…तो इस वजह से महिलाएं करती आ रहीं हैं सोलह श्रृंगार

महिलाओं को सम्पूर्ण तब माना जाता है, जब वह सोलह श्रृंगार करती है। असल में शास्त्र में भी महिलाओं को सोलह श्रृंगार के साथ सौभाग्यशाली का दर्जा दिया गया है। कहा जाता है कि महिलाएं जब सोलह श्रृंगार करती हैं, तो वह बहुत ही सौभाग्यशाली होती है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर महिलाओं को लेकर यह सोलह श्रृंगार का क्या मतलब होता है? आज हम आपसे इसी सोलह श्रृंगार के बारे में चर्चा करने वाले हैं और यहां पर हम जानेंगे कि आखिर महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार करने की क्या वजह है? दरअसल इसके पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसके बारे में आज हम यहां पर जानेंगे।...तो इस वजह से महिलाएं करती आ रहीं हैं सोलह श्रृंगार

जब भगवान राम ने धनुष तोड़ दिया था, सीताजी को सात फेरे लेने के लिए सजाया जा रहा था, तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी, ‘‘माताश्री इतना श्रृंगार क्यों?’’

उनकी माताश्री ने उत्तर दिया- बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार वर या वधू के लिए नहीं किया जाता, यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है?

सीताजी ने पुनः पूछा –  इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध?
बेटी, मिस्सी धारण करने का अर्थ है कि आज से तुम्हें बहाना बनाना छोड़ना होगा।

और मेहंदी का अर्थ?
मेहंदी लगाने का अर्थ है कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।

और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?
बेटी! काजल लगाने का अर्थ है कि शील का जल आंखों में हमेशा धारण करना होगा अब से तुम्हें।
 
बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री?
बिंदी का अर्थ है कि आज से तुम्हें शरारत को तिलांजलि देनी होगी और सूर्य की तरह प्रकाशवान रहना होगा।

यह नथ क्यों?
नथ का अर्थ है कि मन की नथ यानी किसी की बुराई आज के बाद नहीं करोगी, मन पर लगाम लगाना होगा।

और यह टीका?
पुत्री टीका यश का प्रतीक है, तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है, जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो, क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।

और यह बंदनी क्यों?
बेटी बंदनी का अर्थ है कि पति, सास-ससुर आदि की सेवा करनी होगी।

पत्ती का अर्थ?
पत्ती का अर्थ है कि अपनी पत यानी लाज को बनाए रखना है, लाज ही स्त्री का वास्तविक गहना होता है।

कर्णफूल क्यों?
हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर हमेशा प्रसन्न रहना होगा।

और इस हंसली से क्या तात्पर्य है?
हंसली का अर्थ है कि हमेशा हंसमुख रहना होगा सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।

माताश्री फिर मेरे अपने लिए क्या श्रींगार है?
बेटी आज के बाद तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस दुनिया में है ही नहीं, तुम तो अब से पति की परछाई हो, हमेशा उनके सुख-दुख में साथ रहना, वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।

हे राम ! कहते हुए सीताजी मुस्करा दी।

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