जल की रानी मुंह में पानी, जानिए कौन सी मछली है क्यों है फेमस

छोटे बच्चों को वह कविता याद कराई जाती है-‘मछली जल की रानी है। जीवन उसका पानी है!’ पर जल की रानी की कहानियां कितनी अजीबोगरीब हैं, उसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। बित्तेभर की खूंखार मांसाहारी ‘पिराना’ मछली हो या दैत्याकार ‘शार्क’ या बड़ी-सी ‘टूना’, सभी इंसान की खुराक बन जाती हैं। हिन्दुस्तान में बंगाली लोगों का मछली प्रेम बहुत मशहूर है। वह मच्छी का झोल भी खाते हैं और झाल भी। बंगाली व्यंजनों में ही दोई माछ है और माछ कलिया भी। सरसों में लिपटी, भाप से पकी ‘हिल्सा’ का जिक्र ही मछली प्रेमियों के मुंह में पानी भर देता है। ‘झोल’ यानी पतली तरी वाली मछली और ‘झाल’ यानी ऐसी पाक विधि, जिसमें मिर्ची का तीखापन हो। जैसा की नाम से ही पता चलता है, ‘भाजा’ तली हुई मछली को कहते हैं।  
हिन्दुस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले, दो-चार मछलियों से ही अपना काम चला लेते हैं- रोहू या मांगुर, कतला या महाशीर। मगर जो लोग समुद्री तटवर्ती इलाके में रहते हैं, उनकी जुबान पर समुद्री मछलियों का जायका एक बार चढ़ने के बाद उतरने का नाम ही नहीं लेता। मसलन मुंबई वालों को चपटी ‘पॉम्फ्रेट’ सबसे ज्यादा सोहाती है, जिसे मराठी में ‘सारंगा’ कहते हैं। मछलियों के दो मुख्य भेद नदी के मीठे जल या पोखर में बड़ी होने वाली मछली तथा खारे पानी की मछली में किए जाते हैं।

जो लोग नदी, तालाब या समुद्र से दूर रहते हैं और कभी-कभार ही मछली खाते हैं, उन्हें कांटे वाली मछलियां खाने में बहुत हिचक होती है। उन्हें बिना कांटे की या एक कांटे की मछली मिल जाए, तो वह उसी में तृप्त हो जाते हैं। इन मछलियों में ‘बेतकी’, ‘सुरमई’ और ‘सिंघाडा’ ज्यादा लोकप्रिय है। तंदूरी टिक्के इन्हीं से बनाए जाते हैं। मगर मछली खाने के असली शौकीन को न तो मछली के कांटे से डर लगता है और न उसकी गंध से। महाभारत में मत्स्यगंध नामक रुपसी का उल्लेख मिलता है, जिसने एक राजकुमार का मन मोह लिया था। परन्तु यहां हम मानव शरीर की मादक सुगंध नहीं, बल्कि मछली की क्षुधवधर्क गंध की बात कर रहे हैं। 

कर्नाटक, गोवा और केरल में बागड़ा (मैकरल) तथा ‘करीमीन पर्ल स्पॉट फिश’ बड़े चाव से खाई जाती है। इस पूरे प्रदेश में छोटी-छोटी मछलियों को सुखा कर भी बारिश के मौसम में शाकाहारी भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए उसमें शामिल किया जाता है। मजेदार बात यह है कि जो लोग अपने को शाकाहारी समझते हैं, जैसे सारस्वत ब्राह्मण, वह भी मछली को जल तुरई मानते हैं और बड़े सहज भाव से अपनी थाली में स्थान देते हैं।

कहीं मछली का शोरबा इमली और नारियल के दूध से तैयार किया जाता है, तो कहीं जरा सी मछली को पूरे परिवार में बांटने के लिए इसमें आलू या सहजन की फली आदि मिलाई जाती है। पारसी और बंगाली लोग भी पत्तों में लपेटकर मछली पकाते हैं। जिस तरह बंगालियों को मछली के सिर का शोरबेदार व्यंजन पसंद है, वैसी ही एक पाक विधि म्यांमार में भी प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि भारत से मलय प्रायद्वीप में जाने वाले लोग इसे अपने साथ वहां तक ले गए। 

अवध के बावर्ची अपने हाथ का हुनर दिखाने के लिए पकाते वक्त ही मछलियों का कांटा गला सकने का दावा करते हैं, तो कभी देखते ही विस्मय में डालने वाली मछली मुसल्लम पेश करते हैं। कभी जमीन में खड्डा खोद ऊपर से अंगारे रख जमीदोज मछली पकाते हैं। मछली के कबाब की ईजाद भी वह अपने पुरखों की मानते हैं। हैदराबाद में खट्टी मछली का चलन है, तो अमृतसर में मखनी मछली या बेसन के हल्के खोल में लपटी मसालेदार तली मछली का राज है।

भारत के उत्तर-पूर्वी हिस्से में छोटी-छोटी मछलियों को खमीर चढ़ने के बाद चटनी की तरह पीसकर काम में लाया जाता है या इस ‘मसाले का पुट’ किसी और व्यंजन में दिया जाता है। कश्मीर की एक अनोखी पेशकश मूली और मछली का शोरबा है। दुनिया के और देशों में मछलियां और भी कई किस्म की खाई जाती हैं और उनको बनाने का तरीका भी अलग होता है। इनके बारे में फिर कभी। 
 

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