मोदी सरकार ने तैयार की ‘फुलप्रूफ योजना’, अब कभी दोबारा नहीं होगी ‘केदारनाथ त्रासदी’!

उत्तराखंड में साल 2013 की प्राकृतिक आपदा से सबक लेते हुए सरकार ने राज्य के सर्वाधिक संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में मौजूद केदारनाथ धाम को तीन दीवारों के सुरक्षा कवच से घेरने वाली पुनर्विकास योजना को कुछ संशोधनों के साथ अंतिम रूप दे दिया गया है.मोदी सरकार ने तैयार की 'फुलप्रूफ योजना', अब कभी दोबारा नहीं होगी 'केदारनाथ त्रासदी'! फिल्म पद्मावती को लेकर गिरिराज ने दी बड़ी चेतावनी, कहा- किसी और धर्म पर फिल्म बनाकर दिखाओ

केन्द्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा तैयार की गई केदारपुरी पुर्ननिर्माण योजना के संशोधित मसौदे में धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के इस तीर्थस्थल को प्राकृतिक आपदाओं से स्थायी सुरक्षा प्रदान करने के उपाय किए गए हैं.

मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मंजूरी से संशोधित योजना में तीन अहम बदलाव शामिल किए गए हैं. इनमें केदारनाथ मंदिर परिसर को तीन स्तरीय सुरक्षा कवच से घेरना, साधकों की आध्यात्मिक साधना के लिये केदारनाथ धाम के आसपास पहाड़ियों में गुफायें बनाना और तीर्थयात्रियों के रुकने ठहरने सहित किसी भी मकसद से होने वाले निर्माणकार्यों को नदी के बहाव की दिशा में ही करने की बाध्यता को शामिल किया गया है. पूर्व योजना में मंदिर परिसर को दीवारों के दो स्तरीय सुरक्षा कवच से घेरने की बात कही गई थी.

उल्लेखनीय है कि पिछले महीने मोदी ने केदारनाथ मंदिर के आसपास दो वर्ग किमी क्षेत्रफल में 750 करोड़ रुपये की पुनर्निर्माण योजना को हरी झंडी दिखाई थी. उनके सुझाव पर योजना में किए गए संशोधनों के बाद मंत्रालय ने इसे अंतिम रूप दिया है. इसके तहत केदारनाथ धाम को अंग्रेजी वर्णमाला के ‘यू’ अक्षर के आकार की तीन दीवारों से घेरा जायेगा। इसमें मंदिर के दोनों ओर मंदाकिनी एवं सरस्वती नदी की धारा के समानांतर पूरे परिसर को घेरते हुये ‘यू’ आकार में बोल्डर की पहली दीवार बनाई जाएगी. इसके बाद दूसरा घेरा धातु की जालियों के कवच वाली पत्थरों की दीवार का और तीसरा घेरा कंक्रीट की दीवार का होगा. पूर्व योजना में दो स्तरीय सुरक्षा घेरा बनाया जाना था.

तीन स्तरीय सुरक्षा घेरे से भविष्य में बाढ़, भूस्खलन, भूकंप जैसी आपदा से प्राचीन मंदिर को सुरक्षित बनाना है. साथ ही तीर्थस्थल के दोनों ओर सरस्वती और मंदाकिनी नदियों के तट पर कई घाट बनाकर पानी के बहाव तक तीर्थयात्रियों की निर्बाध पहुंच को सीमित किया जाएगा. 

पुनर्निर्माण योजना में दोनों नदियों के किनारे तीर्थयात्रियों के रुकने ठहरने और अन्य सुविधाओं के लिये जमीन की सतह से निर्धारित ऊंचाई पर ही निर्माणकार्य सुनिश्चित किया जाएगा. प्रत्येक इमारत का निर्माण नदी के बहाव की दिशा में ही होगा. समुद्रतल से लगभग 11 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम के लिए संशोधित पुनर्निर्माण योजना में पर्यावरण एवं पारिस्थितिकीय तंत्र की चिंताओं का पूरा ध्यान रखा गया है. साथ ही मौसम पर निगरानी के लिए चोराबारी क्षेत्र में दो निगरानी टावर बनाए जाएंगे.

योजना के तहत इमारतों को बनाने में स्थानीय निर्माण सामग्री और वास्तु से जुड़ी पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल करने की बात कही गई है. इसमें कम ऊंचाई वाली इमारतों को अधिकतम दो मंजिल तक ही बनाने की ताकीद की गई है. साथ ही मंदिर परिसर में मुख्य इमारत के चारों ओर 50 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माणकार्य नहीं होगा, जिससे निर्माणकार्य की विघ्नबाधा से मुक्त रखने के लिए समूचे परिसर को पूरी तरह से खुला रखा जा सके. इसका मकसद भगदड़ जैसी स्थिति से बचना है.

उल्लेखनीय है कि हर साल लगभग छह लाख तीर्थयात्री केदारनाथ के दर्शन के लिए जाते हैं. संशोधित योजना में साधकों को ध्यान एवं योग साधना के लिए मंदिर परिसर के आसपास गुफाएं और एक संग्रहालय बनाने का भी प्रावधान किया गया है. लगभग 1500 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना को राज्य सरकार की भागीदारी से पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है.

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