दूसरा दिन : मौसी के घर जा रहे हैं भगवान जगन्नाथ ऐसे होगा आदर सत्कार

जैसा कि आप जानते हैं जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा शुरू हो चुकी है जिसका लाभ सैकड़ों लोग ले रहे हैं. ये यात्रा हर साल निकाली जाती है जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू की जाती है और आज इस यात्रा का दूसरा दिन है. इस रथ यात्रा में भगवान श्री कृष्णा, भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ होता है जो जगन्नाथ मंदिर से रथ में बैठकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं. बता दें, गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है यानी भगवान अपनी मौसी के घर जाते हैं.जैसा कि आप जानते हैं जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा शुरू हो चुकी है जिसका लाभ सैकड़ों लोग ले रहे हैं. ये यात्रा हर साल निकाली जाती है जो आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू की जाती है और आज इस यात्रा का दूसरा दिन है. इस रथ यात्रा में भगवान श्री कृष्णा, भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ होता है जो जगन्नाथ मंदिर से रथ में बैठकर गुंडिचा मंदिर जाते हैं. बता दें, गुंडिचा मंदिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है यानी भगवान अपनी मौसी के घर जाते हैं.  रथ के दौरान आगे चलने वाले लोग झाड़ू से मार्ग को साफ़ करते जाते हैं और पीछे आने वाले लोग रथ को अपने हाथों से खींचते हैं और इसका लाभ लेते हैं. इस यात्रा में सबसे पहले भाई बलराम का रथ चलता है उसके बाद बहन सुभद्रा का और आखिरी में भगवान श्री कृष्ण का रथ खींचा जाता है. ये हर साल ऐसे ही क्रम में होता है जो अब एक परम्परा बन चुका है. कहा जाता है जो भी इस रथ को खींचता है उसके सभी दिख दूर होते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. नगर भ्रमण करते हुए शाम को ये तीनों रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं. इसके बाद भगवान रथ से उतरकर मंदिर में प्रवेश करते हैं और साथ दिन वहीं रहते हैं.  भगवान अपनी मौसी के यहां करीब 7 दिनों तक रहते हैं जहां उनका खूब आदर सत्कार किया जाता है और उन्‍हें कई प्रकार के स्‍वादिष्‍ट पकवानों और फल-फूलों का भोग लगाया जाता है. इतने पकवान खाकर भगवान बीमार हो जाते हैं उसके बाद पथ्‍य का भोग लगाया जाता है जिससे वह जल्दी ठीक भी हो जाते हैं. पूरे नौ दिन होने के बाद भगवान जगन्नाथ अपने घर यानी जगन्नाथ मंदिर वापस चले जाते हैं.

रथ के दौरान आगे चलने वाले लोग झाड़ू से मार्ग को साफ़ करते जाते हैं और पीछे आने वाले लोग रथ को अपने हाथों से खींचते हैं और इसका लाभ लेते हैं. इस यात्रा में सबसे पहले भाई बलराम का रथ चलता है उसके बाद बहन सुभद्रा का और आखिरी में भगवान श्री कृष्ण का रथ खींचा जाता है. ये हर साल ऐसे ही क्रम में होता है जो अब एक परम्परा बन चुका है. कहा जाता है जो भी इस रथ को खींचता है उसके सभी दिख दूर होते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. नगर भ्रमण करते हुए शाम को ये तीनों रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं. इसके बाद भगवान रथ से उतरकर मंदिर में प्रवेश करते हैं और साथ दिन वहीं रहते हैं.

भगवान अपनी मौसी के यहां करीब 7 दिनों तक रहते हैं जहां उनका खूब आदर सत्कार किया जाता है और उन्‍हें कई प्रकार के स्‍वादिष्‍ट पकवानों और फल-फूलों का भोग लगाया जाता है. इतने पकवान खाकर भगवान बीमार हो जाते हैं उसके बाद पथ्‍य का भोग लगाया जाता है जिससे वह जल्दी ठीक भी हो जाते हैं. पूरे नौ दिन होने के बाद भगवान जगन्नाथ अपने घर यानी जगन्नाथ मंदिर वापस चले जाते हैं. 

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