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आज है निर्जला एकादशी व्रत, जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

धर्म में एकादशी तिथि का बहुत महत्‍व है। हिंदी में प्रत्येक मास में दो बार एकादशी तिथि आती है। प्रत्‍येक माह में दो एकादशी तिथि के हिसाब से साल में 24 एकादशी तिथियां होती हैं। इन्‍हीं में से एक आज है निर्जला एकादशी। ज्‍येष्‍ठ माह के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहते हैं। धर्म शास्‍त्रों में निर्जला एकादशी के महत्‍व के बारे में कहा गया है कि इस एक एकादशी का उपवास करने से वर्ष की सभी एकादशी का फल मिल जाता है। निर्जला एकादशी को भीम एकादशी भी कहते हैं। सच्‍ची आस्‍था के साथ इस व्रत को करने वाले की सभी इच्‍छाएं पूरी होती हैं और ईश्वर का आर्शीवाद प्राप्‍त होता है।

एकादशी तिथि पर भगवान विष्‍णु की पूजा की जाती है, यह दिन उनको ही समर्पित होता है। इस दिन ऊं नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र के साथ विष्‍णु जी की पूजा करने से व्‍यक्‍ति के सभी दुखों का नाश हो जाता है और श्री हरि की विशेष कृपा मिलती है।

इस साल बन रहे हैं दो शुभ फल देने वाले योग

निर्जला एकादशी पर इस साल शिव योग और सिद्ध योग बन रहे हैं। सोमवार के दिन पड़ रही निर्जला एकादशी की पूजा इन शुभ योगों में करना उत्‍तम रहेगा। सोमवार को शिव योग शाम 5.34 बजे तक रहेगा। इसके बाद सिद्ध योग लग जाएगा।

शिव योग : इस योग में किए गए काम से शुभ फल की प्राप्‍ति होती है। शास्‍त्रों में इसे विभिन्‍न शुभ योगों में से एक माना गया है।

सिद्ध योग : यह बहुत शुभ योग होता है और इस योग में कोई शुभ काम करने पर मनचाही सफलता मिलती है। पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार इसे सभी इच्‍छाओं को पूरा करने वाला योग माना जाता है।

एकादशी व्रत और पूजा विधि

निर्जला एकादशी का व्रत दशमी तिथि की रात से ही शुरू माना जाता है। इसलिए कुछ जगहों पर दशमी तिथि को रात में बिना नमक का भोजन करने का विधान बताया गया है। इस बार एकादशी तिथि रविवार शाम 4.21 बजे से शुरू हो रही है, जो सोमवार को दोपहर 1.31 बजे तक रहेगी। मगर इस व्रत में उदया तिथि देखी जाती है इसलिए उपवास शुरू करने का समय सोमवार को सुबह से ही माना जाएगा। व्रत का पारण मंगलवार को सुबह 5.24 बजे से 8.12 बजे के बीच किया जा सकेगा।

एकादशी व्रत में भगवान विष्‍णु की पूजा की जाती है। इसलिए इस दिन सुबह स्‍नान आदि नित्‍य कर्म करने के बाद श्री हरि की तस्‍वीर अच्‍छे से साफ कर उस पर गंगा जल छिड़कें और उन्‍हें किसी स्‍वच्‍छ स्‍थान पर आसीन करवाएं। तत्‍पश्‍चात उन्‍हें फल और तुलसी अर्पित करें। इस पूजा में तुलसी दल जरूर रखें अन्‍यथा पूजा पूरी नहीं मानी जाएगी। पूजा में नारियल, पान-सुपारी, पंजामृत, अक्षत, चंदन और मिष्‍ठान को भी शामिल करें। भगवान को सभी सामग्री अर्पित करने के उपरांत कथा कहें या सुनें और उनकी आरती करें।

अपराजिता श्रीवास्‍तव

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