अब पेरिस समझौते से हटा US, ग्लोबल क्लाइमेट लीडर बनकर उभरेगा चीन..

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लंबे समय से चली आ रही अटकलों के बाद आखिरकार पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को अलग करने का ऐलान कर ही दिया, जिसके बाद से चीन के ग्लोबल क्लाइमेट लीडर बनकर उभरने के आसार बन गए हैं. चीन के साथ भारत और यूरोपीय देश भी पेरिस जलवायु समझौते को अमल में लाने को लेकर प्रतिबद्ध हैं. जर्मनी दौरे पर मोदी ने पेरिस जलवायु समझौता पर जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल का समर्थन किया था. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन समझौते को अमल में नहीं लाना नैतिक अपराध है अब पेरिस समझौते से हटा US, ग्लोबल क्लाइमेट लीडर बनकर उभरेगा चीन..सहारा रेगिस्तान मे पानी की किल्लत से 44 लोगों की हुई मौत, 6 की बची जान

पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के पीछे हटने से वैश्विक तापमान को कम करने और पर्यावरण संरक्षण की कोशिश को झटका लगा है. ट्रंप के इस फैसले का मतलब यह है कि अब अमेरिका की ओर से विकासशील देशों को पर्यावरण संरक्षण के लिए फंड नहीं मिलेगा. अभी तक अमेरिका की ओर से इस फंड में 50 करोड़ डॉलर दिया जा चुका है. इस समझौते के तहत साल 2020 से विकसित देशों की ओर से हर साल जलवायु वित्तीय सहायता के लिए 100 अरब डॉलर देने का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा भविष्य में इस धनराशि को बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई गई है. इसके लिए यूएन ग्रीन क्लाइमेट फंड की स्थापना की गई.

आर्थिक समस्या बड़ी बाधा
भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन ने जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली आपदाओं से निपटने के लिए विकसित देशों से विकाशील देशों को 100 अरब डॉलर प्रतिवर्ष देने को कहा है. अमेरिका के अलग होने से यह चिंता बढ़ गई है कि भारत समेत अन्य विकासशील देश बिना आर्थिक सहायता के जलवायु परिवर्तन की समस्या से कैसे निपटेंगे? नवीनीकरण ऊर्जा में भारी भरकम निवेश की जरूरत है. इसके अलावा समझौते में विकसित देशों की ओर से विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन और नवीनीकरण ऊर्जा तकनीकी को अपनाने में मदद करना भी शामिल किया गया है. मामले में ट्रंप की दलील है कि चीन सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जित करता है और वह इस ग्रीन फंड में योगदान नहीं कर रहा है. ट्रंप ने अपने चुनाव अभियान के दौरान भी अमेरिका को इससे अलग करने का वादा किया था.

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है अमेरिका
वर्तमान में अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन कार्बन उत्सर्जन में इसका स्थान दूसरा है. इसके बाद कार्बन उत्सर्जन में भारत तीसरे नंबर पर आता है. अमेरिका के अपने वादे से मुकरने के बावजूद भारत और चीन जलवायु समझौते को अमल में लाने की अपनी प्रतिबद्धता पर अटल हैं. हालांकि अब सवाल यह उठता है कि अब अमेरिका की जगह भुगतान कौन करेगा? अमेरिका ने ग्रीन क्लाइमेट फंड में ज्यादा योगदान देने के साथ ही कार्बन उत्सर्जन में 26 से 28 फीसदी तक कटौती करने की प्रतिबद्धता जताई थी. अमेरिका की जनसंख्या दुनिया की आबादी का कुल चार फीसदी है, लेकिन अमेरिका वैश्विक ग्रीनहाउस गैस का एक तिहाई उत्सर्जन करता है.

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