयी कि विषम परिस्थितियों को हराकर कैसे जीता जाता है.

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