…तो क्या इसलिए यूपी भेजे गए हैं एके शर्मा?

    राजीव श्रीवास्तव

लखनऊ:

आज गाजे-बाजे के साथ बीजेपी के 10 एमएलसी प्रत्याशियों ने अपना नामांकन पर्चा भर दिया वहीं दूसरी ओर कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी ने अपने दो प्रत्याशियों – अहमद हसन और राजेन्द्र चौधरी – का नामांकन पर्चा दाखिल कराया। मतलब साफ है, सभी 12 प्रत्याशी निर्विरोध विधान परिषद के सदस्य बन जाएंगे।
हाँलाकी आज भी बीजेपी के प्रत्याशियों के नामांकन से ज्यादा इस बात की चर्चा थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाने वाले सेवानिवृृत्त प्रशासनिक अधिकारी एके शर्मा आखिरकार उत्तर प्रदेश आए क्यूँ हैं? यूं तो प्रदेश बीजेपी के शीर्ष नेता इस मामले में अपनी अनभिज्ञता ही दर्शाते हैं, पर सूत्रों की माने तो एके शर्मा केवल एमएलसी बनने नहीं आए हैं।
प्रदेश के मऊ जिले के मूल निवासी एके शर्मा, जिनकी वीआरएस प्रार्थना को मंजूरी अभी 11 जनवरी को मिली है, ने 14 जनवरी को बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की, 15 जनवरी को उनको बीजेपी का विधान परिषद का प्रत्याशी बनाया गया और 18 जनवरी को उन्होंने 9 अन्य बीजेपी प्रत्याशियों के साथ अपना नामांकन पर्चा भर दिया।

शर्मा के अलावा, उपमुख्यमंत्री डॉ दिनेश शर्मा, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह, विधान परिषद सदस्य लक्षमनाचार्य, कुँवर मानवेंद्र सिंह, बीजेपी महामंत्री द्वय गोविंद नारायण शुक्ल, अश्वनी त्यागी, सुरेन्द्र चौधरी, धर्मवीर प्रजापति और सलिल बिश्नोई ने अपना नामांकन दाखिल किया।
जानकारों की माने तो बीजेपी ने इस सूची में कुछ जगहों पर सामाजिक समीकरण को दरकिनार कर व्यक्ति विशेष पर ध्यान दिया है। शायद यही कारण है कि 10 लोगों की सूची में एक भी महिला और कायस्थ नेता का नाम नहीं है।
सूत्रों की माने तो दरअसल एके शर्मा के आने के कारण बीजेपी अपना समीकरण नहीं बैठा पाई। शर्मा के आने से ही महिला को प्रत्याशी नहीं बनाया गया वहीं दूसरी ओर पश्चिम से कोई प्रत्याशी रखने की विवशता के चलते अश्वनी त्यागी को स्थान दिया गया बावजूद इसके कि दस प्रत्याशियों की सूची में दो-दो ब्राह्मण और दलित के साथ दो भूमिहार प्रत्याशियों को जगह मिली है। इसी के चलते कायस्थ समाज से भी प्रत्याशी नहीं बनाया जा सका।
दरअसल जबसे एके शर्मा ने वीआरएस लिया है तब ही से उनके इर्द-गिर्द तमाम तरह की चर्चाएँ हो रही हैं। चर्चाओं में उनको लेकर उत्तर प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री से लेकर गृह मंत्री तक बनने के कयास लग चुके हैं।
वहीं दूसरी ओर सूत्रों के अनुसार तो प्रदेश विधान सभा के चुनाव अब एक साल से भी कम समय में होना हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार को पूरी तरह से कमर कसनी होगी। यूं तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी ईमानदारी से उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे भारतवर्ष में एक बेहतर छवि बनाई है, परंतु चुनाव में जाने के पहले केन्द्रीय नेतृत्व किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता है। ऐसे में सरकार में जो भी कमियाँ हैं उन्हे या तो दूर करना चाहता है या तो छुपाना चाहता है।
वैसे तो प्रधानमंत्री कार्यालय में भी एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हर राज्य की गवर्नन्स की मोनिट्रिंग करने के लिए तैनात है, परंतु उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नजदीकी सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी एके शर्मा को उत्तर प्रदेश में लाने का फैसला किया है। शर्मा बतौर प्रशासनिक अधिकारी पिछले 20 सालों से नरेंद्र मोदी के साथ कार्य कर रहे हैं।
केन्द्रीय नेतृत्व, उत्तर प्रदेश में इन्फ्रास्ट्रक्चर और केंद्र-पोषित परियोजनाओं को जल्द से जल्द अमली-जामा पहनाना चाहता है। परंतु ब्यूरोकरेसी मकड़जाल ने केंद्र की कई परियोजना को धीमा कर दिया है। इन्ही परियोजनाओं को गति प्रदान करने के लिए एके शर्मा जैसे कुशल प्रशासनिक अधिकारी की जरूरत उत्तर प्रदेश में है।

सूत्र यह भी बताते हैं की एके शर्मा को शीघ्र ही कैबिनेट मंत्री की शपथ दिलाई जाएगी और वो केन्द्रीय परियोजनाओं को गति प्रदान करने के साथ साथ उत्तर प्रदेश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर भी फोकस करेंगे।
फिलहाल, शर्मा की नई जिम्मेदारी को लेकर तस्वीर जल्द ही और साफ होने की उम्मीद है।

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